Tuesday, 12 February 2013

दवाईयॉं : ब्रॅण्डेड और जेनेरिक

जेनेरिक दवा मतलब मूल दवा या दवा का मूल नाम और ब्रॅण्डेड दवा मतलब उसी दवा को कंपनी ने दिया नाम.
ब्रॅण्डेडदवाईयों के भाव जेनेरिक दवाईयों से कई गुना अधिक होते है. इसका कारण है बाजार की जानलेवा स्पर्धा के कारण कंपनियों के लिए आवश्यक बन गई विज्ञापनबाजी, उस पर के सरकारी कर, व्यापारी और केमिस्टों का कमिशन, यातायात खर्च; अंत में इसका पूरा आर्थिक बोझ बिमारी से ग्रस्त रुग्ण पर ही लादा जाता है. कभी-कभी अनुपलब्धता के कारण जेनेरिक दवाईयॉंमहंगी पड़ती है. लेकिन जेनेरिक दवाईयों की मांग बढ़ी तो पूर्ति बढ़ेगी और वह सस्ती हो सकती है.

दरों में अंतर
मधुमेह के रुग्ण को कौनसी दवा दोगे, ऐसा एमबीबीएस के विद्यार्थी को परीक्षा में पूछॉं तो वह उत्तर लिखेगा ग्लिमेपेराईड’. मधुमेह के उपचार के लिए सामान्यत: उपयोग में लाए जाने वाले एक क्षार का यह नाम है. लेकिन यही विद्यार्थी डॉक्टर बनने के बाद जब उसके पास मधुमेह का रुग्ण आएगा तो शायद वह उसे ऍमारिलयह दवा लिख देगा. क्या यह दवा गलत है? नहीं. यह उस क्षार से बनाई ब्रॅण्डेड दवा का नाम है. नाम छोड़ दे तो दोनों में क्या अंतर है? ‘ऍमारिलकी 10 गोलियॉं करीब 125 रुपयों में मिलती है, तो ग्लिमेपेराईडकी 10 गोलियॉं केवल दो रुपयों में मिलती है. दोनों के औषधि गुणधर्म एक ही है, लेकिन ब्रॅण्डेड दवा के लिए हम सीधे 123 रुपये ज्यादा देते है.
हरदम ही होने वाली सर्दी. इसके लिए सरेआम उपयोग किए जाने वाली औषधि क्षार का नाम है सेट्रिझाईन. इस मूल दवा की किमत, उत्पादन खर्च, यातायात खर्च और पर्याप्त लाभ मिलाकर होती है, 10 गोलियों के लिए 1 रुपया 20 पैसे. इसी गुणधर्म की सेटझाईन ब्रॅण्डेड दवा मिलती है 35 रुपयों में 10 गोलियों की दर से.
जिस कारण हृदयाघात होता है, उस धमनियों में अवरोध को दूर करने के लिए सरे आम उपयोग में लाए जाने वाला इंजेक्शन है स्टेप्टोकिनेस या युरोकिनेस. उसकी मूल किमत होती है एक हजार रुपये. उसे किसी ब्रॅण्ड का नाम चिपकते ही किमत हो जाती है पॉंच हजार रुपये.
भारत में मुख्यत: छोटे बच्चों के लिए मलेरिया एक जानलेवा बिमारी है. दवाईयों से बेअसर मलेरिया के लिए दिए जाने वाले इंजेक्शन की, तीन कुप्पियों का पाकिट 25 रुपये के दर से मिल सकता है. वही इंजेक्शन ब्रॅण्डेड  होते ही उसकी किमत एक कुप्पि के लिए होती है 300 से 400 रुपये.
छोटे बच्चों की और एक जानलेवा बिमारी है डायरिया. इसमें सही खतरा होता है शरीर की जलशुष्कता का. उसे रोकने के लिए डॉम्पेरिडोन औषधि क्षार का उपयोग करते है और उसकी दस गोलियों की पट्टी मिलती है केवल सव्वा रुपये में. उसकी ही डोमेस्टाल यह ब्रॅण्डेड दवा मिलती है 33 रुपयों में. गरीब ही नहीं मध्यमवर्गीयों को भी यह दवाईयॉं कैसे पुराएगी? इसके लिए जेनेरिक मेडिसिन मतलब षधि द्रव्य मूल स्वरूप में उपलब्ध कराना यह उपाय है. भारत में सामान्यत: 25 प्रतिशत बिमारियों पर, पुराता नहीं इसलिए उपचार ही नहीं किया जाता. अत: जेनेरिक मेडिसिनसे हर भारतीय को कितना लाभ होगा, यह सोचे.
और एक दिलचस्प जानकारी. जेनेरिक मेडिसिन की दुकान शुरू करने के लिए इच्छुक व्यक्ति को केन्द्रीय रसायन एवं खाद मंत्रालय की ओर से 50 हजार रुपये अनुदान मिलता है. इसके अलावा उन्हें दुकान के लिए जगह देने का स्वेच्छा अधिकार भी है. गरीब और अमीरों को बढ़िया स्तर की आरोग्य सेवा एक समान मिलने का स्वप्न साकार होने के संकेत दिखाई दे रहे है.

(साप्ताहिक विजयंतसांगली, से साभार)
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पर्वत भी नतमस्तक

यह कहानी है दशरथ मांझी नाम के एक गरीब आदमी की.
दशरथ मांझी का जन्म 1934 में बिहार के गेलहर गॉंव में एक बहुत गरीब परिवार में हुआ. वे बिहार के आदिवासी जनजाति के - बहुत निम्न स्तरीय मुसाहर जनजाति से है. उनकी पत्नी का नाम था फाल्गुनी देवी. दशरथ मांझी के लिए पीने का पानी ले जाते फाल्गुनी देवी दुर्घटना की शिकार हुई. उसे तुरंत डॉक्टरी सहायता नहीं मिल पाई. शहर उनके गॉंव से 70 किलोमीटर दूर था. वहॉं सब सुविधाए थी. लेकिन वहॉं तक तुरंत पहुँचना संभव नहीं था. दुर्भाग्य से वैद्यकीय उपचार के अभाव में फाल्गुनी देवी की मौत हो गई. ऐसा प्रसंग किसी और पर न गुजरे, इस विचार ने दशरथ मांझी को पछाड़ा. समीप के शहर की 70 किलोमीटर की दूरी कैसे पाटी जा सकती है इस दिशा में उनका विचार चक्र चलने लगा. उनके ध्यान में आया कि, शहर से गॉंव को अलग करने वाला पर्वत हटाया गया तो यह दूरी बहुत कम हो जाएगी. पर्वत तोडने के बाद शहर से गॉंव तक की 70 किलोमीटर दूरी केवल 7 किलोमीटर रह जाती. उन्होंने यह काम शुरू करने का दृढ निश्‍चय किया. लेकिन काम आसान नहीं था. इसके लिए उन्हें उनका रोजी-रोटी देने का दैनंदिन काम छोडना पड़ता. उन्होंने अपनी बकरियॉं बेचकर छन्नी, हतोड़ा और फावडा खरीदा. अपनी झोपडी काम के स्थान के पास बनाई. इससे अब वे दिन-रात काम कर सकते थे. इस काम से उनके परिवार को दुविधाओं का सामना करना पड़ा, कई बार दशरथ को खाली पेट ही काम करना पड़ा. उनके आस-पास से लोगों का आना-जाना शुरू था. गॉंव में इस काम की चर्चा हो रही थी. सब लोगों ने दशरथ को पागल मान लिया था. उन्हें गॉंव के लोगों की तीव्र आलोचना सहनी पडती थी. लेकिन वे कभी भी अपने निश्‍चय से नहीं डिगे. जैसे-जैसे काम में प्रगति होती उनका निश्‍चिय भी पक्का होता जाता. लगातार बाईस वर्ष दिन-रात किए परिश्रम के कारण1960 में शुरु किया यह असंभव लगने वाला काम 1982 मे पूरा हुआ. उनके अकेले के परिश्रम ने अजिंक्य लगने वाला पर्वत तोडकर 360 फीट लंबा, 25 फीट ऊँचा और 30 फीट चौडा रास्ता बनाया. इससे गया जिले के आटरी और वझीरगंज इन दो गॉंवों में का अंतर दस किलोमीटर से भी कम रह गया.
उनकी पत्नी फाल्गुनी देवी - जिसकी प्रेरणा से उन्होंने यह असंभव लगने वाला काम पूरा किया, उस समय हयात नहीं थी. लेकिन, गॉंव के लोगों से जैसे बन पड़ा, उन्होंने मिठाई, फल दशरथ जी को लाकर दिए और उनके साथ उनकी सफलता की खुशी मनाई. युवक भी चॉंव से इस पर्वत को हिलाने वाले देवदूत की कहानी सुनने लगे है. गॉंव वालों ने दशरथ जी को साधुजीपदवी दी है.
दशरथ जी कहते है, ‘‘मेरे काम की प्रथम प्रेरणा है मेरा पत्नी पर का प्रेम. उस प्रेम ने ही पर्वत तोडकर रास्ता बनाने की ज्योत मेरे हृदय में जलाई. करीब के हजारों लोग अपनी दैनंदिन आवश्यकताओं के लिए बिना कष्ट किए समीप के शहर जा सकेगे, यह मेरी आँखो के सामने आने वाला दृष्य मुझे दैनंदिन कार्य के लिए प्रेरणा देता था. इस कारण ही मैं चिंता और भय को मात दे सका.’’

(‘विकल्पवेधअंक 1 से 15 दिसंबर से साभार)   
          
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माजुली द्वीप का मराठी शिक्षक
ब्रह्मपुत्र के पात्र में रेत-मिश्रित मिट्टी जमा होकर निर्माण हुए माजुली द्वीप बहुत ही सुंदर है. इन द्वीपों पर छोटे-बड़े 10-12 गॉंव है. नारियल-सुपारी के बगिचे, बेंत (पतले और कड़े बॉंस) के वन, बड़े-बड़े वृक्षों पर खिले ऑर्किड, पानी से भरी जगह पर की चावल की खेती और बाढ़ से सुरक्षा के लिए गहराई का भाग छोड़कर बॉंस पर, रास्ते के किनारे बेंत से बनाए घर है! यहॉं हर घर में आपका आदर के साथ स्वागत होगा. महाराष्ट्र से आए है, ऐसा बताते ही तुरंत प्रश्‍न पूछॉं जाता है, ‘‘रवि सर कैसा है?’’ फिर हर घर में यही प्रश्‍न आपका पीछा करता है. तब आप भी सोचते है, ‘‘कौन है ये रवि सर?’’ माजुली में हर आदमी इस रवि सर के बारे में इतनी आस्था से क्यों पूछ-तॉंछ करता है? और इस रवि सर के बारे में महाराष्ट्र के सब लोगों को जानकारी होनी ही चाहिए, ऐसी उनकी अपेक्षा क्यों है?
ये रवि सर है - रवीन्द्रनाथ देवेन्द्रनाथ सावदेकर. नासिक जिले के चांदवड गॉंव के. देवेन्द्रनाथ सावदेकर गुरुजी के एकमात्र पुत्र. स्वामी विवेकानंद के तत्त्वज्ञान से प्रेरित होकर रवीन्द्रनाथ ने भारत परिक्रमा में भाग लिया. कन्याकुमारी के विवेकानंद केन्द्र में आचार्यका प्रशिक्षण पूर्ण किया. केन्द्र ने उन्हें नागालँड के डायांग में जाने के लिए कहा. अकेला लड़का इतने दूर, हिंसाग्रस्त भाग में जाएगा, इस विचार से मॉं का हृदय विचलित हुआ. लेकिन एक माह जाकर देखता हूँऐसा कहकर सन् 2000 में रवीन्द्रनाथ सावदेकर ने घर छोड़ा. डोयांग के अतिदुर्गम प्रदेश की शाला में एक-दो माह नहीं करीब दो वर्ष काम करने के बाद माजुली द्वीप पर नई शुरु होने वाली शाला में उनकी मुख्याध्यापक पद पर नियुक्ति हुई. जोर्‍हाट के निमाटी घाट पार रवि सर सुबह आठ बजे पहुँचे. ब्रह्मपुत्र के किनारे सुबह बिताने के बाद, सायंकाल छ: बजे वे माजुली द्वीप पर पहुँचे. कमलाबारी गॉंव की सुंदरता देखकर खो गए.
52 विद्यार्थी और 2 शिक्षक. किराए की छोटी सी इमारत के साथ सर की शाला शुरु हुई. लेकिन नया प्रदेश, नया वातावरण होने के कारण सर के सामने अनेक प्रश्‍न थे. उन प्रश्‍नों का हल लोगों की सहायता के बिना निकलना कठिन था. उसमें भी एक समस्या थी. गॉंव के लोग हिंदी या अंग्रेजी नहीं जानते थे और सर को आसामी भाषा नहीं आती थी. फिर प्रश्‍नों का हल कैसे ढूंढे?
सर ने आसामी भाषा सीखना आरंभ किया. मराठी और आसामी की समानता का उन्हें अच्छा उपयोग हुआ. धीरे-धीरे टूटी-फूँटी आसामी में सर ने गॉंववालों के साथ संवाद आरंभ किया. गॉंव के लोगों के साथ संवाद बनाने के लिए सर रोज सायंकाल गॉंव में चक्कर लगाते. उनके आने का समय लोगों को याद हो गया. वे सर की राह देखने लगे और फिर सावदेकर सर गॉंव के रवि सरबन गए.
रवि सर ने शाला के लिए गॉंव के बाहर की जगह हासिल की. अब शाला किराए की इमारत से अपनी खुद की जगह में गई थी. लेकिन यह जगह थी बेंत का जंगल और झाडियों से घिरी दलदल. लोगों की सहायता से सर ने जगह साफ की. वहॉं सिमेंट कॉंक्रिट की इमारत बनाना एक आव्हान ही था. वहॉं की दलदली और भुरभूरी जमीन में कॉंक्रिट का स्ट्रक्चर बनाते, तो  भूजल का स्तर कब बदलेगा इसकी कोई गारंटी नहीं थी. द्वीप पर निर्माण कार्य के लिए पत्थर, गिट्टी नहीं थी और द्वीप पर की रेत भी निर्माण काम के लिए उपयुक्त नहीं थी. द्वीप पर सिंमेंट कहॉं से और कैसे लाए, यह भी प्रश्‍न था. लेकिन रवि सर ने निश्चय किया. माजुली हितैषी बंधुनाम का पालक संगठन बनाया और उस संगठन की सहायता से काम शुरु किया. 15 ट्रक पत्थर नाव से लाए. यह थे नदी के गोल पत्थर. पत्थर तोडने के लिए आदमी नहीं मिलते थे. पत्थर तोडते समय, उड़े हुए टुकड़ों से सिर और आँखों पर घाव होने के कारण काम करने वाले लोग भाग जाते थे. फिर सर ने बड़े गॉगल लाए. वह गॉगल लगाकर मजदूर पत्थर तोडने लगे. लगातार बारिश, प्रतिकूल जलवायु और चारों ओर पानी ही पानी इस स्थिति में कड़ी मेहनत कर सर ने शाला की इमारत बनाई.
2004 में सर ने अहमदनगर की पूर्वा नाम की युवती से विवाह किया. पूर्वा असम में ब्रह्मपुत्र के द्वीप पर रहने के लिए तैयार थी. पूर्वा दिदी भी रवि सर के साथ शाला में पढ़ाने लगी. रवि सर के समान ही उन्होंने भी स्वयं को असम की प्रतिकूल परिस्थिति के अनुकूल ढाल लिया है.
ब्रह्मपुत्र में बाढ़ आने के बाद माजुली द्वीप का अधिकांश भाग पानी में डूब जाता है. गॉंव के लोगों का एक-दूसरे के साथ और अन्य गॉंवों के साथ का भी संपर्क टूट जाता है. उस समय रवि सर नाव से घूमते हुए गॉंव वालों की सहायता करते. सन् 2008 में इतनी बाढ़ आई कि, नाव में से दिखने वाले घरों के छप्पर देखकर अनुमान लगाना पड़ता था कि हम किस गॉंव में है. लेकिन उस स्थिति में भी रवि सर छोटी नाव लेकर दिन-रात हर प्रकार से गॉंव वालों की मदद कर रहे थे.
माजुली द्वीप के इस प्रतिकूल वातावरण में काम करने के लिए क्या कोई शिक्षक तैयार होगा? लेकिन रवि सर कहते है, ‘‘मैं महाराष्ट्र में नौकरी करता तो शायद एक अच्छा शिक्षक बन भी जाता. लेकिन यहॉं माजुली द्वीप पर लोगों के सांस्कृतिक बंध देश के साथ मजबूती से बने रहे इसलिए हम जो काम कर रहे है, वह नहीं कर पाता.’’
आज रवि सर असम के दिब्रुगढ़ में स्थित विवेकानंद केन्द्र के विद्यालय के प्राचार्य है. माजुली द्वीप छोडे हुए उन्हें दो वर्ष हो गए है. लेकिन आज भी द्वीप का हर छोटा-बड़ा अत्यंत भावुक होकर पूछता है, ‘‘रवि सर कैसा है?’’
(लोकसत्ता, 9 जुलाई 2012 से साभार)
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अमेरिका में गीता पठन
व्हँकुअर. अमेरिका का एक शहर. वह युएसए में मतलब संयुक्त राज्य संस्थान में है या कॅनडा में यह मुझे पता नहीं. शायद, इन दो देशों की सीमा पर होगा.
लेकिन वह बात महत्त्व की नहीं. महत्त्व की बात है वहॉं के वीणा संस्कृत फाऊंडेशनसंगठन ने ली गीता पठन की स्पर्धा. स्पर्धा का नाम था श्रीमद्भगवद्गीता श्लोकोच्चारण प्रतियोगिता’. 34 लड़के-लड़कियों ने इसमें भाग लिया. पॉंच ने संपूर्ण गीता सुनाई. व्हँकुअर के ही नवनीत कौशल और सुचिता रामन् परीक्षक थे.
सात वर्ष के सिद्धार्थ गणेश ने गीता का संपूर्ण सातवा अध्याय सुनाया. सुब्रमण्यम् जनस्वामी और 8 वर्ष की निकिता शिवराम ने 15 वा अध्याय और श्रद्धा कौशिक ने 12 वा अध्याय सुनाया. 25 वर्ष से अधिक आयु के लोगों ने भी पाठांतर प्रकट किया. लेकिन उनका समावेश स्पर्धकों में नहीं था.
इस स्पर्धा में पहला पारितोषिक 6 वर्ष की कुमारी श्रेयांसी वाला ने हासिल किया. सात वर्ष के विष्णुगुप्त दीक्षित और छ: वर्ष की वेदांशी वाला को संयुक्त दूसरा क्रमांक मिला. तीसरा क्रमांक पॉंच वर्ष के उदय गणेश ने हासिल किया.
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एक गॉंव की कहानी
तमिलनाडु के कोईमतुर जिले के इस गॉंव का नाम है कालीथिंबम्’. गॉंव में अभी भी बिजली नहीं. फिर अन्य नागरी सुविधा तो बहुत दूर की बात है.
गॉंव में अरालीजनजाति की बस्ती है. गॉंव के लोग उपजीविका के लिए कोईमतूर और इरोड शहरों में जाते है और उल्लेखनीय यह कि साथ में पत्नी भी ले आते है. अन्य जाति की वधू लाने में इस जनजाति के लोगों को अभिमान अनुभव होता है. गॉंव में 300 परिवार है. उनमें से 40 परिवारों की बहुएँ अन्य जनजाति से है. उनमें से कुछ दलित भी है.
इस चत्मकार के पीछे एक कारण है. पहले कभी, कुछ लड़कों ने अपनी जनजाति से बाहर की लड़कियों से प्रेम किया, तब लड़कों के घरवालों ने उनके विवाह को कड़ा विरोध किया. इस कारण, अनेकों ने आत्महत्या की. तब उनके घर के लोगों की आँख खुली; और उन्होंने ऐसे विवाहों को मान्यता दी. अब तो ऐसे विवाहोत्सव में पूरा गॉंव शामिल होता है. इन विवाहों के समय गॉंव के लोग शपथ लेते है कि, हम ऐसे प्रेमविवाहों को विरोध नहीं करेगे. लड़की के परिवार का ऐसे विवाह को विरोध हुआ, तो लड़के के पक्ष के लोग उन्हें समझाते है. अपनी जनजाति की लड़कियों ने जनजाति से बाहर के युवक के साथ विवाह किया, तो उसे भी गॉंव वालों की सम्मति होती है.

- मा. गो. वैद्य
(अनुवाद : विकास कुलकर्णी )
 babujivaidya@gmail.com


Tuesday, 5 February 2013

हिंदू आतंकवाद

हिंदू आतंकवाद’, ‘भगवा आतंकवादजैसे गैरजिम्मेदाराना शब्दों का प्रयोग करने के लिए गृहमंत्री शिंदे का निषेध करने वाला लेख मैंने गत भाष्य में ही लिखा था. फिर उस विषय की चर्चा का वैसे कोई प्रयोजन नहीं था. लेकिन, वह लेख लिखने के बाद उसी विषय पर दो बहुत ही अच्छे लेख मैंने पढ़े. उन लेखों का भी मेरे वाचकों को परिचय हो, इस हेतु से उन लेखों का स्वैर अनुवाद यहॉं प्रस्तुत कर रहा हूँ.

एस. गुरुमूर्ति का लेख
पहला लेख है एस. गुरुमूर्ति का. वह चेन्नई से प्रकाशित होने वाले न्यू इंडियन एक्सप्रेसके २४ जनवरी के अंक में प्रकाशित हुआ है. विषय मुख्यत: भारत-पाकिस्तान के बीच चलने वाली समझौता एक्सप्रेसमें, भारत में पानिपत में हुए बम विस्फोट और उसके लिए बहुत देर बाद सरकारी जॉंच यंत्रणा ने तथाकथित हिंदू आतंकवादियों को धर दबोचने के बारे में है. वह इस प्रकार है -

दाऊद इब्राहिम की मदद
‘‘२० जनवरी १३ को, जयपुर में कॉंग्रेस के तथाकथित चिंतन शिबिर में केंद्रीय गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे ने समझौता एक्सप्रेस, मक्का मसजिद और मालेगॉंव में हुए बम विस्फोट के लिए रा. स्व. संघ और भाजपा को जिम्मेदार बताया था. शिंदे का वक्तव्य प्रसिद्ध होने के दूसरे ही दिन लष्कर-ए-तोयबा का नेता हफीज सईद ने संघ पर पाबंदी लगाने की मांग की थी. अत: सईद की इस मॉंग के लिए शिंदे ही गवाह साबित होते है. अब हम इस बम विस्फोट के सबूतों पर विचार करेंगे.’’
‘‘राष्ट्र संघ की सुरक्षा समिति ने २९ जून २००९ को पारित किए प्रस्ताव में कहा है कि, ‘२००७ के फरवरी माह में समझौता एक्सप्रेस में जो बम विस्फोट हुआ उसके लिए लष्कर-ए-तोयबा का मुख्य समन्वयक कासमानी अरिफ जिम्मेदार है.इस कासमानी को दाऊद इब्राहिम ने पैसा दिया था. दाऊद ने अल् कायदाइस आतंकी संगठन को भी पैसों की मदद की थी. इस मदद के बदले समझौता एक्सप्रेस पर हमला करने के लिए अल् कायदाने आतंकी उपलब्ध कराए थे. सुरक्षा समिति का यह प्रस्ताव संयुक्त राष्ट्र संघ की साईट पर उपलब्ध है. दो दिन बाद मतलब दि. १ जुलाई २००९ को अमेरिका के (युएसए) कोषागार विभाग (ट्रेझरी डिपार्टमेंट) ने एक सार्वजनिक पत्रक में कहा है कि, अरिफ कासमानी ने बम विस्फोट के लिए लष्कर-ए-तोयबा के साथ सहयोग किया. अमेरिका ने अरिफ कासमानी सहित कुल चार पाकिस्तानी नागरिकों के नाम भी घोषित किए है. अमेरिका सरकार के इस आदेश का क्रमांक १३२२४ है और वह भी सरकारी साईट पर उपलब्ध है.’’

पाकिस्तान की कबुली
‘‘राष्ट्र संघ और अमेरिका ने लष्कर-ए-तोयबा और कासमानी के विरुद्ध कारवाई घोषित करने के उपरान्त, छ: माह बाद पाकिस्तान के गृहमंत्री रहमान मलिक ने, पाकिस्तान के आतंकवादी, समझौता एक्सप्रेस में हुए बम विस्फोट में शामिल थे, यह मान्य किया. लेकिन उसे एक परन्तुक (रायडर) जोड़ा. वह इस प्रकार कि, लेफटनंट कर्नल पुराहित ने पाकिस्तान में रहने वाले आतंकवादियों को इसके लिए सुपारी दी थी. (संदर्भ - इंडिया टुडेऑन लाईन, २४ - ०१ - २०१०)’’
‘‘राष्ट्र संघ या अमेरिका या पाकिस्तान के गृहमंत्री की बात छोड़ दें. अमेरिका में इस मामले की जिस एक अलग यंत्रणा ने जॉंच की, उसमें से और कुछ जानकारी सामने आई है. करीब १० माह बाद सेबास्टियन रोटेल्ला इस खोजी पत्रकार ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि, समझौता एक्सप्रेस में हुए बम विस्फोट में डेव्हिड कोलमन हेडली का भी हाथ था. यह उसकी तीसरी बीबी फैजा आऊतल्लाह ने अपने कबुलनामें में बताया है. रोटेल्ला के रिपोर्ट का शीर्षक है, ‘२००८ में मुंबई में हुए बम विस्फोट के बारे में अमेरिकी सरकारी यंत्रणा को चेतावनी दी गई थीरोटेल्ला आगे कहते है कि, ‘मुझे इस हमले में लपेटा गया है, ऐसा फैजा ने कहा है(वॉशिंग्टन पोस्ट - ०५ - ११ - २०१०) २००८ के अप्रेल माह में लिखी अपनी जॉंच के रिपोर्ट के अगले भाग में रोटेल्ला कहते है कि, ‘‘फैजा, इस्लामाबाद के (अमेरिकी) दूतावास में गई थी और २००८ में मुंबई में विस्फोट होगे, ऐसी सूचना भी उसने दी थी.’’    

सीमी का भी सहभाग
‘‘सन् २००७ में, समझौता एक्सप्रेस में हुए बम विस्फोट के मामले की जॉंच के चलते समय ही, इस हमले में सीमी’ (स्टुडण्ट्स इस्लामिक मुव्हमेंट ऑफ इंडिया) संस्था का भी सहभाग था, ऐसे सबूत मिले है. इंडिया टुडेके १९ - ०९ - २००८ के अंक के समाचार का शीर्षक था मुंबई में रेलगाडी में हुए विस्फोट और समझौता एक्सप्रेस में हुए बम विस्फोट में पाकिस्तान का हाथ : नागोरीउस समाचार में लष्कर-ए-तोयबा और पाकिस्तान के सहभाग का पूरा ब्यौरा दिया गया है. सीमीके नेताओं की जो नार्को जॉंच की गई, उससे यह स्पष्ट होता है. इंडिया टुडे के समाचार के अनुसार, सीमी के महासचिव सफदर नागोरी, उसका भाई कमरुद्दीन नागोरी और अमील परवेज की यह नार्को जॉंच बंगलोर में अप्रेल २००७ में की गई थी. इस जॉंच के निष्कर्ष इंडिया टुडेके पास उपलब्ध है. उससे स्पष्ट होता है कि, भारत के सीमी कार्यकर्ताओं ने, सीमा पार पाकिस्तानियों की सहायता से, यह बम विस्फोट किए थे. एहतेशाम और नासीर यह सीमीके उन कार्यकर्ताओं के नाम है. उनके साथ कमरुद्दीन नागोरी भी था. पाकिस्तानियों ने, खाली सूटकेस इंदौर के कटारिया मार्केट से खरीदी थी. इस जॉंच में यह भी स्पष्ट हुआ कि, उस सूटकेस में पॉंच बम रखे गए थे और टायमर स्विच से उनका विस्फोट किया गया.’’

एटीएस का झूठ
‘‘यह सबूत सामने होते हुए भी महाराष्ट्र का पुलीस विभाग, इस दिशा में आगे क्यों नहीं बढ़ रहा. ऐसा प्रश्‍न स्वाभाविक ही निर्माण होता है. ऐसा दिखता है कि, महाराष्ट्र पुलीस विभाग के कुछ लोगों को, समझौता एक्सप्रेस में हुए बम विस्फोट का मामला कैसे भी मालेगॉंव बम विस्फोट से जोड़ना था. महाराष्ट्र के दहशतवाद विरोधी दस्ते (एटीएस) ने, अपने वकील के मार्फत, विशेष न्यायाधीश को बताया कि, मालेगॉंव बम विस्फोट मामले के आरोपी कर्नल पुरोहित ने ही समझौता एक्सप्रेस में बम विस्फोट के लिए आरडीएक्स उपलब्ध कराया था. लेकिन नॅशनल सेक्युरिटी गार्डइस केन्द्र सरकार की यंत्रणा ने बताया कि, समझौता एक्सप्रेस में हुए बम विस्फोट में आरडीएक्स का प्रयोग नहीं किया गया था. पोटॅशियम क्लोरेट और सल्फर इन रासायनिक द्रव्यों का उपयोग किया गया था. तत्कालीन केन्द्रीय गृहमंत्री शिवराज पाटील ने भी इस विधान की पुष्टी की थी. मजे की बात तो यह है कि, उसी दिन मतलब १७-११-२००८ को दहशतवाद विरोधी दस्ते के वकील ने भी अपना पहले का बयान वापस लिया था. लेकिन जो हानि होनी थी वह तो हो चुकी थी. पाकिस्तान ने घोषित किया की, सचिव स्तर की बैठक में समझौता एक्सप्रेस पर हुए हमले में कर्नल पुरोहित के सहभाग का मुद्दा उपस्थित किया जाएगा. अंत में २० जनवरी २००९ को दशतवाद विरोधी दस्ते ने अधिकृत रूप में मान्य किया कि, समझौता एक्सप्रेस में हुए बम विस्फोट के लिए कर्नल पुरोहित ने आरडीएक्स उपलब्ध नहीं कराया था.  इस प्रकार समझौता एक्सप्रेस में हुए बम विस्फोट का केन्द्र, लष्कर-ए-तोयबा और सीमीसे कर्नल पुरोहित और उसके द्वारा भगवे रंग की ओर मोडा गया. क्या महाराष्ट्र पुलीस यंत्रणा पर दाऊद इब्राहिमब का प्रभाव है? इसकी जॉंच होनी चाहिए.’’
प्रश्‍न यह है कि, कौन सच बता रहा है? राष्ट्र संघ, अमेरिका, या शिंदे साहब? शिंदे साहब से उत्तर की अपेक्षा है.
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फ्रॅन्कॉई ग्वाटिये का लेख
दूसरा लेख है विदेशी पत्रकार फ्रॅन्कॉई ग्वाटिये (Francois Gautier) का. उनके लेख का शीर्षक है ‘‘हिंदू आतंकवाद नाम की कोई बात है?’’ (Is There Such a Thing As Hindu Terrorism)  उनके लेख को भी शिंदे के वक्तव्य का संदर्भ है. वे लिखते है -

‘‘मैं विदेशी संवाददाताओं में अपवादभूत संवाददाता हूँ. मेरा हिंदूओं पर प्रेम है. मैं जन्म से फ्रेंच हूँ. कॅथॉलिक हूँ. मतलब अहिंदू हूँ. मेरे अपने मतों के लिए मुझे ही श्रेय दिया जाना चाहिए. कारण, वह मत मुझे मेरे माता-पिता से नहीं मिले. मेरी शिक्षा या वंशपरंपरा से भी नहीं आए. १९८० से ला जर्नल दि जिनेव्हाऔर ला फिगॅरोमाचार पत्रों के लिए, दक्षिण आशिया के घटनाक्रमों का विश्‍लेषण करते समय मुझे जो दिखा और अनुभव हुआ, उससे मेरे यह मत बने है. धीरे-धीरे मुझे अनुभव हुआ कि, इस देश की विशेषताएँ हिंदू जीवनमूल्यों  (ethos) और हिंदूत्व के आधारभूत सच्ची आध्यात्मिकता में है.’’

हिंदूओं की विशेषता
‘‘लाखों ग्रामीणों में यह सादी, अंगभूत आध्यात्मिकता मैनें अनुभव की है. वह आपकी विविधता का स्वीकार करती है. फिर आप ईसाई हो या मुसलमान, अरब हो या ज्यू, फ्रेंच हो या चिनी. इस हिंदुत्व के कारण ही, भारतीय ईसाई फ्रेंच ईसाई से अलग होता है या भारतीय मुसलमान, सौदी मुसलमान से अलग लगता है. मैंने देखा है कि, हिंदूओं की ऐसी श्रद्धा है कि, ईश्‍वर अलग-अलग समय पर, अलग-अलग रूपों में, अलग-अलग नाम धारण कर सकता है. इस धारणा के कारण ही, हिंदूओं ने, कम से कम गत साडेतीन हजार वर्षों में, किसी देश पर फौजी हमला नहीं किया; उसी प्रकार, शक्ति या लालच से अपना धर्म किसी पर नहीं लादा.’’

वेदनादायी तुलना
‘‘ऐसा होते हुए भी, गुस्से में अपवादस्वरूप ईसाई चर्च जलाने वाले हिंदूओं की तुलना, निरपराध लोगों का कत्ल करने वाली सीमीजैसी संस्था के साथ की जाती है, तब मुझे पीडा होती है. क्रोधावेश में चर्च पर हमले हुए, लेकिन किसी की हत्या नहीं हुई, यह भी ध्यान में रखना चाहिए.’’
‘‘बाबरी मसजिद ध्वंस करना निंदनीय होने पर भी, उस मामले में, किसी मुसलमान की हत्या नहीं हुई थी. इसकी, बाबरी का बदला के लेने के लिए १९९३ में मुंबई में जो बम विस्फोट हुए, उससे जरा तुलना करें. मुंबई में हुए बम विस्फोट में सैकड़ों लोग मारे गए थे.’’

हिंदू ही आघात-लक्ष्य
‘‘मुझे यहॉं, उस तथाकथित हिंदू दहशतवाद के बारे में बताना ही चाहिए. अरबस्थान से आए पहले आक्रमण से ही, हिंदू ही आघात-लक्ष्य रहे हैं. तैमूरलंग ने सन् १३९९ में, एक ही दिन, एक लाख हिंदूओं का कत्ल किया था. पोर्तुगीजों ने इन्क्विझिशन के नाम पर, गोवा में, सैकड़ों ब्राह्मणों को सुली पर चढ़ा दिया था. आज भी हिंदूओं का उत्पीडन समाप्त नहीं हुआ है. कश्मीर के दस लाख हिंदू उसके भोग भोग रहे है. आज कुछ सौ की संख्या में ही हिंदू वहॉं बचे है. अन्य ने, दहशत से स्वयं को बचाने के लिए वहॉं से पलायन किया है. केवल गत चार वर्षों की अवधि में, संपूर्ण भारत में हुए अनेक बम विस्फोटों में सैकड़ों निरपराध हिंदू मारे गए है.’’

भेदभाव का बर्ताव
‘‘इस देश में हिंदू बहुसंख्य है. लेकिन उनका मजाक उडाया जाता है. उन्हें मूलभूत सुविधाएँ भी प्राप्त नहीं होती. अमरनाथ यात्रा का उदाहरण मेरे सामने है. सरकार हिंदूओं की है, फिर भी यह हो रहा है. और हज यात्रा को पुरस्कृत किया जाता है.’’
‘‘हिंदू वनवासीयों को आर्थिक लालच या आर्थिक फन्दें में फँसाकर ईसाई बनाया जाता है. उनमें के एक ८४ वर्षीय साधू और एक साध्वी की नृशंस हत्या की जाती है. लेकिन, कभी-कभी वर्षानुवर्ष भेड-बकरियों की तरह कत्ल सहने वाले हिंदू, जिन्हें महात्मा गांधी ने कायर कहा था, ताकत के साथ उठ खड़े होते है. ऐसा ही गुजरात में हुआ था. जम्मू, कंधमाल, मंगलोर, मालेगॉंव या अजमेर में हुआ था.’’

आँकड़े बताओ
‘‘अन्यत्र भी ऐसी घटनाएँ हो सकती है. हमने यह ध्यान में लेना चाहिए कि, यह घटनाएँ सियासी नेतृत्व ने नहीं कराई. वह उत्स्फूर्त उद्रेक होता है. दुनिया की जनसंख्या में १०० करोड़ हिंदू है. दुनिया के कानूनों का पालन करने वाले और उद्योगों में सफल लोगों में उनकी गिनति होती है. क्या हम उन्हें आतंकवादी कहेंगे? १९४७ से मुसलमानों की ओर से कितने हिंदू मारे गए और हिंदूओं की ओर से कितने मुसलमान मारे गए, इसके आँकड़े अन्य कोई प्रस्तुत करे या न करे कम से कम भाजप ने यह अवश्य करना चाहिए. वे आँकड़े ही सच क्या है यह बताएगे.’’

सुशील कुमार जी, आपके पास है इसका जबाब? शायद नहीं ही होगा; और रहा तो भी आप वह नहीं देगे. कारण वे हिंदू है!


-मा. गो. वैद्य 
अनुवाद : विकास कुलकर्णी
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