Sunday, 11 November 2012

भाजपा की अ-स्वस्थता


भाजपा में अ-स्वस्थता है. भाजपा की आलोचना करने के लिए या उस पार्टी की निंदा करने के लिए मैं यह नहीं कहता. भाजपा का स्वास्थ्य ठीक नहीं दिखता, ऐसा मुझे लगता है. उस पार्टी का स्वास्थ्य अच्छा रहे, उसकी एकजूट बनी रहे, उसके कार्यकर्ता और मुख्यत: नेता, अपनी ही पार्टी को कमजोर न बनाए, इस इच्छा से मैं यह कह रहा हूँ; और ऐसी इच्छा रखने वाला मैं अकेला ही नहीं. भाजपा के बारे में सहानुभूति रखने वाले, २०१४ के लोकसभा चुनाव में भाजपा अग्रेसरत्व प्राप्त करें ऐसी इच्छा रखने वाले असंख्य लोगों को ऐसा लगता है. विशेष यह कि ऐसी इच्छा रखने वालों में जो भाजपा में सक्रिय है, छोटे-बड़े पदों पर हैं, उनकी भी ऐसी ही इच्छा है.

अकालिक और अप्रस्तुत
इस कारण, राम जेठमलानी ने जो सार्वजनिक वक्तव्य किया है, उस बारे में खेद होता है. नीतीन गडकरी त्यागपत्र दे, ऐसी भाजपा के किसी कार्यकर्ता या सांसद की भावना हो सकती है. ऐसी भावना होने में अनुचित कुछ भी नहीं. लेकिन यह मुद्दा वे पार्टी के स्तर पर उठाना चाहिए. वैसे भी गडकरी की अध्यक्ष पद की कालावधि दिसंबर में मतलब महिना-डेढ माह बाद समाप्त हो रही है. पार्टी ने, अपने संविधान में संशोधन कर, लगातार दो बार एक ही व्यक्ति उस पद पर रह सकती है, ऐसा निश्‍चित किया है. इस कारण, गडकरी पुन: तीन वर्ष उस पद पर रह सकते है. लेकिन यह हुई संभावना. उन्हेंे उस पद पर आने देना या नहीं, यह पार्टी तय करे. जेठमलानी ने जिस समय कहा है कि गडकरी तुरंत त्यागपत्र दे, उसी समय, मोदी को प्रधानमंत्री बनाए, ऐसा भी उन्होंने बताया है. उन्हें यह बताने का भी अधिकार है. लेकिन २०१४ में प्रधानमंत्री कौन हो, इसकी चर्चा २०१२ में करना अकालिक है, अप्रस्तुत है, ऐसा मैंने इसी स्तंभ में लिखा है.

एक ही व्यक्ति के एक ही वक्तव्य में, गडकरी जाए और मोदी को प्रधानमंत्री करें, ऐसा उल्लेख आने के कारण, गडकरी विरोधी षड्यंत्र का केन्द्र गुजरात में है, ऐसा संदेह मन में आना स्वाभाविक है और गुजरात कहने के बाद, फिर संदेह की उंगली नरेन्द्र मोदी की ओर ही मुडेगी. प्रधानमंत्री बने ऐसी ऐसी इच्छा मोदी ने रखने में कुछ भी अनुचित नहीं. राजनीति के मुख्य प्रवाह में रहने वाले व्यक्ति की उच्च पद पर जाने की महत्त्वाकांक्षा होना अस्वाभाविक नहीं. समाचारपत्रों में प्रकाशित समाचारों से स्पष्ट होता है कि, लालकृष्ण अडवाणी ने स्वयं को इस स्पर्धा से दूर रखा है. नीतीन गडकरी ने भी पहले ही कहा है कि, मैं इस स्पर्धा में नहीं हूँ. लेकिन इस संदर्भ में नरेन्द्र मोदी के बारे में प्रसार माध्यमों में बहुत समाचार चलते रहते हैं. नरेन्द्र मोदी ने इन समाचारों का खंडन किया है, ऐसा कहीं दिखा नहीं. इससे मोदी को प्रधानमंत्री बनने में रस है, उनकी वैसी आकांक्षा है, ऐसा अर्थ कोई निकालता है तो उसे दोष नहीं दे सकते.   

अकालिक चर्चा
लेकिन, निश्‍चित कौन प्रधानमंत्री बनेगा, यह तय करने का समय अभी आया नहीं. वस्तुत: चुनकर आए सांसद अपना नेता चुनते है. जिस पार्टी या पार्टी ने समर्थन दिये गठबंधन का लोकसभा में बहुमत होगा, उसके नेता को राष्ट्रपति प्रधानमंत्री पद की शपथ देंगे. यह सच है कि, कुछ पार्टिंयॉं चुनाव के पहले ही अपना प्र्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार निश्‍चित कर उसके नेतृत्व में चुनाव लड़ती है. भाजपा ने भी इसी प्रकार से चुनाव लड़े थें. उस समय, पार्टी ने अटलबिहारी वाजपेयी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार निश्‍चित किया था. १९९६, १९९८ और १९९९ के तीनों लोकसभा के चुनाव भाजपा ने अटलबिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में लड़े थे. लेकिन यह सौभाग्य नरेन्द्र मोदी को भी प्राप्त होगा, ऐसे संकेत आज दिखाई नहीं देते. मेरी अल्पमतिनुसार, २०१३ के विधानसभाओं के चुनाव हुए बिना, भाजपा अपनी रणनीति निश्‍चित नहीं करेगी. फिर उसे प्रकट करना तो दूर की बात है. २०१३ में जिन राज्यों में विधानसभाओं के चुनाव हो रहे है, उनमें से अधिकांश राज्यों में भाजपा का अच्छाप्रभाव है. दिल्ली, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ, कर्नाटक ये वेे राज्य है. इनमें से तीन राज्यों में भाजपा की सरकारें है. दिल्ली और राजस्थान में भाजपा की सरकारें नहीं है, लेकिन इन दोनों ही स्थानों पर भाजपा की सरकारें आने जैसी स्थिति है. हाल ही संपन्न हुई दिल्ली राज्य में की महानगर पालिका के चुनाव में भाजपा ने कॉंग्रेस को पराभूत कर वहॉं की महापालिकाएँ अपने कब्जे में ली. भाजपा की २०१४ के लोकसभा के चुनाव की रणनीति २०१३ के विधानसभाओं के चुनाव परिणाम आने के बाद ही निश्‍चित होने की संभावना अधिक है.

उचित कदम
राम जेठमलानी के वक्तव्य के बाद उनके पुत्र महेश जेठमलानी ने पार्टी में के अपने पद से त्यागपत्र दिया है. वे भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारी समिति के सदस्य थे. अपने त्यागपत्र में वे कहते है कि, ‘‘भ्रष्टाचार के आरोपों का कलंक लगे अध्यक्ष के नीचे मैं काम नहीं कर सकूंगा. वह मुझे बौद्धिक और नैतिक इन दोनों दृष्टि से अनुचित लगता है.’’ महेश जेठमलानी ने जो मार्ग अपनाया वह मुझे योग्य लगता है. राम जेठमलानी ने भी उसी मार्ग का अनुसरण कर अपनी राज्यसभा की सदस्यता त्यागना उचित सिद्ध होगा. राम जेठमलानी ने कहा है कि, यशवंत सिन्हा, जसवंत सिंह और शत्रुघ्न सिन्हा का मत भी मेरे ही मत के समान है. उन्होंने भी पार्टी के पद छोड़ने का निर्णय लेना योग्य होगा. जिस पार्टी के सर्वोच्च पद पर कलंकितव्यक्ति होगी, उस पार्टी में कोई सयाना मनुष्य संतुष्ट कैसे रहेगा?

पार्टी का समर्थन
एक व्यक्ति ने और प्रसारमाध्यमों की एक टीम ने मुझे प्रश्‍न किया कि, राम जेठमलानी का वक्तव्य कितनी गंभीरता से ले. मैंने कहा, बहुत गंभीरता से लेने की आवश्यकता नहीं. उनके वक्तव्य की उपेक्षा करना ही योग्य होगा. विचार करें, भाजपा कोबढाने और उसके शक्तिसंपादन में जेठमलानी का कितना योगदान है? इसके अलावा, अनेक विषयों पर के उनके मत पार्टी के मतों से मेल नहीं खाते. जैसे कश्मीर प्रश्‍न के बारे में या प्रभु रामचन्द्र के बारे में. श्रीराम इतने बुरे होते तो जेठमलानी के माता-पिता ने उनका नाम रामक्यों रखा होता? खैर, वह एक स्वतंत्र विषय है. उसकी यहॉं चर्चा अप्रस्तुत है. हॉं, इतना सच है कि, जेठमलानी पिता-पुत्र के वक्तव्यों ने खलबली मचा दी. गडकरी के सौभाग्य से, पार्टी उनके समर्थन में खड़ी रही.

भाजपा के वरिष्ठ स्तर के अंतरंग नेताओं (कोअर ग्रुप) की दिल्ली में एक बैठक हुई. उस बैठक ने श्री गडकरी के नेतृत्व पर पूर्ण विश्‍वास व्यक्त किया. उस बैठक में जेठमलानी पिता-पुत्र के रहने की संभावना नहीं. लेकिन यशवंत सिन्हा और जसवंत सिंह अपेक्षित होंगे. वे उपस्थित थे या नहीं, इस बारे में पता नहीं चला. अडवाणी अनुपस्थित थे. औचित्य का विचार करे तो, उन्होंने उपस्थित रहना आवश्यक था, ऐसा मुझे लगता है. इस बैठक में भी सब ने अपने मत रखे होंगे. लेकिन जो निर्णय हुआ, फिर वह बहुमत से हुआ हो, अथवा एकमत से, वह सब का ही निर्णय साबित होता है. इस बैठक की विशेषता यह है कि, गडकरी उस बैठक में नहीं थे. उन्होंने योग्य निर्णय लिया ऐसा ही कोई भी कहेगा. इस कारण, उस बैठक में खुलकर चर्चा हुई होगी.

प्रश्‍न कायम
जेठमलानी की मॉंग के अनुसार गडकरी त्वरित त्यागपत्र नहीं देंगे, यह अब स्पष्ट हो चुका है. लेकिन वे पुन: दूसरी बार अध्यक्ष बनेंगे या नहीं, यह प्रश्‍न कायम है. उस संबंध में पार्टी ही निर्णय लेगी. उनके विरुद्ध लगे आरोपों की सरकार द्वारा जॉंच की जा रही है. एक जॉंच, कंपनी विभाग कीओर से तो दूसरी आयकर विभाग की ओर से हो रही है. गडकरी हिंमत से इस जॉंच का सामना कर रहे हैं. रॉबर्ट वढेरा के समान उन्होंने पीठ नहीं दिखाई. इस जॉंच केक्या निष्कर्ष आते है, इस पर उनकी अध्यक्ष पद की दूसरी पारी निर्भर रह सकती है. आगामी डेढ माह में इस जॉंच समिति की रिपोर्ट आएगी या नहीं, यह बता नहीं सकते. चेन्नई से प्रकाशित होने वाले हिंदूदैनिक के संवाद्दाता ने आयकर विभाग के प्राथमिक रिपोर्ट की उनके समाचारपत्र में प्रकाशित हुए समाचार की प्रति मुझे दी. इसका अर्थ आयकर विभाग ने समाचारपत्रों को समाचार देना शुरु किया है, ऐसा अंदाज लगाया जा सकता है. मेरे मत से यह अयोग्य है. उस समाचार में ऐसा कहा है कि, गडकरी ने स्थापन की पूर्ति कंपनी में जिन कंपनियों ने पैसा लगाया है, उनके व्यवहार में कुछ अनियमितता है.

इस रिपोर्ट को सही माना, तो भी वह उन कंपनियों का प्रश्‍न है. मेरा अंदाज है कि, गडकरी को पुन: अध्यक्ष पद न मिले, इसलिए विरोधी पार्टिंयों के लोग जिस प्रकार सक्रिय है, वैसे ही भाजपा में के भी कुछ लोग सहभागी है. विरोधी पार्टिंयॉं और मुख्यत: कॉंग्रेस को, गडकरी भ्रष्टाचारी है, यह दिखाने में इसलिए दिलचस्पी है कि, ऐसा कर उन्हें भाजपा भी उनकी ही पार्टी के समान भ्रष्टाचार में सनी पार्टी है, यह लोगों के गले उतारना है. जिससे २०१४ के लोकसभा के चुनाव में, भाजपा की ओर से कॉंग्रेस के भ्रष्टाचारी चरित्र की जैसी चिरफाड की जाने की संभावना है, उसकी हवा निकल जाय. पार्टी के अंदर जो विरोध है, उसका केन्द्र, ऊपर उल्लेख कियेनुसार गुजरात में है. नरेन्द्र मोदी को लगता होगा कि गडकरी पार्टी अध्यक्ष होगे, तो उनकी प्रधानमंत्री बनने की महत्त्वाकांक्षा पूरी नहीं होगी. वे यह भी दिखाना चाहते होगे कि, संजय जोशी के मामले में जैसा वे गडकरी को झुका सके, उसी प्रकार इस बारे में भी उन्हें हतप्रभ कर सकते है. अर्थात् यह सब अंदाज है. वह गलतफहमी या पूर्वग्रह से भी उत्पन्न हुए हो सकते है. लेकिन यह संदेह भाजपा के सामान्य कार्यकर्ता के मन में है, यह सच है. हमारी इच्छा इतनी ही है कि, व्यक्ति महत्त्व की नहीं, होनी भी नहीं चाहिए, लेकिन महत्त्व की होनी चाहिए हमारी संस्था, हमारा संगठन, हमारी पार्टी. भाजपा एक सियासी पार्टी है. वह एकजूट है, वह एकरस है, उसके नेताओं के बीच परस्पर सद्भाव है, उनके बीच मत्सर नहीं, ऐसा चित्र निर्माण होना चाहिए, ऐसी भाजपा के असंख्य कार्यकर्ताओं की और सहानुभूति धारकों की भी अपेक्षा है. इसमें ही पार्टी की भलाई है; और उसके वर्धिष्णुता का भरोसा भी है. क्या भाजपा के नेता यह अपेक्षा पूरी करेंगे? भाजपा का आरोग्य ठीक है, ऐसा वे दर्शाएंगे? आनेवाला समय ही इन प्रश्‍नों के सही उत्तर दे सकेगा.


- मा. गो. वैद्य
अनुवाद : विकास कुळकर्णी
babujivaidya@gmail.com

                                           

Tuesday, 6 November 2012

सूचना का अधिकार और सरकार की अस्वस्थता

                                                                                              
सूचना का अधिकार कानून (राईट टू इन्फर्मेशन ऍक्ट) हमारे देश में है. इस अधिकार के अंतर्गत, सामान्य नागरिक सरकारी निर्णयों के बारे में, अनजाने या  जानबूझकर अकारण गोपनीय रखी जानकारी पूछ सकता है और संबंधित विभाग को वह देनी पड़ती है. इस अधिकार के कारण, अनेक सरकारी घोटाले, सही में मंत्री और अन्य सरकारी अधिकारियों ने किए घोटाले सामने आए है. युवराज राहुल गांधी कहते है, और वह सच भी है कि, कॉंग्रेस की सरकार ने ही यह कानून पारित किया है. लेकिन इसके साथ यह भी नहीं भूल सकते कि महान् समाजसेवक अण्णा हजारे ने भी ऐसा कानून बने, इसके लिए आंदोलन किया था.

प्रधानमंत्री द्वारा आलोचना
इसके साथ ही यह भी सच है कि, यह कानून पारित करने के बारे में कॉंग्रेस सरकार के रणनीतिकारों को पछतावा हो रहा है. १२ अक्टूबर २०१२ को ‘केन्द्रीय सूचना आयोग’ (सेंट्रल इन्फर्मेशन कमिशन) द्वारा आयोजित सातवे राष्ट्रीय ‘सूचना अधिकार’ विषयक अधिवेशन (नॅशनल आरटीआय कॉन्फरन्स) में प्रधान मंत्री  डॉ. मनमोहन सिंह ने विद्यमान सूचना अधिकार के कानून की तीव्र आलोचना की. उन्होंने कहा, ‘‘सूचना के अधिकार का बहुत ही हल्के तरीके से  (Frivolous) उपयोग किया जा रहा है जो खीझ  (Vexatious) निर्माण करता है.’’  उन्होंने आगे कहा कि, ‘‘सूचना का अधिकार और निजी जीवन/जानकारी के बीच की सीमारेखा हमने समझनी चाहिए. हमारे संविधान ने, जीवन और निजीता  (Private life) के सुरक्षा का मूलभूत अधिकार दिया है. इस मूलभूत अधिकार का सम्मान रखा ही जाना चाहिए; इसके लिए जानकारी का जो विद्यमान कानून है, उसकी मर्यादा सीमित की जानी चाहिए.’’ ‘‘इस कानून का विधायक काम के लिए ही उपयोग होना चाहिए. सरकारी कामकाज में अधिक तत्परता लाकर, सरकारी यंत्रणा अधिक लोकोपयोगी बनाने के लिए यह कानून है. सरकारी अधिकारियों का उपहास कर, उनकी बदनामी करने के लिए यह कानून नहीं है,’’ ऐसा कहकर, निजी और सरकारी हिस्सेदारी के उद्योगों के बारे में इस कानून को स्वैर प्रवेश देने का उन्होंने विरोध किया है.

विशेषज्ञ समिति का मत
निजीता की सुरक्षा के लिए क्या प्रावधान करें इस बारे में सिफारिस करने के लिए सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति ए. पी. शाह की अध्यक्षता में एक विशेषज्ञ समिति नियुक्त की है ऐसी घोषणा प्रधान मंत्री ने इसी अधिवेशन में की. प्रधान मंत्री का भाषण होने के एक सप्ताह बाद ही शहा की विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट आई. दिलचस्प बात यह है कि, इस विशेषज्ञ समिति का मत प्रधानमंत्री के मत के एकदम विरुद्ध है. विशेषज्ञ समिति के मतानुसार, निजीता की सुरक्षा के लिए विद्यमान ‘सूचना के अधिकार’ में पर्याप्त प्रावधान है. इसके लिए विद्यमान कानून की सीमाओं का आकुंचन करने का कारण नहीं. प्रधान मंत्री और कॉंग्रेस के मंत्रिमंडल में के अनेक मंत्री, इसी समय नीजिता की सुरक्षा के लिए क्यों छटपटा रहे है, ऐसा प्रश्‍न किसी के भी मन में निर्माण हो सकता है. उसका उत्तर खोजना बहुत कठिन नहीं.

अस्वस्थता का कारण
कॉंग्रेस पार्टी की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने अपने स्वास्थ्य तथा अन्य कारणों के लिए विदेश दौरे किए है. सूचना का अधिकार यह जानना चाहता है कि, इसके लिए हुआ खर्च सरकार ने किया है या सोनिया जी ने? इसमें अनुचित क्या है? सोनिया जी ने वह खर्च किया होगा, तो अन्य किसे ने उसमें मुँह मारने का कारण नहीं. लेकिन वह खर्च सरकार ने किया होगा, तो नागरिकों को उस बारे में पूछने का अधिकार है. सरकारी पैसा, जनता से वसूल किए कर से आता है. इस कारण, उस पैसे के विनियोग के बारे में प्रश्‍न पूछने का अधिकार जनता को है. सोनिया जी के विदेश दौरे के बारे में प्रश्‍न उपस्थित होने के बाद, सरकार ने बताया कि, वह खर्च सरकार ने नहीं किया. बस्. विषय समाप्त. लेकिन सोनिया जी के संदर्भ में वह प्रश्‍न है, इस कारण वह सौ प्रतिशत नीजि साबित होता है, ऐसा नहीं कहा जा सकता.

वढेरा का मामला
तथापि, सोनिया जी की अपेक्षा उनके दामाद रॉबर्ट वढेरा के लिए सरकार ने दी जमीन का प्रश्‍न अधिक चुभने वाला है. जमीन सरकार ने मतलब हरियाणा सरकार ने दी. वह सही दाम में दी, या रॉबर्ट वढेरा कॉंग्रेस की अध्यक्ष के दामाद होने के कारण उन्हें सस्ते में दी और उसे बेचकर उन्होंने भरपूर मुनाफा कमाया, यह जानने का अधिकार नागरिकों को है. हरियाणा में की जमीन, वहॉं के मुख्यमंत्री भूपेन्द्रसिंह हुड्डा की नीजि जमीन होती, तो प्रश्‍न पूछने का कोई औचित्य नहीं था. लेकिन वह सरकारी जमीन थी; मतलब जनता की थी; उसे अपनी मर्जी के अनुसार बॉंटने का अधिकार न हुड्डा को है, और न हरियाणा सरकार को. यह ठीक हुआ कि, इस जमीन के सौदे में कुछ भी बेकायदा नहीं, यह सरकार ने स्पष्ट किया है. लेकिन वह जमीन बेचकर वढेरा ने प्रचंड पैसा कमाया होगा, तो उस बारे में, सरकार से पूछताछ करने में कुछ भी अनुचित नहीं.

मंत्री या चाटुकार?
वास्तव में वढेरा ने ही स्वयं सामने आकर अपना बचाव करना सही होता. भाजपा के अध्यक्ष नीतीन गडकरी के समान, मेरे सब आर्थिक व्यवहार की किसी भी सरकारी यंत्रणा से जॉंच कराए ऐसा उन्होंने छाती ठोककर बताना चाहिए था. लेकिन वे कुछ भी नहीं बताते, और इस अवसर का लाभ उठाकर, उनके बचाव के लिए केन्द्र में के अनेक मंत्री जब सामने आते है, तब वहॉं कुछ गडबड है ऐसा ही लगेगा. कोई ऐसा न कहे ऐसा किसी का अभिप्राय होगा, तो केन्द्रीय मंत्री सोनिया गांधी के परिवार के शागीर्द है, ऐसा कहना पड़ेगा. वे जनप्रतिनिधि होने के कारण नहीं,  गांधी परिवार के चाटुकार होने के नाते वहॉं तक पहुँचे है, ऐसा निष्कर्ष निकालना होगा.
इन मंत्रियों ने क्या कहा यह ध्यान देने लायक है. नए परराष्ट्र मंत्री सलमान खुर्शीद ने कहा, ‘‘गांधी परिवार के लिए मैं जान भी दूँगा.’’ इतना ही कहकर वे रूके नहीं. वढेरा के विरुद्ध आरोप लगाने वाले ‘भ्रष्टाचार विरोधी भारत’ आंदोलन के एक अग्रगण्य नेता ऍड. प्रशांत भूषण को गांधी परिवार से संबंधित विवादित मामले कैसे मिलते है, ऐसा भी प्रश्‍न उन्होंने उठाया. हम ऐसा मान ले कि, प्रशांत भूषण एक भ्रष्ट व्यक्ति है. लेकिन इससे वढेरा का निर्दोषित्व कैसे सिद्ध होता है? फिर मनीष तिवारी आगे आए. बोले, केजरीवाल और कंपनी भाजपा की बी-टीम है. होगी भी. यह बी-टीम ही भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के विरुद्ध भी आरोप लगा रही है, इसके बारे में तिवारी जी का क्या स्पष्टीकरण है, यह तो उन्हें ही पता होगा. फिर राजीव शुक्ला ने कमान संभाली. उन्होंने कहा, सरकार और वढेरा के बीच कोई साठगांठ नहीं है. लेकिन यह सब वढेरा को बताने दो! प्रशांत भूषण को भी हिमाचल प्रदेश में ऐसी ही जमीन मिली है, ऐसा उन्होंने कहा. लेकिन इससे भी वढेरा को हरियाणा सरकार की ओर से औने-पौने दामों में जमीन मिलने का भेद कैसे खुलता है? बाद में मोईली आगे बढ़े. तुरंत कर्नाटक के राज्यपाल भी वढेरा को बचाने दौड पड़े. अन्य एक मंत्री जयंती नटराजन् से टी. व्ही. चर्चा में इस बारे में प्रश्‍न पूछे जाने पर वे हडबडा गई. बहुत क्रोधित हुई. यह सब आरोप बेशरमी के है, ऐसा कह दिया. सूचना मंत्री अंबिका सोनी ने कहा, केजरीवाल राजनीति में अपनी प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिए ऐसे आरोप लगा रहे है. लेकिन राजनीति में हो या जनता के बीच, अपनी प्रतिष्ठा बढ़ाने का उद्योग करना अपराध है? वे सूचना एवं प्रसार विभाग की मंत्री है! इस कारण उन्होंने टी. व्ही. चॅनेल्स पर भी आरोप लगाया कि, चैनेल्स, केजरीवाल के आरोपों को बेशुमार प्रसिद्धि देकर, उनकी सहायता कर रहे है! टी. व्ही. वाले क्या करें, यह भी तो श्रीमती सोनी बताएँ? केन्द्रीय मंत्रिमंडल में ऐसे बालबुद्धि के लोग होंगे, ऐसी किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी. खुर्शीद से सोनी तक, सब ने अपने अपने मंत्री पद का दुरुपयोग किया है. उस पद का अपमान किया है. डॉ. मनमोहन सिंह कहते है कि, व्यक्ति की नीजिता की सुरक्षा होनी चाहिए. यह माना भी जा सकता है. लेकिन वढेरा जैसे नीजि (सामान्य) व्यक्ति के बचाव के लिए, मनमोहन सिंह की पूरी सरकार इतनी सक्रिय होने का क्या कारण है? इस प्रश्‍न का सम्यक उत्तर प्रधानमंत्री से अपेक्षित है.

नीजि की मर्यादा
यह सर्वविदित है कि, अनेक सरकारी उपक्रमों में सरकार और नीजि उद्योगपतियों की भागीदारी है. इन नीजि उद्योगपतियों के उद्योगों की सुरक्षा नहीं हुई, तो विकास योजनाओं पर परिणाम होगा ऐसा कहा जा रहा है. लेकिन यह सयुक्तिक नहीं. नीजि उद्योजक सरकारी उपक्रम का भागीदार होने के बाद, उसकी नीजिता समाप्त होती है. उसके व्यक्तिगत जीवन के संदर्भ में, मतलब उसकी पत्नी कौन, बच्चें क्या करते है, उनके क्या उद्योग है - इत्यादि संबंधित प्रश्‍न ही ‘नीजि’के अंतर्गत आएगे. उनकी सरकारी उद्योगों में की भागीदारी और उनकी ही भागीदारी क्यों, अन्य उद्योजकों को दूर रखा गया होगा तो क्यों, यह पूछने का अधिकार जनता को है.

अक्ल ठिकाने आई
अनेक मंत्रियों का यह जो हास्यास्पद वर्तन हुआ और स्वयं प्रधानमंत्री ने भी, सूचना आयोग के अधिवेशन में जो कहा, उस सब का एक अच्छा परिणाम हुआ. चारों ओर से उन पर आलोचना के कोडे बरसे और सरकार की अक्ल ठिकाने आई. सूचना अधिकार की कक्षा आकुंचित करने का जो सरकार का मानस था और उस मानस के अनुसार, सरकार उस कानून में बदल करने की योजना बना रही थी, उसे ब्रेक लग गया. सरकारी कामकाज फाईलों पर चलता है. उन पर सरकारी अधिकारी उनकी श्रेणी के अनुसार अभिप्राय दर्ज करते है. उन टिप्पणियों को सूचना के अधिकार से बाहर रखें, ऐसा निर्णय सरकार ने निश्‍चित किया. उसके अनुसार सरकार ने संशोधन भी तैयार किया. इन संशोधनों को केन्द्रीय सेवा आयोग (युनियन पब्लिक सर्व्हिस कमिशन) का समर्थन भी हासिल था. दूसरा संशोधन, केन्द्रीय सेवा आयोग जो स्पर्धा परीक्षा लेता है, उन परीक्षाओं की प्रक्रियाओं को, सूचना के अधिकार से परे रखने का था. शायद इस संशोधन की सूचना आयोग की ही ओर से आई होगी और सरकार ने वह मान्य की होगी. यह संशोधन तैयार थे. मंत्रिमंडल ने उन्हें सम्मति भी दी थी. लेकिन उस संबंध में विधेयक संसद में प्रस्तुत नहीं किया गया था. वह किसी भी समय प्रस्तुत किया जा सकता था. लेकिन ताजा समाचार यह है कि, सरकार ने अपना यह इरादा बदल दिया है. केवल सर्वोच्च न्यायालय के कार्यालय को इस कानून की परिधी से परे रखें या नहीं, केवल इस पर ही विचार किया जा रहा है. वह शीघ्र ही पूर्ण होगा, और सरकारी निर्णय यथाशीघ्र जनता के सामने आएगा, ऐसी आशा है. केवल रक्षा मंत्रालय अथवा खुफिया विभाग की ही जानकारी गोपनीय होनी चाहिए. फाईलों पर की अधिकारियों की टिपप्पणियॉं भी, सूचना के अधिकार से परे रखी गई, तो ‘आदर्श’ घोटाले में फँसे महाराष्ट्र के भूतपूर्व मुख्यमंत्रियों जैसे लोगों के घोटाले कभी सामने आ ही नहीं सकते. तात्पर्य यह कि, सूचना के अधिकार का कानून उपयुक्त है. उसकी धाक सरकारी यंत्रणा पर होनी ही चाहिए. अपना प्रशासन स्वच्छ और पारदर्शी हो, ऐसी मन से इच्छा रखने वाली सरकार ने तो ऐसे कानून का सच्चे मन से स्वागत ही करना चाहिए.

- मा. गो. वैद्य
(अनुवाद : विकास कुलकर्णी )
babujivaidya@gmail.com
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Monday, 29 October 2012

नीतीन गडकरी, रॉबर्ट वढेरा और भारत सरकार

इस विषय पर नहीं लिखना, ऐसा मैंने तय किया था. भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलनके नेता अरविंद केजरीवाल ने भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीन गडकरी पर, एक विशेष पत्रपरिषद में जो आरोप किए, उस बारे में गत सप्ताह ही भाष्यमें लेख आया था. टाईम्स ऑफ इंडियामें भी उस बारे में विस्तारपूर्वक समाचार प्रकाशित हुआ था; ‘पीटीआयवृत्तसंस्था ने भी मेरा अभिप्राय लेकर समाचारपत्रों को भेजा था. लेकिन गडकरी पर नए आरोप किए गए है. वह किसी व्यक्ति ने या संगठन ने नहीं किए. वह कुछ प्रसार माध्यमों की करामत दिखती है. अच्छी बात है. शोध पत्रकारितायह पत्रकार जगत का एक खास पैलू है. इस कारण उस माध्यम के विरुद्ध शिकायत करने का प्रयोजन नहीं.

अंतर
आश्‍चर्य इस बात का है कि, सरकार ने तुरंत इसकी दखल ली. ११ अगस्त २०१२ को मुसलमानों में के आतंवादियों ने सीधे पुलीस पर किए हमले की भी इतनी शीघ्रता से, केन्द्र सरकार ने, दखल लेने का समाचार नहीं. लेकिन गडकरी के विरुद्ध के आरोप मानो हमारे देश पर आई एक भीषण आपत्ति है, ऐसा मानकर सरकार ने उन आरोपों की शीघ्रता से दखल ली. कंपनी व्यवहार विभाग के मंत्री वीरप्पा मोईली ने कहा, ‘‘इस मामले की हम डिस्क्रीट इन्क्वायरीकरेंगे.’’ हमारी अंग्रेजी कुछ कमजोर है, इसलिए डिस्क्रीट शब्द का अर्थ अंग्रेजी शब्दकोश मे देखा. वहॉं डिस्क्रीट का न्यायपूर्ण और समझदारीपूर्णऐसे अर्थ मिले. ठीक लगा. अनेक गंभीर विषयों पर मौन का आसरा लेने वाली हमारी इस सरकार को न्यायऔर समझदारी से भी लगाव है, यह पता चला. लेकिन यह समाधान बहुत ही अल्पजीवी साबित हुआ. कारण, कॉंग्रेस की अध्यक्ष सोनिया गॉंधी के दामाद रॉबर्ट वढेरा की जॉंच क्यों नहीं, ऐसा जब किसी ने मोईली से पूछा, तब उनका उत्तर था कि, वढेरा का मामला अलग है. और क्या या सही नहीं है? वढेरा सोनिया गॉंधी के दामाद है; और गडकरी नहीं. पल भर के लिए मान ले कि, नीतीन गडकरी सोनिया जी के दामाद होते, तो मोईली का विभाग इतनी शीघ्रता से सक्रिय होता? और क्या यह भी सच नहीं है कि, कहॉं वढेरा और कहॉं गडकरी? एक है केन्द्र की सत्तारूढ पार्टी के अध्यक्ष के सम्मानीय दामाद, तो दूसरे है विपक्ष के सामान्य अध्यक्ष!

डर किस बात का?
मैं केजरीवाल की बात समझ सकता हूँ. उन्हें अपनी नई पार्टी की प्रतिष्ठापना करनी है. विद्यमान राजनीतिक पार्टिंयॉं किस प्रकार दुर्गुणों से सनी है, यह बताने के लिए उन्होने कीचड़ उछालना स्वाभाविक मानना चाहिए. लेकिन कॉंग्रेस ने गडकरी से डरने का क्या कारण है? जेठमलानी की छटपटाहट समझी जा सकती है. वे बेचारे राज्य सभा के सामान्य सदस्य है. पार्टी के संगठन में या संसदीय दल में उन्हें विशेष स्थान नहीं. इसका कारण, गडकरी अध्यक्ष है, ऐसी उनकी गलतफहमी हो सकती है. और गडकरी ही फिर तीन वर्ष अध्यक्ष रहे, तो उनकी ऐसी ही दुर्दशा होती रहेगी, ऐसा उन्हें लगता हो तो इसमें अनुचित कुछ भी नहीं. लेकिन कॉंग्रेस क्यों अस्वस्थ हो रही है? बेताल बड़बड़ाने के लिए विख्यात कॉंग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह ने डरने का क्या कारण है? गनीमत है कि, उन्होंने कॉंग्रेस के महासचिव के नाते प्रधानमंत्री से गडकरी के मामले की जॉंच करने के लिए पत्र नहीं लिखा. वे कहते है, मैंने व्यक्तिगत रूप में वह पत्र लिखा है. लेकिन, दिग्विजय सिंह जी, सीधे प्रधानमंत्री को यह पत्र भेजने की क्या आवश्यकता थी? क्या यह पाकिस्तान या चीन ने भारत पर हमला करने जैसा गंभीर मामला है? और आपकी सरकार उसे गंभीरता से नहीं लेगी, ऐसा आपको लगता है? लेकिन दिग्विजय सिंह जैसे बेताल नेता को यह पूछने से कोई उपयोग नहीं. फिर भी, यह पूछा जा सकता है कि, २ जी स्पेक्ट्रम घोटाला, राष्ट्रकुल क्रीड़ा घोटाला, कोयला बटँवारा घोटाला, वढेरा का घोटाला, इस बारे में आपने व्यक्तिगत स्तर पर ही सही, कोई पत्र भेजने की जानकारी नहीं. क्या गडकरी का आरोपित घोटाला, इनसब घोटालों से भयंकर है?          

पक्षपाती सरकार
दि. २४ को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का विजयादशमी उत्सव समाप्त होते ही, प्रसार माध्यमों के प्रतिनिधि संघ के प्रचार प्रमुख डॉ. मनमोहन वैद्य से मिले, और उनसे गडकरी के तथाकथित घोटाले से संबंधित प्रश्‍न पूछा. उन्होंने उत्तर दिया कि, यह मिडिया ट्रायलहै. मतलब प्रसार माध्यमों ने शुरु किया मुकद्दमा. उन्होंने क्या गलत कहा? किसने खोज निकाला यह तथाकथित घोटाला? और किसने इस घोटाले को भरपूर कर प्रसिद्धि दी? प्रसारमाध्यमों ने ही! वढेरा का घोटाला सूचना अधिकार कानून से बाहर आया. अरविंद केजरीवाल ने सार्वजनिक रूप में उनके ऊपर आरोप किए है. क्या प्रतिक्रिया थी कॉंग्रेस की? सही कहे तो भारत सरकार की? स्वयं प्रधानमंत्री ने सूचना का अधिकार आकुंचित करने का मानस प्रकट किया. उन्होंने कहा, वह कायदा व्यक्ति के नीजि जीवन पर अतिक्रमण कर रहा है; उसे मर्यादा लगानी होगी. प्रधानमंत्री ने किए इस वक्तव्य को वढेरा के घोटाले - जो सूचना अधिकार कानून के माध्यम से प्रकट हुए - की पृष्ठभूमि थी. वह एक व्यक्ति का नीजि मामला था, तो फिर उनके बचाव के लिए सलमान खुर्शीद, पी. चिदंबरम्, अंबिका सोनी, जयंती नटराजन्, वीरप्पा मोईली, इन मंत्रियों ने दौडकर आने का क्या कारण? वढेरा का मामला, वैसे तो कॉंग्रेस का भी मामला नहीं. एक नीजि व्यक्ति का मामला है. उनके लिए कॉंग्रेस के प्रवक्ता मनीष तिवारी और राजीव शुक्ला ने स्पष्टीकरण देने का क्या कारण? क्या गडकरी का पूर्ति उद्योग सरकारी उद्योग है? या भाजपा का उद्योग है? या, जिन्होंने सरकार से शिकायत कर जॉंच की मांग की है, वे उस उद्योग के भागधारक है? समाचारपत्रों में छपे समाचारों के आधार पर निर्णय लेने की अपेक्षा, सरकार ने पारित किये कानून से जो सामने आया है, और जो पहली नज़र में तो समर्थनीय लगता है, उस बारे में तुरंत निर्णय लेना उचित सिद्ध होता. लेकिन सरकार ने वह नहीं किया. विपरीत सरकार ने अपनी कृति से वह पक्षपाती है यह सिद्ध किया है.

जबाब दो
लेख के आरंभ में ही मैंने कहा है कि, इस विषय पर लिखने का मेरा विचार नहीं था. लेकिन २५ अक्टूबर को तीन चैनेल के प्रतिनिधि मुझसे मिलने घर आये थे. पहले ई टीव्हीवाले आये, फिर  आज तक के और अंत में एनडीटीव्ही के. सब के प्रश्‍न गडकरी पर लगे आरोपों के बारे में थे. एनडीटीव्ही के प्रतिनिधि के आने तक मुझे, आयकर विभाग की जॉंच शुरू होने की जानकारी नहीं थी. वह जानकारी उन्होंने दी. मैंने कहा, हो जाने दो जॉंच. सरकारी कंपनी विभाग जॉंच करेगा, ऐसी जानकारी मिलने के बाद गडकरी लापता नहीं हुए या उन्होंने मौन भी धारण नहीं किया. उन्होंने कहा, अवश्य जॉंच करो. वढेरा की है ऐसा कहने की हिंमत? खुर्शीद-चिदंबरम् और अन्य मंत्रियों की है यह हिंमत? या मनीष तिवारी और कॉंग्रेस के दूसरे प्रवक्ताओं के मुँह से ऐसे हिंमतपूर्ण शब्द क्यों नहीं निकलते? इस स्थिति में, वढेरा के विरुद्ध के आरोपों पर से जनता और प्रसार माध्यमों का ध्यान हटाने के लिए, किसी प्रसारमाध्यम को अपने साथ मिलाकर, कॉंग्रेस ने, गडकरी के विरुद्ध के तथाकथित आरोपों का ढिंढोरा पिटना शुरू किया है, ऐसा आरोप किसी ने किया तो उसे कैसे दोष दे सकते है? किसी चोरी का समर्थन करने के लिए, दूसरा भी चोर है, ऐसा चिल्ला चिल्ला कर बताना उचित है? दूसरा कोई चोर होगा, तो उसे सज़ा दो; लेकिन इससे पहला चोर निर्दोष कैसे सिद्ध होता है? कॉंग्रेस के प्रवक्ता, मोईली जैसे ज्येष्ठ नेता और दिग्विजय सिंह जैसे बेताल नेताओं ने इसका जबाब देना चाहिए.

मुझसे पूछे गए प्रश्‍न
दूरदर्शन चॅनेल वालों ने मुझे जेठमलानी के वक्तव्य के बारे में भी प्रश्‍न पूछे. मैंने कहा, ‘‘यह उनका व्यक्तिगत मत है. ऐसा मत रखने और उसे प्रकट करने का उन्हें अधिकार है. लेकिन गडकरी त्यागपत्र दे, ऐसा पार्टी का मत होगा, ऐसा मुझे नहीं लगता. गडकरी ने किसी भी जॉंच के लिए तैयारी दिखाने पर स्वयं अडवाणी ने उनकी प्रशंसा की है; और भाजपा में जेठमलानी की अपेक्षा, अडवानी के मत को अधिक वजन है. श्रीमती सुषमा स्वराज ने भी, ऐसा ही प्रतिपादन किया है.’’
दूसरा प्रश्‍न पूछा गया कि, इन आरोपों के कारण, गडकरी का दुबारा पार्टी अध्यक्ष बनना कठिन हुआ है? मैंने उत्तर दिया, ‘‘मुझे ऐसा नहीं लगता. अपने पार्टी का संविधान कैसा हो, उसमें कब और क्या संशोधन करे, यह उस पार्टी का प्रश्‍न है; और संविधान संशोधन यह क्या कोई अनोखी बात है? हमारे देश के महान् विद्वानों ने तैयार किए हमारे संविधान में गत ६५ वर्षों में सौ से अधिक संशोधन हुए है. पहला संशोधन तो संविधान पारित करने के एक वर्ष से भी कम समय में ही करना पड़ा था. भाजपा ने अपने अधिकार में संविधान संशोधन किया और गडकरी के पुन: अध्यक्ष बनने का रास्ता खुला किया, इसमें अन्य किसी ने आक्षेप लेने का क्या कारण है? और यह संविधान संशोधन केवल राष्ट्रीय अध्यक्ष के लिए ही नहीं, सब पदाधिकारियों के लिए है.’’

बदनामी में ही दिलचस्पी
मैंने यह भी कहा कि, आपको जो गैरव्यवहार लगते है, उनका संबंध ठेकेदार म्हैसकर से है. किसी ने कहा है कि, गलत पते दिये है. मैंने पूछा, क्या पूर्ति उद्योग ने गलत पते दिये है? फिर जॉंच म्हैसकर की करो. लेकिन इसमें लोगों को दिलचस्पी होने का कारण नहीं. दिलचस्पी गडकरी को बदनाम करने में है. इसलिए यह सब भाग-दौड चल रही है. प्रकाशित हुए समाचारों से जानकारी मिलती है कि, म्हैसकर की कंपनी ने १६४ करोड़ रुपये कर्ज पूर्ति उद्योग समूह को दिया. उस कर्ज पर १४ प्रतिशत ब्याज लगा है. पूर्ति उद्योग ने उस कर्ज में से ८० करोड़ रुपयों का भुगतान, ब्याज के साथ किया है. यह कर्ज २००९ में दिया गया है. ऐसा मान ले कि, गडकरी ने सार्वजनिक निर्माण मंत्री रहते समय म्हैसकर को उपकृत किया था. लेकिन गडकरी का मंत्री पद १९९९ में ही गया. उस गठबंधन की सरकार ही नहीं रही. १३ वर्ष तक उन तथाकथित उपकारों की याद रखकर म्हैसकर ने यह कर्ज दिया, ऐसा जिसे मानना है, वह माने. लेकिन मेरे जैसे सामान्य बुद्धि के मनुष्य तो को इसमें कोई साठगॉंठ नहीं दिखती.

संघ के संबंध में
फिर मुझे संघ के संबंध में प्रश्‍न पूछा गया. इस बारे में संघ को क्या लगता है? मैंने उत्तर दिया, ‘‘संघ को कुछ लगने का संबंध ही कहा है? भाजपा अपना कारोबार देखने के लिए सक्षम है. स्वायत्त है. पार्टी को जो उचित लगेगा, वह निर्णय लेगी.’’ इस प्रश्‍न की पृष्ठभूमि, शायद २४ अक्टूबर के इंडियन एक्सप्रेसमें प्रकाशित समाचार की हो सकती है. उस समाचार में कहा गया है कि, २ और ४ नवंबर को चेन्नई में संघ के अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल की बैठक है, उसमें इस मामले की चर्चा होगी. कार्यकारी मंडल की बैठक कब और कहॉं है, इसकी मुझे जानकारी नहीं थी. लेकिन मुझे निश्‍चित ऐसा लगता है कि, उस बैठक में इस मामले की चर्चा होने का कारण नहीं. तथापि संघ को इस विवाद में लपेटे बिना, कुछ लोगों का समाधान नहीं होगा. गुरुवार को झी चॅनेल के प्रतिनिधि ने दूरध्वनि कर, मुझे महाराष्ट्र प्रदेश कॉंग्रेस के अध्यक्ष माणिकराव ठाकरे ने संघ पर लगाए आरोपों की जानकारी दी. मैंने सायंकाल सात बजे सह्याद्री चैनेल के समाचार सुने. उनमें माणिकराव के आरोपों का समाचार था. ठाकरे का आरोप है कि, गडकरी सार्वजनिक निर्माण मंत्री थे, उस समय उन्होंने, संघ के कार्यालय के भवन के लिए पैसे दिये. संघ के कार्यालय का कौनसा भवन? यह ठाकरे ने नहीं बताया. क्योंकि वे बता ही नहीं सकते. संघ कार्यालय का जो भवन महल भाग में है और जो डॉ. हेडगेवार भवन के नाम से प्रसिद्ध है, उसका निर्माण १९४६ में ही पूर्ण हुआ था. उस समय गडकरी का जन्म भी नहीं हुआ था. शायद माणिकराव का भी नहीं हुआ होगा. फिर इस पुराने भवन की कुछ पुनर्रचना की गई. वह २००६ में. उस समय गडकरी कहॉं मंत्री थे? रेशिमबाग में का नया निर्माण कार्य गत एक-दो वर्षों में का है. ठाकरे प्रदेश कॉंग्रेस कमेटी के अध्यक्ष इस जिम्मेदारी के पद पर है; उन्होंने अक्ल का ऐसा दिवालियापन प्रदर्शित करना ठीक नहीं. हॉं, यह संघ को भी इस विवाद में लपेटने का उनका, मतलब कॉंग्रेस का प्रयास हो सकता है. लेकिन वह सफल नहीं होगा. संघ को पैसा कौन देता है, यह नागपुर के समीप यवतमाल में जिंदगी गुजारने वाले माणिकराव को पता नहीं होगा, तो उनकी मूढता पर दया करना ही योग्य है. उन्हें उत्तर देना निरर्थक है.

तात्पर्य
तात्पर्य यह कि, भारत सरकार ने गडकरी पर लगे आरोपों के संदर्भ में जो तत्परता दिखाई, वैसी ही वढेरा पर लगे आरोपों के बारे में भी दिखाए. गडकरी जैसे जॉंच का सामना कर रहे है, वैसा ही वढेरा भी करे. जॉंच से भागना उन्हें शोभा नहीं देता, और सरकार ने उनका समर्थन करना तो सरकार को भी शोभा नहीं देता.


- मा. गो. वैद्य
अनुवाद : विकास कुलकर्णी
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