Friday, 21 February 2014

यह षडयंत्र किसका? और किस लिये?
                                         -मा. गो. वैद्य
समझौता एक्सप्रेस, अजमेर दर्गाह और मक्का मस्जिद (हैद्राबाद) बॉम्बस्फोट मामले में एक आरोपी, स्वामी असीमानंद जी, जो  अभी हरयाणा के अम्बाला जेल में बंद हैं, के एक कथित बयान ने हंगामा खडा कर दिया । उस बयान में, असीमानंद जी ने यह कहा है, कि समझौता एक्सप्रेस, अजमेर शरीफ आदि स्थानों पर जो बम धमाके हुये, उनके लिये राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विद्यमान सरसंघचालक, जो उस समय संघ के सरकार्यवाह थे श्री मोहन जी भागवत और संघ के केन्द्रीय कार्यकारी मण्डल के एक सदस्य श्री इन्द्रेश कुमार जी से परामर्श हुआ था और उन्हीं की प्रेरणा से ये धमाके किये गये थे। असीमानंद जी का यह आरोपित कथन, ‘कॅराव्हाननामक पत्रिका  के 1 फरवरी 2014 के अंक में प्रकाशित हुआ है। यह बयान उन्होंने  लीना गीता रघुनाथ इस महिला को दिये साक्षात्कार का हिस्सा है। यह स्पष्ट है कि रा. स्व. संघ हिंसात्मक कारवाईयों का पक्षधर है यह बताना ही इस तथाकथित वक्तव्य का मकसद है।
संघ और हिंसा
हम कई वर्षों से संघ को जानते हैं। और हम पूरे विश्वास से कह सकते हैं कि संघ का ना सिद्धान्त ना व्यवहार हिंसा को प्रोत्साहित करनेवाला है। हम यह भी जानते हैं कि हिंसा का सिद्धान्तत: गौरव करनेवाली विचारधाराएं हैं और हिंसा का आचरण करनेवाले आन्दोलन भी हैं। सभी लोक नक्षलवादी, पीपल्स वॉर ग्रुप, लष्कर-ए-तोयबा, हिजबुल मुजाहिदीन, सीमी आदि नामों से चलनेवाले हिंसात्मक आन्दोलनों से परिचित हैं। संघ का कार्य आरम्भ से ही राष्ट्रीय चरित्रसम्पन्न व्यक्ति निर्माण का है, जिस में हिंसा को कोई स्थान ही नहीं रह सकता। यह बात, जिन्होंने अपनी आँखो पर द्वेष के चष्मे लगाये नहीं है, ऐसे सब लोग भलीभाँति जानते हैं।
सुनियोजित षडयंत्र
उपरिलिखित समाचार की पृष्ठभूमि यदि हम ध्यान में लेते हैं, तो यह समझ में देर लगने की आवश्यकता नहीं कि यह एक सुनियोजित षडयंत्र है। प्रकाशित समाचार बताता है कि लीना गीता रघुनाथ नामक एक महिलाने अम्बाला के जेल में जाकर असीमानंद जी का साक्षात्कार लिया। हम भी कारागृह में रह चुके हैं। एक बार नहीं, दो बार। किन्तु कोई पत्रकार हम से मिल नहीं पाया। कारण, आरोपी को अखबार से मिलने की अनुमति ही मिलती नहीं थी। अब जेल के प्रशासन के नियम बदल गये होंगे तो बात अलग है। यह भी एक मजे की बात है कि उक्त महिला एक पत्रकार के नाते असीमानंद जी से मिलने नहीं गई थी। वह एक वकील के नाते गई थी। क्यौ? यह बहाना इसी लिये कि वकील आरोपी से मिल सकता है?। किन्तु स्वामी जी ने उन्हें बताया कि उनके अपने अलग वकील हैं और उन्हें अन्य वकील की आवश्यकता नहीं है। यह घटना है 9 जनवरी 2014 की। किन्तु इस वकील महोदया का असीमानंद जी के बारे में करुणा का उबालशान्त नहीं हुआ। वे फिरसे दिनांक 17 जनवरी को अम्बाला जेल गयी। इस समय भी असीमानंद जी ने अपने मामले में उनसे बात करने से इन्कार किया। आश्‍चर्य लगता है कि पक्षकार बार बार कहता है कि मुझे अन्य वकील की आवश्यकता नहीं है और फिर भी वह वकील उससे आग्रह करता है। संभव है कि लीना गीता रघुनाथ व्यवसाय से वकील होगीही, किन्तु वह अपनी व्यवसाय के प्रामाणिक व्यवहार के लिये जेल नहीं गई थी। वह एक अखबार की संवाददाता के रूप में या किसी अन्य संस्था की एजन्ट बनकर गई थी। इस का मतलब यह निकलता है कि यदि सचमुच वह पेशे से वकील हो, तो उसने अपने व्यवसाय से द्रोह किया है। इस ढंग का बिकाऊ माल अपने व्यवसाय में हो इसकी शरम सभी वकीलों को अवश्य लगेगी।
यदि कोई व्यक्ति वकील का नकाब पहनकर काम करने के लिये प्रस्तुत हुआ हो, तो अवश्य समझना चाहिये कि वह किसी अन्य का एजन्ट बनकर आया होगा। लीना गीता रघुनाथ किस की एजन्ट होगी? वह तो स्वयं होकर कुछ भी कबूल नहीं करेगी। किन्तु लोकसभा के चुनाव की समीपता को तथा घटना अम्बाला जेल की, जो कि काँग्रेस शासित हरयाणा राज्य में स्थित है, यह ध्यान में लेकर, यह षडयंत्र काँग्रेस पार्टी ने रचा है, ऐसा किसी ने निष्कर्ष निकाला, तो उसे दोष नहीं दिया जा सकता। इस तर्क को पुष्टि इस कारण से भी मिल सकती है कि श्री राहुल गांधी, तुरन्त गुजरात में प्रचार के लिये गये और उन्होंने वहाँ रा. स्व. संघ की जहरीलीनिंदा की। पहले तो काँग्रेसजन यही कहते थे कि गांधी जी की हत्या में संघ की शिरकत थी। किन्तु जब इस प्रकार की अनर्गल बातों ने उनको माफी मांगने के लिये मजबूर किया, तब शैली बदली, (मन नहीं बदला) कहने लगे कि संघ की विषैली विचारधारा के कारण गांधी जी की हत्या हुई। श्री राहुल गांधी का वक्तव्य इसका का ठोस प्रमाण है।
थोडा पुराना इतिहास
राहुल जी नये हैं। अननुभवी हैं। संभव है उनका पूरा इतिहास अज्ञात हो। अत: उनके लिये तथा अन्य तरुण मतदाताओं के लिये कुछ तथ्यों को यहाँ प्रस्तुत करता हूँ।
दिनांक 30 जनवरी को गांधी जी की हत्या हुई। दिनांक 31 जनवरी और 1 फरवरी की बीच की मध्यरात्रि में उस समय के सरसंघचालक श्री मा. स. गोलवलकर उपाख्य श्रीगुरुजी को गिरफ्तार किया गया। वह भी इं. पि. कोड की धारा 302 के तहत। मानों श्री गोलवलकर ही पिस्तौल लेकर दिल्ली गये थे। और उन्होंने ही महात्मा जी पर गोली दागी थी। किन्तु चंद दिनों के बाद ही सरकार की अक्ल ठिकानेपर आयी और धारा 302 को हटाकर प्रतिबंधित कानून (preventive law) के अंदर वह गिरफ्तारी दिखायी गयी। उस समय केवल श्रीगुरुजी को ही बंदी नहीं बनाया था। सैकडों अन्य कार्यकर्ताओं को भी पकडा था। कमसे कम बीस हजार मकानों की तलाशी ली गई थी। किन्तु रंचमात्र भी प्रमाण नहीं मिला। गांधी जी की हत्याकांड में जो शरीक थे उनकों पकडा गया। उनपर न्यायालय में मामला चला। जो दोषी पाये गये उनको सजा हुई। किन्तु संघ के किसी भी कार्यकर्तापर मुकदमा दायर नहीं हुआ था। क्यौ? कारण स्पष्ट है कि वे सारे बेगुनाह थे। किन्तु संघ पर पाबंदी लगाई गयी थी और वह हटायी नहीं गई थी।
प्रतिबन्ध को हटाने के लिये फिर संघ ने अत्यंत शान्तिपूर्ण ढंग से सत्याग्रह किया। 70 हजार से भी अधिक लोगों ने गिरफ्तारी दी। फिर दो मध्यस्थ सामने आये। एक थे पुणे से प्रकाशित होनेवाले केसरीके सम्पादक श्री ग. वि. केतकर। उनके अनुरोधपर सत्याग्रह स्थगित किया गया। फिर भी प्रतिबन्ध नहीं हटा। फिर आये मद्रास इलाके के भूतपूर्व एडवोकेट जनरल श्री टी. आर. वेंकटराम शास्त्री। उनके अनुरोध का आदर कर संघ ने अपना संविधान लिखित रूप में पेश किया। फिर भी प्रतिबन्ध नहीं हटा। बाद में श्रीगुरुजी ने भी स्पष्ट शब्दों में बता दिया कि इस के आगे वे सरकार से कोई पत्राचार नहीं करेंगे। फिर सरकार अडचन में आयी। सरकार के ही पहल से  पं. मौलिचंद्र शर्मा मध्यस्थ बनकर आये। श्रीगुरुजी सरकार को कुछ भी लिख देने के लिये तैयार नहीं थे। फिर बीच का रास्ता ढूँढा गया कि श्रीगुरुजी सरकार को कुछ न लिखें, पंडित मौलिचंद्र जी जो कुछ मुद्दे उठायेंगे, उनके उत्तर गुरुजी देंगे। और श्रीगुरुजी ने शिवनी के जेल में पं. मौलिचंद्र जी को एक विस्तृत पत्र लिखकर संघ की भूमिका विशद की। श्रीगुरुजी के पत्र का प्रारम्भ ही  My dear Pandit Moulichandraji ऐसा है। यह पत्र दि. 10 जुलाय 1949 का है।  वह पत्र लेकर पंडित मौलिचंद्र जी दिल्ली गये और 12 जुलाय को संघ पर का प्रतिबन्ध हटाया गया। पं. मौलिचंद्र जी को लिखे पत्र में वेही सारे मुद्दे हैं जो श्रीगुरुजी ने दिल्ली की वार्ताकार परिषद में 2 नवम्बर 1948 में प्रस्तुत किये थे।
राहुल जी, अब आप ही सच बतायें कि आपके परदादा जी सरकार के प्रमुख रहते हुये भी, उनकी सरकारने इस विषैलेसंगठन को मुक्त क्यौं किया? इस प्रक़ार की नासमझी के लिये आप की आलोचना का चुभनेवाला एकाध शब्द तो भी उस दिशा में जाने दीजिये ना।
और सरदार पटेल
यह भी ध्यान में लेना जरुरी है कि तथाकथित जहरीलीविचारधारा को माननेवाले संगठन के बारे में सभी काँग्रेसजनों का मत एकसा नहीं था। गांधी जी की हत्या के एक-दो दिन पहले, अमृतसर की एक आम सभा में भाषण देते हुये, उस समय के अपने प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल जी नेहरू ने कहा था कि हम आरएसएस को जडमूल से उखाड फेंक देंगेइस प्रकार विचार रखनेवाले और भी कुछ लोग थे। श्री गोविन्द सहाय, जो उस समय यु. पी. की सरकार में संसदीय सचिव थे, ने एक पुस्तिका प्रकाशित कर संघ को फॅसिस्ट कह कर उस पर प्रतिबन्ध लगाने की मांग की थी। गांधी जी की हत्या से उनको सुनहरा मौका मिल गया । किन्तु, उसी समय के केंद्र सरकार में उपप्रधान मंत्रिपद पर विराजमान सरदार पटेल का मत एकदम इस के विरुद्ध था। सरदार पटेल के, लखनौ के एक भाषण का जो वृत्त चेन्नई से (उस समय मद्रास) प्रकाशित होनेवाले द हिंदूदैनिक के 7 जनवरी 1948 के अंक में प्रकाशित हुआ था, उस में उन्होंने कहा था-
He (Sardar Patel) said, "In the Congress those who are in power feel that by virtue of their authority they will be able to crush the RSS. You cannot crush an organisation by using the 'danda'. The danda is meant for thieves and dacoits. After all the RSS men are not thieves and dacoits. They are patriots who  love their country."
विषाक्त विचारधारा रखनेवाले संघ के बारे में ऐसे प्रशांसोद्गार निकालनेवाले सरदार के सारे पुतले, राहुलजी आप उखाड फेंके। जहरीलेसंगठन को देशभक्तकहना कितना घोर सत्यापलाप है! राहुलजी, और एक मजे की बात आगे भी घटी। 1963 के 26 जनवरी के गणतंत्रदिन समारोह में आयोजित संचलन में हिस्सा लेने के लिये संघ को निमंत्रण मिला था। किसने दिया था यह निमंत्रण, राहुलजी, आप जानते हैं? आपके परदादा ने, पं. जवाहरलाल जी ने! अत्यंत सौम्य शब्दों में क्यौ न हो आप इस की कभी आलोचना करने का साहस दिखायेंगे?
संघ पर की पाबंदी अचानक हटने के कारण, एक ऐसा वातावरण निर्माण किया गया था कि संघ ने सरकार की कुछ शर्तें मान ली। इस के परिणामस्वरूप पाबंदी हटायी गयी। इस बारे में अधिक न लिखते हुये मैं मुंबई लेजिस्लेटिव असेम्ब्ली में जो प्रश्‍नोत्तर हुये उन्हें ही यहाँ उद्धृत करता हूँ। प्रश्‍नकर्ता विधायक है लल्लुभाई मानकजी पटेल (सुरत जिला) और तिथि है 20-09-1949। उस समय जनसंघ का जन्म ही हुआ नहीं था। अत: प्रश्‍नकर्ता कोई संघ समर्थक होने का सवाल नहीं उठेगा। वे प्रश्‍न और उन के उत्तर ऐसे है-
Will the Hon. Minister of Home and Revenue be pleased to state :
a. Whether it is a fact that the ban on RSS has been lifted.
b. If so what are the reasons for lifting the ban.
c. Whether the lifting of the ban is conditional or unconditional.
d. If conditional, what are the conditions?
e. Whether the leader of the RSS has given any undertaking to the Government.
f. If so, what is the undertaking?

Mr. Dinkar rao n. Desai for Mr. Morarji R. Desai :

a. Yes.
b. The ban was lifted as it was no longer considered necessary to continue it.
c. It was unconditional.
d. Does not arise.
e. No.
f. Does not arise.

और एक प्रमाण
पाकिस्तान में भारत के राजदूत और कुछ समय केंद्रीय मंत्री रहे डॉ. श्रीप्रकाश जी के पिताश्री भारतरत्न डॉ. भगवानदास का यह निवेदन है।
"I have been reliably informed that a number of youths of the RSS... were able to inform Sardar Patel and Nehruji in the very nick of time of the Leaguers intended "coup" on September 10, 1947, wherby they had planned to assassinate all Members of Government and all Hindu Officials and thousands of Hindu Citizens on that day and plant the flag of "Pakistan" on the Red Fort."
"...It these high-spirited and self-sacrificing boys had not given the very timely information to Nehruji and Patelji, there would have been no Government of India today, the whole country would have changed its name into Pakistan, tens of millions of Hindus would have been slaughtered and all the rest converted to Islam or reduced to stark slavery.
"...Well, what it the net result of all this long story? Simply this- that our Government should utilise, and not sterilise, the patriotic energies of the lakhs of RSS youths."

सारांश यह है कि चुनाव का मौसम आ गया है। तो समझ लेना चाहिये कि संघपर ऐसे बेतुकी बकवासपूर्ण आरोप होंगे। विधानसभाओं के चुनाव के समय भी हमने देखा था ना, कि काँग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने जाहीर वक्तव्य किया था कि संघ में बम बनाने की शिक्षा दी जाती है। इस प्रकार के बकवास का क्या परिणाम निकला यह पूरे देश ने देखा है। इस नये झुठाई का भी परिणाम वही होगा।
मा. गो. वैद्य
नागपुर
दि. 12-02-2014

Saturday, 16 November 2013

सरदार पटेल और संघ



सरदार पटेल की महानता ऐसी है की, संपूर्ण देश उन्हें अपना माने। जो लोग उन्हें किसी एक सियासी पाटीं के बाडे में बंदिस्त करके रखना चाहते है, वे उनका अपमान करते है। इस लेख में सरदार पटेल और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संबंधों के बारे में विचार प्रस्तुत है। 


संघ की क़दर
मुझे निश्चयपूर्वक कहना है कि, सरदार पटेल को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उनके कार्य की क़दर थी। जिस समय काँग्रेस के कुछ नेता और विशेषतः तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरु, जब संघ को नेस्तनाबूत करने का विचार कर रहे थे, उस समय सरदार पटेल संघ की प्रशंसा कर रहे थे। तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार में एक संसदीय सचिव श्री गोविंद सहाय ने एक पुस्तिका प्रकाशित कर, संघ फासिस्ट है और उसपर बंदी लगाए ऐसी मांग की थी। 29 जनवरी 1948 को, पंजाब प्रान्त में दिये अपने एक भाषण में तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरु ने संघ की तीखी आलोचना करते हुए, उसे हम जडमूल से उखाड फेकेंगे ऐसी गर्जना की थी। लेकिन सरदार पटेल उस समय भी संघ की वाहवा कर रहे थे। 1947 के दिसंबर माह में जयपुर और1948 के जनवरी में लखनऊ में किये भाषण में सरदार पटेल ने संघ के लोग देशभक्त हैं, ऐसा सार्वजनिक रूप में कहा था। संघ पर बंदी लगाने की मांग करनेवालों को लक्ष्य कर उन्होंने कहा था कि, दंडात्मक कानून की कारवाई गुंडों के विरुद्ध की जाती है, देशभक्तों के विरुद्ध नहीं; संघ के स्वयंसेवक देशभक्त है। 


अप्रस्तुत सवाल
उसी दरम्यान, मतलब 30 जनवरी को महात्मा गांधी की हत्या की गई थी। हत्या करने वाला व्यक्ति हिंदुत्वनिष्ठ था। इस कारण, हिंदुत्ववादी संघ भी संदेह के घेरे में आया। 4 फरवरी को सरकार ने संघ पर पाबंदी लगाई। पाबंदी गृह विभाग की ओर से लगाई जाती है और उस समय गृह विभाग के मंत्री थे सरदार पटेल। इस कारण, सरदार पटेल ने पाबंदी लगाई थी, फिर यह पाबंदी लगानेवाले सरदार पटेल संघ के प्रशंसक कैसे हो सकते है और संघवाले सरदार को अपना कैसे मान सकते है, ऐसे प्रश्न, गुजरात के मुख्यमंत्री और भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार श्री नरेन्द्र मोदी ने सरदार पटेल का विशाल पुतला बनाने का निश्चय करने के बाद काँग्रेस के कुछ नेताओं की ओर से उपस्थित किये गए। यह प्रश्न अप्रस्तुत है, ऐसा मुझे कहना है। 


संदेह के बादल
गांधीजी की हत्या होने के बाद, उस साज़िश में संघ भी शामिल है, इस संदेह से उस समय का वातावरण इतना कलुषित हुआ था कि, उस समय के सरसंघचालक श्री गुरुजी को 2 फरवरी की मध्यरात्रि में गिरफ्तार किया गया, यह गिरफ्तारी फौजदारी कानून की धारा 302 के अंतर्गत थी। मानो गुरुजी स्वयं पिस्तौल लेकर दिल्ली गये थे और उन्होंने गांधीजी पर गोलियाँ दागी थी!  यह नीरी बेवकूफी जल्द ही सरकार के ध्यान में आई और उसने वह धारा हटाकर गुरुजी की गिरफ्तारी प्रतिबंधक कानून के अंतर्गत की जाने की बात कही। उस समय, संघ के अनेक अधिकारियों को भी प्रतिबंधक कानून के अंतर्गत गिरफ्तार कर कारागृह में ठूँसा गया था। संघ के करीब बीस हजार कार्यकर्ताओं के घरों की भी तलाशी ली गई। लेकिन गांधीजी की हत्या की साजिश में संघ के सहभागी होने का रत्तिभर भी प्रमाण नहीं मिला। इस वस्तुस्थिति की दखल सरदार पटेल ने निश्चित ही ली होगी।

 
पटेल पर अविश्वास
सरदार पटेल का संघ के बारे में जो मत था वह पंडित नेहरु और उनके वामपंथी विचारधारा के अनुयायी जानते थे। गृहमंत्री सरदार पटेल, गांधी-हत्या के मामले की सही जाँच नहीं करेंगे, ऐसा भाव उनके मन में था। पंडित नेहरु ने सरदार पटेल को लिखे एक पत्र में वह व्यक्त भी हुआ है। पंडित नेहरु का यह पत्र 26 फरवरी 1948 मतलब संघ पर जिस माह बंदी लगाई गई, उसी माह का है। उस पत्र में के मुख्य मुद्दे इस प्रकार है :
1) गांधीजी की हत्या की व्यापक साज़िश की खोज करने में कुछ ढिलाई दिखाई दे रही है।
2) गांधीजी की हत्या यह एकाकी घटना नहीं। वह आरएसएस के व्यापक अभियान का एक हिस्सा है। 
3) संघ के अनेक कार्यकर्ता अभी भी बाहर हैं। कुछ विदेशों में गये है, या भूमिगत है या खुलेआम बाहर घूम रहे है। उनमें से कुछ हमारे कार्यालय तथा पुलिस में भी है। इस कारण, कोई भी बात उनसे गुप्त रखना असंभव है। 
4) मुझे ऐसा लगता है कि, पुलिस और अन्य स्थानीय अधिकारियों ने कडाई से काम करना चाहिए। उन्हें थोड़ी फुर्ती दिखाकर ढिला पडने की आदत है। सबसे अधिक खतरनाक बात यह है कि, उनमें से अनेकों को संघ के बारे में सहनुभूति है। इस कारण, ऐसी धारणा बन गई है कि, सरकार की ओर से कोई परिणामकारक कारवाई नहीं की जाती। 
यह सरदार पटेल पर, अप्रत्यक्ष रूप में, अविश्वास प्रकट करने का ही प्रयास था।


पटेल का उत्तर
सरदार पटेल ने, तुरंत दूसरे दिन ही मतलब 27 फरवरी को विस्तृत उत्तर भेजा। उस प्रदीर्घ पत्र के मुख्य मुद्दे इस प्रकार हैं :
1) गांधीजी के हत्या के मामले की जाँच के संदर्भ में मैं प्रतिदिन जाँच के प्रगति का जायजा लेता हूँ। 
2) जिन आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है, उनके निवेदन से यह स्पष्ट हुआ है कि, इस साज़िश के केन्द्र पुणे, मुंबई, अहमदनगर और ग्वालियर थे। उसका केन्द्र दिल्ली नहीं था। ...... उन निवेदनों से यह भी स्पष्ट हुआ है कि इस साज़िश में संघ का हाथ नहीं था।
3) दिल्ली के संघ के बारे में कहें तो उनके वहाँ के प्रमुख कार्यकर्ताओं में से किसी के भी छूटने की जानकारी मुझे नहीं है।
4) मुझे पूरा भरोसा है कि, दिल्ली के सब प्रमुख संघ कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया है। 
5) दूसरे किसी भी स्थान या प्रान्त की तुलना में दिल्ली में गिरफ्तारी की संख्या अधिक है। 


संघ की प्रशंसा
प्रतिबंधात्मक गिरफ्तारी में : माह बीतने के बाद 6 अगस्त 1948 को श्री गुरुजी कारागृह से मुक्त हुए। उसके बाद उन्होंने 11 अगस्त को सरदार पटेल को पत्र लिखकर, दिल्ली आकर उनसे मिलने की इच्छा व्यक्त की। श्री गुरुजी को पंडित नेहरु से भी मिलना था और उन्होंने उन्हें पत्र भी लिखा था। लेकिन पंडित नेहरु ने मिलने से इंकार किया। कारागृह से मुक्त होने के बाद भी, श्री गुरुजी को नागपुर से बाहर जाने की पाबंदी थी। वह पाबंदी इस पत्र के बाद हटाई गई और वे दिल्ली गये।
श्री गुरुजी ने 11 अगस्त को लिखे पत्र को सरदार पटेल ने 11 सितंबर को उत्तर भेजा। उस उत्तर में सरदार पटेल लिखते है :
1) संघ के बारे में मेरे विचारों की आपको जानकारी होगी ही। मेरे यह विचार मैंने गत दिसंबर में जयपुर और जनवरी में लखनऊ में किए भाषण में प्रकट किये थे। लोगों ने इन विचारों का स्वागत किया था। 
2) हिंदू समाज की संघ ने सेवा की है, इस बारे में कोई संदेह नहीं। जहाँ सहायता और संगठन की आवश्यकता थी, वहाँ संघ के युवकों ने महिलाओं और बच्चों की रक्षा की और उनके लिए बहुत परिश्रम भी किये।
3) मैं पुन: आपको बताता हूँ कि, आप मेरे जयपुर और लखनऊ के भाषणों का विचार करें और उन भाषणों में मैंने संघ को जो मार्ग दिखाया है उसका स्वीकार करें। मुझे विश्वास है की, इसमें ही संघ और देश का भी हित है। आपने यह मार्ग स्वीकार किया तो हमारे देश के कल्याण के लिये हम हाथ मिला सकते हैं। 
4) मुझे पूरा विश्वास है कि, संघ अपना देशभक्ति का कार्य काँग्रेस में आकर ही कर सकेगा। अलग रहकर या विरोध करके नहीं।
26 नवंबर 1948 को श्री गुरुजी को लिखे दूसरे पत्र में भी श्री पटेल यहीं भावना व्यक्त करते हैं। वे लिखते हैं, ‘‘सब बातों का विचार करने के बाद मेरी आपके लिए एक ही सूचना है, वह यह  कि, संघ ने नया तंत्र और नई नीति अपनानी चाहिए। यह नया तंत्र और नीति काँग्रेस के नियमानुसार ही होनी चाहिए।’’



संघ का सत्याग्रह
यह ध्यान में रखना चाहिये  कि, श्री पटेल के यह विचार संघ पर पाबंदी रहने के समय के हैं। श्री गुरुजी ने दिल्ली जाकर सरदार पटेल से भेंट की। संघ की भूमिका विशद की। लेकिन पाबंदी कायम ही रही। इतना ही नहीं तो श्री गुरुजी दिल्ली छोडकर नागपुर लौट जाय, ऐसा हुक्म ही जारी किया गया। लेकिन न्याय मिलने तक दिल्ली छोडने का निर्धार श्री गुरुजी ने प्रकट किया। तब 1818 के काले कानून के अंतर्गत उन्हें गिरफ्तार कर नागपुर भेजा गया और सिवनी के कारागृह में रखा गया। 

अपने ऊपर हो रहा अन्याय दूर करने के लिए दूसरा कोई भी मार्ग शेष रहने के कारण, बंदी उठाने के लिये 9 दिसंबर 1948 से संघ ने सत्याग्रह आरंभ किया। आरंभ में इस सत्याग्रह की हँसी उडाई गई। हिंसा पर विश्वास रखनेवालेशांतिपूर्ण सत्याग्रह कर ही नहीं सकेंगे ऐसी उनकी कल्पना थी। और, एक-दो हजार लड़के ही इसमें भाग लेंगे, ऐसा भी उनका अनुमान था। लेकिन सत्याग्रह पूरी तरह से शांततापूर्ण हुआ। कुछ स्थानों पर पुलिस ने अत्याचार किये, लेकिन स्वयंसेवकों की शांति भंग नहीं हुई और सत्याग्रह में 70 हजार से अधिक स्वयंसेवकों ने गिरफ्तारी दी। 

विचारवंतों की मध्यस्थता 
इस सत्याग्रह ने समाज के विचारवंतों को आकृष्ट किया और उन्होंने मध्यस्थता के लिए पहल की। प्रथम केसरीके तत्कालीन संपादक श्री ग. वि. केतकर सामने आये। वे सरकार के प्रतिनिधियों से मिले; कारागृह में श्री गुरुजी से मिले और उन्होंने गुरुजी को बताया कि, जब तक सत्याग्रह समाप्त नहीं किया जाता, तब तक सरकार के साथ चर्चा नहीं हो सकती। श्री केतकर की सूचना के अनुसार 22 या 23 जनवरी 1949 को सत्याग्रह रोका गया। लेकिन पाबंदी कायम ही रही। फिर पुराने मद्रास क्षेत्र में एडव्होकेट जनरल इस महत्त्व के पद पर कार्य कर चुके श्री टी. आर. व्यंकटराम शास्त्री आगे आये। वे भी सरकारी अधिकारियों से मिले; फिर गुरुजी से भी मिले। उन्होंने श्री गुरुजी को बताया कि, ‘‘संघ अपना संविधान लिखित स्वरूप में दें, ऐसी सरकार की मांग है। उसके बाद ही पाबंदी हटाने का विचार होगा।’’ श्री गुरुजी ने प्रतिप्रश्न किया कि, ‘‘हमारे पास लिखित संविधान नहीं है, क्या इसलिए हमपर पाबंदी लगाई गई थी?’’ फिर भी, व्यंकटराम शास्त्री जैसे ज्येष्ठ और श्रेष्ठ व्यक्ति का सम्मान रखने के लिए संघ ने लिखित स्वरूप में अपना संविधान सरकार के पास भेजा। उसके बाद सरकार ने तुरंत पाबंदी हटानी चाहिए थी। लेकिन सरकार को लगा  कि, गुरुजी दबाव में रहे है, उन्हें और झुकाना चाहिए, इसलिए सरकार ने उस संविधान में कमियों के बहाने खोजना शुरू किया। पाबंदी कायम ही रही। श्री व्यंकटराम शास्त्री भी नाराज हुए और अपनी मध्यस्थता असफल होने की, लेकिन संघ पर पाबंदी हटाने की आवश्यकता है ऐसी  सूचना देनेवाला पत्रक उन्होंने निकाला। श्री गुरुजी और सरकार को सूचित किया  कि इसके बाद वे सरकार से कोई पत्रव्यवहार नहीं करेंगे। अब सरकार फँस गई। वह पाबंदी कायम नहीं रख सकती थी। जनमत भी उस पाबंदी के विरोध में हो गया था। फिर सरकार ने श्री मौलिचन्द्र शर्मा के रूप में एक मध्यस्थ चुना। यहाँ यह ध्यान में रखना चाहिए  कि, श्री केतकर और श्री शास्त्री स्वयंप्रेरणा से मध्यस्थता के लिए सामने आये थे। पंडित मौलिचन्द्र शर्मा का चुनाव सरकार ने किया था। 

पंडित मौलिचन्द्र शर्मा
पंडित मौलिचन्द्र ने पहले, कारागृह के बाहर के संघ के अधिकारियों से भेंट की। उन्होंने श्री शर्मा को स्पष्ट बताया कि, श्री गुरुजी सरकार को कुछ लिखकर नहीं देंगे। शर्माजी खाली हाथ दिल्ली लौटे। लेकिन तुरंत दूसरे दिन वापस आये। श्री गुरुजी सरकार को कुछ भी लिखकर दे, लेकिन मौलिचन्द्र शर्मा कुछ प्रश्न पूछेंगे, उनका उत्तर, पत्र के रूप में गुरूजी लिखकर दें, ऐसा हल लेकर वे आये। और उन्होंने सिवनी के कारागृह में श्री गुरुजी से भेंट की। श्री गुरुजी ने, श्री मौलिचन्द्र शर्मा के नाम पत्र लिखकर अनेक मुद्दों पर संघ की भूमिका स्पष्ट की। पत्र माय डिअर पंडित मौलिचन्द्र जीइस उद्बोधन से आरंभ होता है। इस पत्र में वहीं स्पष्टीकरण है, जो श्री गुरुजी ने दिल्ली में 2 नवंबर 1948 की पत्रपरिषद में दिया था। लेकिन तब सरकार का समाधान नहीं हुआ था। पर आश्चर्य यह  कि अब पंडित मौलिचन्द्र शर्मा को लिखे पत्र से सरकार का समाधान हुआ। वह पत्र 10 जुलाई को सिवनी के कारागृह में लिखा गया है और 12 जुलाई 1949 को संघ पर की पाबंदी हटाई गई। एक संजोग यह भी था की, जिस दिन की सुबह के समाचारपत्रों में श्री व्यंकटराम शास्त्री की मध्यस्थता असफल होने का पत्रक प्रकाशित हुआ था, उसी दिन सायंकाल आकाशवाणी से सरकार ने संघ पर की पाबंदी हटाने की घोषणा हुई।

वर्किंग कमेटी का प्रस्ताव
उपरोक्त विवेचन से यह स्पष्ट होता है कि काँग्रेस में एक प्रभावशाली समूह को संघ काँग्रेस के साथ सहयोग करें ऐसा लगता था। उसमें सरदार वल्लभभाई पटेल, पुरुषोत्तमदास टंडन, डॉ. राजेन्द्रप्रसाद का समावेश था। इस कारण ही, संघ पर की पाबंदी हटाने के कुछ समय बाद ही काँग्रेस वर्किंग कमेटी ने एक प्रस्ताव पारित कर, संघ के स्वयंसेवक काँग्रेस में प्रवेश कर सकते हैं, ऐसा घोषित किया। जिस समय वर्किंग कमेटी ने यह प्रस्ताव पारित किया, तब पंडित नेहरु कॉमनवेल्थ कॉन्फरन्स के लिए लंदन गये थे। इस प्रस्ताव से, वे स्वयं और उनके समर्थक चकित और हतबुद्ध हुए। पंडित नेहरु ने स्वदेश लौटते ही, वह प्रस्ताव पीछे लेने के लिये वर्किंग कमेटी को बाध्य किया। वह प्रस्ताव कायम होता, तो संघ में जिन लोगों का राजनीति की ओर झुकाव था, वे काँग्रेस में प्रवेश करते। वैसा होता, तो शायद भारतीय जनसंघ की स्थापना नहीं होती और काँग्रेस के बडबोले महासचिव दिग्विजय सिंह कहते है, वैसे भाजपा भी निर्माण नहीं होती। लेकिन यह निश्चित है  कि, संघ चलता ही रहता। कारण, किसी सियासी पार्टी में विलीन होने के लिये वह निर्माण ही नहीं हुआ था। संघ का उद्दिष्ट बहुत व्यापक है, संपूर्ण समाजजीवन को अपनी परिधि में लेनेवाला है। वह दिग्विजय सिंह जैसे हल्की सोच रखनेवाले, बेताल और बडबोले लोगों की आकलनशक्ति से परे है। 

सरदार पटेल की मुंबई में निकली अंतिम यात्रा में उपस्थित रहने की श्री गुरुजी की इच्छा थी और तत्कालीन मध्य प्रान्त वर्हाड के मुख्यमंत्री पंडित रविशंकर शुक्ल श्री गुरुजी को हवाई जहाज में अपने साथ ले गये थे, यह घटना भी यहाँ ध्यान में लेनी चाहिए। 

- मा. गो. वैद्य
नागपुर, दि. 08 - 11 -2013
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