Monday, 13 August 2012

अण्णा का आंदोलन और उनकी राजनीतिक पार्टी



श्री अण्णा हजारे ने, भ्रष्टाचार निर्मूलन के लिए शुरु किया अपना आंदोलन समाप्त करने की घोषणा की. इसी उद्दिष्ट की पूर्ति के लिए, वे नई राजनीतिक पार्टी बना रहे है, ऐसा भी बताया गया. स्वयं अण्णा को राजनीति मतलब सत्ताकारण में दिलचस्वी नहीं. लेकिन उनके करीब जो लोग जमा हुए थे, उनकी वैसी स्थिति नहीं. उन्हें राजनीति में दिलचस्वी है और सत्ताकारण में भी.

लोकपाल प्रकरण
अण्णा के आंदोलन का प्रारंभ सशक्त लोकपाल की नियुक्ति के मुद्दे पर हुआ. यह मान्य करना चाहिए कि, इस आंदोलन को लोगों का अभूतपूर्व समर्थन मिला. लोकपाल कैसा हो, उसकी नियुक्ति करने की रचना कैसी हो, उसे कौनसे और कितने अधिकार हो, इसका सब ब्यौरा टीम अण्णा ने बनाए कानून के प्रारूप में समाविष्ट था. अण्णा के इस ओंदोलन का विशाल रूप देखकर सरकार भी घबरा गई; फिर उन्होंने कूटनीति का अवलंब कर अण्णा को समझौते के चक्कर में लपेटा. सरकार ने ही लोकपाल विधेयक प्रस्तुत करना तय किया. वह लोकसभा में प्रस्तुत भी किया और लोकसभा ने वह मंजूर भी किया. लेकिन यह सरकारी विधेयक एकदम ही खोखला है. उसने अण्णा की घोर निराशा की; और अण्णा फिर आंदोलन करने के लिए सिद्ध हुए. वह विधेयक अब राज्य सभा में मंजूरी के लिए अटका पड़ा है. सत्तारूढ संप्रमो को राज्य सभा में लोकसभा जैसा स्पष्ट बहुमत नहीं है. इसलिए वह तुरंत पारित नहीं हुआ, या जैसा है वैसा ही पारित होगा, इसकी गारंटी भी नहीं.

सियासी विकल्प
अण्णा ने फिर आंदोलन छेड़ने का निर्णय लिया. मुंबई में उसको परखा. लेकिन दिल्ली में जैसा प्रतिसाद मिला था, वैसा मुंबई में नहीं मिला; इसलिए कुछ समय जाने देने के बाद अण्णा ने फिर दिल्ली में आंदोलन छेड़ने का निर्णय लिया. टीम अण्णा में के कुछ लोगों ने अनिश्‍चितकालीन अनशन शुरु किया. तीन दिन बाद अण्णा भी उसमें शामिल हुए; लेकिन कुछ समय में ही उनके ध्यान में आया कि, करीब सोलह माह पूर्व, जनता का जो अभूतपूर्व प्रतिसाद इस आंदोलन को मिला था, वैसा अब नहीं मिल रहा; और मिलेगा भी नहीं; तब उन्होंने दि. ३ अगस्त को आंदोलन पीछे लिया. कुल दस दिनों में वह समाप्त हुआ. अण्णा का अनशन तो केवल छ: दिन चला. अनशन समाप्ती के समय जो भाषण हुए, (उनमें अण्णा के भाषण का भी समावेश है) उनमें यह स्पष्ट किया गया कि, अनशन-आंदोलन करने में कोई मतलब नहीं. भ्रष्टाचार के निर्मूलन के लिए एक नया सियासी विकल्प ही चाहिए. अण्णा के एक अंतरंग सहयोगी अरविंद केजरिवाल ने तो अपनी नई पार्टी का नाम, उसकी रचना आदि के बारे में सूचना करने की विनति भी जनता से की और आश्‍चर्य यह कि तीन दिन बाद ही टीम अण्णा और जनता को भी धक्का देने वाली एक घोषणा अण्णा ने अपने ब्लॉग पर की. वह थी, इस आंदोलन के समय जो उनकी मूल टीम थी, वही उन्होंने बरखास्त कर दी! यह निर्णय, अपने किसी साथी के साथ विचारविनिमय कर लिया या, अण्णा ने स्वयं अकेले ही ऐसा तय किया, यह पता चलने का कोई रास्ता नहीं. इतना तो निश्‍चित है कि, उनके अनेक सहयोगी इस घोषणा से अचंभित है.

एक अलग विचार
इस संपूर्ण आंदोलन का ब्यौरा लेने पर हमारे सामने क्या चित्र निर्माण होता है? पहले हुए आंदोलन को प्रसार माध्यमों ने अमार्याद प्रसिद्धि दी थी. अण्णा के समर्थकों को लगा होगा कि, केवल प्रसिद्धि के कारण ही वे बड़ी संख्या में लोगों को आकर्षित कर पाए. यह तर्क अकारण नहीं कहा जा सकता. क्योंकि दुसरे आंदोलनपर्व में, अण्णा के कुछ अतिउत्साही समर्थकों ने, प्रसार माध्यमों के प्रतिनिधियों के साथ, आंदोलन को सही प्रसिद्धि नहीं देने के कारण से हाथापाई की थी. इसके लिए बाद में अण्णा ने माफी भी मॉंगी. लेकिन प्रश्‍न यह कि, क्या सही में प्रसार माध्यम आंदोलन सफल बनाते हैं? यह सच है कि, प्रसार माध्यम नकारात्मक प्रसिद्धि दे सकते हैं. कुछ संदेह भी निर्माण कर सकते हैं. लेकिन वे न आंदोलन खड़ा कर सकते है, न ही उसे टिका कर रख सकते है. इसलिए कुछ हट के विचार किया जाना चाहिए, ऐसा मुझे लगता है.
उसके लिए कुछ घटना ध्यान में लेना आवश्यक है. पहले आंदोलन के समय आंदोलन स्थल पर भारतमाता का चित्र था. वह बीच में ही हटा दिया गया. क्यों? कहा गया कि, वह चित्र, यह आंदोलन रा. स्व. संघ पुरस्कृत है, ऐसा सूचित करता था! आंदोलनकर्ता प्रमुख के मन में यह विचार क्यों नहीं आया कि, भारतमाता यह क्या केवल संघ की ही आराध्य देवता है? ऐसा सूचित करने में संघ का गौरव ही है. लेकिन क्या संघ के बाहर के लोगों के लिए भारतमाता वंदनीय, पूजनीय नहीं है? १६ माह पूर्व के आंदोलन में प्रचंड संख्या में लोग एकत्रित हुये थे. लेकिन कोई अपघात नहीं हुआ; चोरी-चपाटी भी नहीं हुई, महिलाओं से छेडखानी भी नहीं हुई. क्यों? ९ अगस्त से शुरु हुए रामदेव बाबा के अनशन के पहले ही दिन अनेकों के भ्रमणध्वनियंत्र चोरी हुए. अण्णा के आंदोलन में ऐसा क्यों नहीं हुआ? इसका का कुछ श्रेय तो संघ के स्वयंसेवकों को दिया जाना चाहिए था या नहीं? उस समय के उस जनसागर में संघ के ही स्वयंसेवक बड़ी संख्या में शामिल थे, यह कारण किसे भी क्यों नहीं समझ आया? बाद में स्वयं अण्णा और उनकी टीम के लोगों ने संघ के बारे में ऐसे कुछ उद्गार निकाले कि, भ्रष्टाचार विरुद्ध के आंदोलन में स्वयंसेवकों का सक्रिय सहभाग हो, ऐसा निर्देश पुत्तूर (कर्नाटक) में हुई संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा ने देने के बाद सक्रिय हुए स्वयंसेवक तटस्थ बने होगे तो दोष किसका? ऐसा लगता है कि, यह बहुत बड़ा वर्ग मुंबई में के आंदोलन स्थल या अब जंतर मंतर गया ही नहीं होगा. अण्णा, लोगों के कम प्रतिसाद का कारण यह तो नहीं होगा? कुछ कहा नहीं जा सकता. मुझे जो लगा वह मैंने बताया.

आंदोलन की व्यापकता
केवल सक्षम लोकपाल यंत्रणा की निर्मिति के लिए शुरु हुए इस आंदोलन ने संपूर्ण भ्रष्टाचार का विषय ही व्याप लिया. यह अच्छा ही हुआ. टीम अण्णा ने तो भ्रष्ट मंत्रियों के नाम ही सरकार को दिए है. सरकार उस बारे में कुछ भी करने वाली थी ही नहीं. जो बात आरोपित भ्रष्ट मंत्रियों के बारे में, वहीं विदेशी बँकों में जमा काले धन के बारे में. सत्ता की यंत्रणा चलाने वाले ही उसमें लिप्त होगे तो इससे अलग अनुभव क्या होगा? ठीक है, अब अनशन-आंदोलन समाप्त हुआ है. ऐसे आंदोलन अमर्याद समय तक चलते भी नहीं. इस कारण, वह पीछे लिया गया इस पर आश्‍चर्य करने का कारण नहीं और उसके बारे में विषाद मानने का भी कारण नहीं.

स्थिर राजनीतिक पार्टी के लिए
अब हम नए राजनीतिक विकल्प का स्वागत करें. उस विकल्प का नाम अब तक निश्‍चित नहीं हुआ है. इस कारण, उसकी रचना के स्वरूप के बारे में मतप्रदर्शन करना योग्य नहीं. लेकिन राजनीतिक पार्टी की स्थापना करना और उसे चलाना, आंदोलन खड़े करने और चलाने के जैसा आसान नहीं. आंदोलन के लिए किसी मंच की स्थापना काफी होती है. एक उद्दिष्ट मर्यादित हो तो, मंच बन सकता है. उसे उद्दिष्ट प्राप्ती के बाद बरखास्त भी किया जा सकता है. संयुक्त महाराष्ट्र समिति यह इसका एक ठोस उदाहरण है. मराठी भाषिकों का एक अखंड, संपूर्ण, अलग राज्य बनते ही समिति का जीवनोद्दिष्ट ही समाप्त हुआ और समिति भी समाप्त हुई. लेकिन, स्थिर राजनीतिक पार्टी को आधारभूत सिद्धांत का अधिष्ठान आवश्यक होता है. भ्रष्टाचार निर्मूलन एक कार्यक्रम हो सकता है, अधिष्ठान नहीं. और अधिष्ठान ही न रहा तो पार्टी भटक जाती है, व्यक्ति-केंद्रित बनती है; या परिवार केंद्रित कहे, हो जाती है. कॉंग्रेस, मुलायम सिंह, लालू प्रसाद, जयललिता की पार्टियॉं और शिवसेना, तृणमूल, राकॉं ऐसी अनेक पार्टियॉं हैं, जो व्यक्ति-केंद्रित या परिवार-केंद्रित हैं. अण्णा हजारे को निश्‍चित ही ऐसी पार्टी पसंद नहीं होगी. उन्हें अपने सकारात्मक आधारभूत तत्त्व बताने ही होगे.

पार्टी का स्वरूप
दूसरा यह कि, पार्टी कार्यकर्ता-आधारित (cadre based) होगी कि नेतृत्व-आधारित (leader based), इसका निर्णय लेना होगा और उसके अनुसार अपना संविधान बनाना होगा. कार्यकर्ता-आधारित पार्टी बनानी होगी, तो प्राथमिक सदस्य कौन और उसके लिए पात्रता-निकष निश्‍चित करने होगे. कार्यकर्ताओं के प्रशिक्षण की भी व्यवस्था निर्माण करनी होगी. अण्णा के आंदोलन को देखे तो, उन्हें जनाधारित (mass based) पार्टी अभिप्रेत होगी, ऐसा तर्क किया जा सकता है. फिर पॉंच-दस रुपये वार्षिक चंदा निश्‍चित कर सदस्य बनाए जा सकेंगे. वे अपना प्रतिनिधि चुनेंगे. अर्थात् जो उन्हें सदस्य बनाएगा, वहीं उनका नेता बनेगा; और स्थानिक स्तर के ये नेता प्रांतिक और केंद्रिय स्तर के नेताओं का निर्वाचन करेंगे. यह हुआ रचना के संदर्भ में.

रचना का क्रम
फिर आते है पार्टी के कार्यक्रम. पहले उनका प्राधान्य क्रम निश्‍चित करना होगा. भ्रष्टाचारविरहित संपूर्ण राज्य कारोबार यह आधारभूत तत्त्व हो भी सकता है, तो भ्रष्टाचार जड़ से उखाड फेकना और भ्रष्टाचारी कोई भी हो उसे छोड़ा नहीं जाएगा, यह कार्यक्रम हो सकता है. लोगों को उत्साहित करने का सामर्थ्य इस कार्यक्रम में निश्‍चित ही है. लेकिन फिर, इस पार्टी के छोटे-बड़े स्तर के नेताओं का नीजि और सार्वजनिक चारित्र्य निष्कलंक होना चाहिए. इसके लिए अंतर्गत समीक्षा की व्यवस्था होनी चाहिए. कार्यक्रमों के साथ आते हैं उन कार्यक्रमों की सफलता के लिए करने के आंदोलन. ऐसा यह क्रम है. श्रीमद्भगवद् गीता के १८ वे अध्याय के १४ वे श्‍लोक में वह निर्देशित है. वह श्‍लोक है -

                        अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम् |
                        विविधाश्च पृथक् चेष्टा: दैवं चैवात्र पंचमम् ॥

इसमें पॉंचवे और अंतिम ‘दैव’ को हम फिलहाल छोड दे. पहले चार है (१) अधिष्ठान - मतलब आधारभूत तत्त्व. (२) कर्ता मतलब कार्यकर्ता और नेता. (३) करण मतलब साधन और (४) पृथक् चेष्टा: मतलब विभिन्न आंदोलन. इन सब का आलेख बनाकर ही कोई नई राजनीतिक पार्टी खड़ी की जा सकती है और चलाई भी जा सकती है.

धन की व्यवस्था
राजनीतिक पार्टी को और एक घटक का विचार करना पड़ता है. वह है पार्टी चलाने और चुनावों के लिए आवश्यक पैसा. वर्ष १९७७ का चुनाव अपवादभूत मानना चाहिए. उस समय न जनता दल के पैसा था, न उम्मीदवारों के पास. लेकिन वह आवश्यकता जनता ने ही पूरी की. कारण आपात्काल के विरुद्ध जनता के मन में प्रचंड रोष था. लेकिन यह अपवादात्मक उदाहरण है. अण्णा की पार्टी भी एखाद चुनाव इस पद्ध्रति से लड़ भी सकती है. लेकिन पार्टी के स्थायी संचालन के लिए निश्‍चित धन-संग्रह की योजना करनी ही पड़ेगी. अण्णा के सहयोगी सार्वजनिक जीवन में सक्रिय अनुभव-संपन्न लोग हैं. वे सब बातों का विचार कर ही नई पार्टी स्थापन करेंगे. हम उन्हें शुभेच्छा दें. कारण जनतांत्रिक व्यवस्था में लोगों के सामने एक से अधिक अच्छे विकल्प उपलब्ध होना उपकारक ही होता है.

- मा. गो. वैद्य
(अनुवाद : विकास कुलकर्णी)
babujivaidya@gmail.com
                  

Monday, 6 August 2012

असम में का हिंसाचार : एक स्थायी उपाय


असम के कोक्राझार जिले में फूँटा हिंसाचार अब रूका है. ‘अब’ यह शब्द महत्त्व का है. वह फिर कब फूँट पड़ेंगा इसका भरोसा नहीं. दोनों पक्ष के लाखों लोग निर्वासित शिबिरों में रह रहें हैं. कई गॉंव बेचिराख हुए हैं.

अंतर
इस हिंसाचार में एक पक्ष ‘बोडो’ जनजाति का है, तो दूसरा पक्ष बांगला देश में से अवैध रूप से भारत में घुसे मुस्लिम घूसपैंठियों का है. हिंसाचार कितना भीषण होगा, इसका अंदाज प्रथम, प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह और फिर तुरंत गृहमंत्री (अर्थात् पहले के) पी. चिदंबरम् ने इस हिंसाचारग्रस्त भाग को दी भेट से लगाया जा सकता है. और यह भी अंदाज लगाया जा सकता है कि, इस हिंसाचार में, जीवित एवं वित्त हानि मुसलमानों की अधिक हुई होगी. बोडों की अधिक हानि हुई होती, और मुसलमान का पक्ष मजबूत होता, तो प्रधानमंत्री और गृहमंत्री निश्‍चित ही वहॉं दौडकर नहीं जाते. १९८९ में कश्मीर की घाटी में से तीन-चार लाख हिंदू पंडितों को निर्वासित होना पड़ा था. इन पंडितों पर अत्याचार कर उन्हें पलायन करने के लिए बाध्य करने में स्थानिक मुस्लिमों का ही हाथ था, यह बताने की आवश्यकता नहीं. गया कोई प्रधानमंत्री उन निर्वासित पंडितों के आँसू पोछने? या तत्कालीन गृहमंत्री ने हमलावरों को नियंत्रित करने के लिए उठाए कठोर कदम? नहीं. उस समय विश्‍वनाथ प्रताप सिंह प्रधानमंत्री और मुफ्ति महमद सईद गृहमंत्री थे. उनकी सत्ता अधिक समय तक नहीं टिकी, यह सच है. १९९१ में पी. व्ही. नरसिंह राव प्रधानमंत्री बने. उन्होंने निर्वासित पंडितों का हाल-चाल पूछा? वे तो पूरे पॉंच वर्ष प्रधानमंत्री थे. लेकिन उन्होंने अपने कार्यकाल में पंडितों के स्वगृह में पुनवर्सन के लिए कुछ नहीं किया, इतना ही नहीं, निर्वासितों को दिलासा देने के लिए उनकी छावनियों को भेट देने का भी कष्ट नहीं किया. कारण, इस मामले में अन्यायग्रस्त और अत्याचार पीडित हिंदू थे. वे मुसलमान होते तो इन लोगों का आचरण अलग होता. और वह स्वाभाविक ही कहा जाना चाहिए. कारण, मुसलमानों की जैसी मजबूत व्होट बँक है, वैसी हिंदूओं की नहीं. हिंदू अनेक गुटों में विभक्त है.

क्रिया-प्रतिक्रिया
तात्पर्य यह कि, कोक्राझार जिले में और समीपवर्ती क्षेत्र में भी मुसलमानों की जीवित और वित्त हानि अधिक हुई. लेकिन मुसलमानों को यह प्रतिक्रिया के स्वरूप भोगना पड़ा है. हिंसक क्रिया उनकी ओर से प्रथम हुई और फिर बोडो जनजाति की ओर से उसकी तीखी प्रतिक्रिया हुई. हमारे देश में एक विचित्र सेक्युलर मानसिकता बनी है. यह मानसिकता मूलत: कारणभूत क्रिया को भूल जाती है और प्रतिक्रिया पर ही आलोचना के कोडे बरसाती है. बहुचर्चित गोध्रा का ही उदाहरण ले. पहले कृति मुसलमानों की ओर से हुई. ५७ हिंदू कारसेवकों को रेल के डिब्बे में बंद कर, उन्हें जिंदा जलाकर मौत के घाट उतारा गया. इसकी अकल्पित तीव्र प्रतिक्रिया गुजरात के अन्य भागों में हुई. गुजराती आदमी सौम्य प्रकृति के होते हैं, ऐसी उनकी देशभर में प्रतिमा है. लेकिन वे भी गोध्रा के अमानुष अत्याचार से भडक उठे. और सही-गलत का विवेक गवॉंकर उन्होंने उस अत्याचार का बदला लिया. मुझे नहीं लगता कि, कोई भी सरकार या कोई भी राजनीतिक नेता तुरंत संपूर्ण राज्य की जनता को भडका सकता है. जनता ही भडकी. अब प्रकरण न्यायप्रविष्ठ है. अपराधियों को सजा सुनाई जा रही है. उसके समाचार भी प्रमुखता से प्रकाशित एवं प्रसारित किए जा रहे हैं. लेकिन उन ५७ निरपराध कारसेवकों को, जिन्होंने रेल रोककर जिंदा जलाया, उनके विरुद्ध के मुकद्दमें का समाचार क्या हमने सुना है? निश्‍चित ही उस कृत्य में के अपराधियों पर मुकद्दमें चलें होंगे. उनके मुकद्दमें के फैसले का समाचार क्यों नहीं फैलता? वे अपराधी मुसलमान है इसलिए? प्रसारमाध्यमों ने ही इसका उत्तर देना चाहिए.

घूसखोरी
यह कुछ विषयांतर हुआ. हमारा आज का विषय है कोक्राझार में का हिंसाचार. बोडो क्यों इतने भडके? वैसे वे पहले भी भडके थे. लेकिन मुसलमानों पर नहीं. असम की सरकार पर. वे उनकी बहुसंख्या का क्षेत्र असम से अलग चाहते थे. इसके लिए उनकी एक संस्था भी स्थापन हुई थी. ‘बोडो लिबरेशन टायगर्स’ ऐसा उस संस्था का नाम है. लेकिन समझौते से वह प्रश्‍न हल किया गया. २००३ में वह समझौता हुआ. इस समझौते के अनुसार ‘बोडो टेरिटोरियल कौन्सिल’ (बोटेकौ) की स्थापना की गई और उसे कुछ विशेष अधिकार भी दिए गए. ‘बोटेकौ’ में स्वाभाविक ही बोडों का वर्चस्व रहेगा. लेकिन यह वर्चस्व, इस प्रदेश में के मुसलमानों को सहन नहीं होता. इस बोडोलॅण्ड के प्रदेश में कुछ स्थानीय मुसलमान भी हैं. उनमें और बोडो में झगडा नहीं. नहीं था, ऐसा कहना शायद अधिक योग्य होगा. लेकिन वहॉं बांगला देश के मुसलमान बड़ी संख्या में घुसपैंठ कर घुसे है. इन घुसपैंठियों ने वहॉं का वातावरण बिगाडा है.

सत्ता-लालची
इन मुस्लिम घुसपैंठियों ने करीब ३५ प्रतिशत सरकारी ‘खास’ भूमि पर अतिक्रमण किया है. सरकार उस बारे में कुछ भी नहीं करती. असम के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई का एक निर्लज्ज विधान अनेकों को स्मरण होगा ही. गोगोई ने कहा था कि, असम में कोई भी अवैध घुसपैंठी नहीं. सब असम में के ही है. गोगोई से पूछना चाहिए कि, असम के २७ जिलों में से ११ जिलें मुस्लिमबहुल कैसे बने? क्या वे १५ ऑगस्ट १९४७ को ही मुस्लिमबहुल थे? पुराने असम का एक सिल्हट जिला मुस्लिमबहुल होने का संदेह था. वहॉं जनमत संग्रह कराया गया; और बहुमत पाकिस्तान के पक्ष में हुआ. वह जिला पाकिस्तान में - उस समय के पूर्व पाकिस्तान में मतलब आज के बांगला देश में - समाविष्ट किया गया. और कोई भी जिला यदि मुस्लिमबहुल होता, तो पाकिस्तानी नेतृत्व उसे भारत में रहने देता? गोगोई ने उत्तर देना चाहिए कि, बांगला देश की सीमा से सटे यह ११ जिले मुस्लिमबहुल कैसे बने? लेकिन वे उत्तर नहीं देंगे. अल्पसंख्य मुस्लिमों के व्होटबँक पर उनकी सत्ता निर्भर है. और ये लोग इतने स्वार्थी और सत्ता लालची है कि, सत्ता के लिए देश-हित को आग लगाने से भी नहीं हिचकेंगे.

चिनगारी
वहॉं समस्या बांगलाभाषी घुसपैंठियों की है. उनकी शिकायत है कि, ‘बोटेकौ’ पर उनका वर्चस्व नहीं है. यह तो होगा ही. जिन घुसपैंठियों का सात्म्य (assimilation) हुआ है, उन्हें नागरिकता के अधिकार हैं ही. लेकिन इतने से वे समाधानी नहीं. यह झगडे की जड़ है. और २००८ से इस झगडे ने गंभीर स्वरूप धारण किया है. अर्थात् आक्रमण मुसलमानों की ओर से ही प्रारंभ हुआ है. ‘ऑल बोडो स्टुडंट्स युनियन’ के भूतपूर्व अध्यक्ष और राज्य सभा के भूतपूर्व सांसद यु. जी. ब्रह्म बताते है कि, गत दो वर्षों में दो सौ बोडो की हत्या हुई है. गोगोई साहब, आप ही बताए यह कत्तल किसने की? क्या बोडो ने ही बोडो की हत्या की? या बोडोबहुल प्रदेश में जो बिल्कुल थोडी जनजाति के लोग हैं, उन्होंने बोडो की हत्या की? उत्तर साफ है. धाक जमाने के लिए मुसलमानों ने ही उनकी हत्या की. गत जुलाई माह के अंत में जो हिंसाचार हुआ, उसकी जड़ भी मुसलमानों के आक्रमक स्वभाव में है. घटना २० जुलाई की है. प्रदीप बोडो और उनके तीन मित्र कोक्राझार में से नरबाडी इस मुस्लिमबहुल भाग से जा रहें थे. बोडो और मुस्लिम घूसपैंठियों में तनाव था ही. इसलिए प्रदीप की पत्नी के उन्हें चेतावनी दी कि, वहॉं से न जाए. लेकिन प्रदीप ने उसकी बात नहीं मानी. रात ८.३० को समाचार आया कि प्रदीप और उनके तीन मित्रों की हत्या की गई है. पहले उन पर हमला किया गया. तुरंत पुलीस आई. पुलीस इन चारों को ले जा रही थी. तब मुसलमानों के जमाव ने पुलीस की गाडी रोकी, उन चारों को बाहर निकाल और उन पर कुल्हाडी से वार कर उनकी हत्या की.

बदले की प्रतिक्रिया
संपूर्ण कोक्राझार जिले के साथ समीपवर्ती क्षेत्र में भी इसकी प्रतिक्रिया हुई. पहले तो मुसलमानों को लगा की यह उनके लिए एक अवसर है और उन्होंने बोडो की बस्तियों पर आक्रमण कर बोडो के अनेक घर जला डाले. कुछ बोडो ने प्रतिकार किया, तो उनकी हत्या कर दी गई. फिर बोडो ने पलटकर हमला किया. गोसाईगॉंव में बोडो निर्वासितों का एक शिबिर है. उसमें फिलहाल ३४१९ निर्वासित रहते हैं. इस शिबिर का प्रमुख रूपक बसुमतराय बताता है कि, जब हमने हमारे ही पड़ोसियों को हमारे घर जलाते देखा, तब हमने भी बदला लेने का निश्‍चय किया और हमारे लोगों ने भी मुस्लिम बस्तियों पर हमले शुरू किए. उनके घर जलाए. इस प्रतिक्रिया के कारण मरनेवालों में और निर्वासितों में मुसलमानों की संख्या अधिक है. इस कारण कॉंग्रेस की सरकार में हलचल हुई और प्रधानमंत्री तथा गृहमंत्री के दौरे के बाद पुलीस ने और उनकी सहायता के लिए गई सुरक्षा टुकडियों ने हिंसाचार रोका. फिलहाल वहॉं तनावपूर्ण शांति है. लेकिन अब बोडो कहते है कि, मुसलमानों को हमारे पडोसी स्वीकार करने की हमारे मन की तैयारी नहीं. इन पडोसियों ने ही हमारे घर जलाए हैं.

कुछ समय बाद यह क्षुब्ध भावनाएँ शांत होगी. प्रतिकार का आघात इतना जबरदस्त होगा इसकी कल्पना भी मुसलमानों ने नहीं की होगी. वे भी सही तरीके से रहेंगे. ‘बोटेकौ’में बोडो का ही वर्चस्व रहेगा यह भी वे मान्य करेंगे और कम से कम कोक्राझार और समीपवर्ती क्षेत्र में फिर शांतता स्थापित होगी. हर कोई यही चाहेगा.

खतरा
लेकिन मूल घूसपैंठ का प्रश्‍न वैसे ही रहेगा. इन घुसपैंठियों की संख्या भी बढ़ रही है और संख्या के साथ उनकी हिंमत भी बढ़ रही है. असम में उन्होंने ने अपनी एक अलग राजनीतिक पार्टी भी बनाई है. ‘युनायटेड डेमोक्रॅटिक फ्रंट’ ऐसा उसका निरुपद्रवी नाम है. लेकिन वह केवल मुस्लिमों की पार्टी है. आज असम की विधानसभा में, सत्ताधारी कॉंग्रेस के बाद इसी पार्टी के सदस्यों की संख्या आती है. भाजपा तीसरे क्रमांक पर है. यह घुसपैंठ ऐसे ही चलती रही (वह कॉंग्रेस पार्टी के व्होट बँक की खुशामद की राजनीति से निश्‍चित ही बढ़ेंगी) तो कल उनकी सत्ता भी स्थापन हो सकती है.

स्थायी उपाय
इस पर एक स्थायी उपाय है. ये घुसपैंठी बांगला देश से आते है. कारण वहॉं भूमि कम और जनसंख्या अधिक है. १९४७ में निर्मित संपूर्ण पाकिस्तान में, पूर्व पाकिस्तान मतलब आज के बांगला देश की जनसंख्या अधिक थी. लेकिन संपूर्ण पाकिस्तान के सत्ता-सूत्र पूर्व के पास न जाय, इसलिए पूर्व भाग के लोकप्रिय नेता मुजीबुर रहेमान को पाकिस्तान की सेना की सरकार ने जेल में डाला था और इसी बात पर पूर्व पाकिस्तान विरुद्ध पश्‍चिम पाकिस्तान ऐसा रक्तरंजित संघर्ष हुआ. इस संघर्ष में, भारत पूर्व पाकिस्तान के समर्थन में खड़ा हुआ और पूर्व पाकिस्तान स्वतंत्र हुआ. वहीं आज का बांगला देश है. आज बांगला देश की जनसंख्या १५ करोड़, तो पश्‍चिम पाकिस्तान की १७ करोड़ है. बांगला देश की जनसंख्या कम क्यों हुई? कारण वे भारत में घुसपैंठ करते हैं. बांगला देश का क्षेत्रफल करीब देड लाख वर्ग किलोमीटर है, तो पाकिस्तान का करीब ८ लाख वर्ग किलोमीटर. बांगला देश की भूमि पर जनसंख्या का दबाव है. इस कारण, वहॉं के लोग भारत में घुसपैंठ करते है. इसका स्थायी उपाय यह है कि, बांगला देश भारत में विलीन हो जाए. जिस भाषा के मुद्दे पर उनका पश्‍चिम पाकिस्तान के साथ संघर्ष हुआ, उस भाषा को भारत में निश्‍चित ही सम्मान मिलेगा. कारण भारत के पश्‍चिम बंगाल की भाषा बंगाली ही है. मुसलमानों की संख्या अधिक होने के कारण, वहॉं का मुख्यमंत्री स्वाभाविक मुसलमान ही रहेगा. मतलब शासन उनका ही रहेगा. भारत में विलीनीकरण होने के बाद अवैध घुसपैंठ का प्रश्‍न ही नहीं शेष रहेगा. वे खुलकर कहीं भी रह सकेंगे. भारत पंथनिरपेक्ष है, इस कारण उन्हें उनके धर्म-मतानुसार आचरण करने की स्वतंत्रता का कायम भरोसा रहेगा. सुरक्षा के खर्च में कमी होकर वह पैसा विकास के काम के लिए खर्च किया जा सकेगा. और भारत की पूर्व सीमा भी सुरक्षित हो जाएगी. ऐसे लाभ ही लाभ है. बांगला देश में आज जनतंत्र है. वहॉं की जनता इस विकल्प का गंभीरता से विचार करें, ऐसा लगता है.


- मा. गो. वैद्य
(अनुवाद : विकास कुलकर्णी)