Monday, 27 August 2012

भावी प्रधानमंत्री स्वयंसेवक होना चाहिए : मुस्लिम राष्ट्रीय मंच कि मांग


गत जून माह में राजस्थान के पुष्कर इस पवित्र क्षेत्र में मुस्लिम राष्ट्रीय मंच (मुरामं) का तीन दिनों का शिबिर संपन्न हुआ.
इस शिबिर का उद्घाटन पूर्व सरसंघचालक श्री सुदर्शन जी के हस्ते हुआ. उन्होंने अपने भाषण में कहा, ‘‘भारतीय मुसलमान बाहर से नहीं आये है. वे इसी देश के है; और हिंदुओं के समान ही वे भी यहॉं के राष्ट्रीय जीवन के अभिन्न घटक है.’’
सुदर्शन जी ने आगे कहा कि, ‘‘इस देश में रहने वाले सब हिंदू है.’’ उन्होंने जामा मस्जिद के इमाम के साथ घटित प्रसंग बताया. इमाम जब हज यात्रा को गए थे, तब उन्हें एक स्थान पर अपना परिचय देना पड़ा. उन्होंने बताया, मैं हिंदुस्थान से आया हूँ. रेकॉर्ड में उन्हें हिंदू दर्ज किया गया. इसलिए, सुदर्शन ने बताया, ‘‘हम सब हिंदू है और हमारा देश हिंदुस्थान है.’’
कार्यक्रम में मंच पर ‘मुरामं’ के राष्ट्रीय संयोजक महंमद अफजल, सहसंयोजक और शिबिर के प्रमुख अब्बास अली बोहरा, छत्तीसगढ़ वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष सलीम अश्रफी और पूर्व राष्ट्रीय संयोजक सलाबत खान उपस्थित थे.
राष्ट्रीय संयोजक महंमद अफजल ने अपने भाषण में कहा, ‘‘१८५७ के स्वाधीनता संग्राम में हिंदू और मुसलमान एक थे. लेकिन ब्रिटिशों ने, उनमें फूट ड़ाली. स्वाधीनता के बाद कॉंग्रेस पार्टी ने, मुसलमानों को केवल एक व्होट बँक बना दिया.’’ उन्होंने, जम्मू-कश्मीर की रियासत भारत में विलीन करने के लिए, संघ के द्वितीय सरसंघचालक श्रीगुरुजी ने, महाराज हरिसिंग को कैसे मनाया, यह भी स्पष्ट किया. उन्होंने मुस्लिम बंधुओं को आवाहन किया कि कॉंग्रेस की चाल पहचानों, केवल एक व्होट बँक के रूप में अपना अस्तित्व कायम रखने से सावधान रहो.
इस्लाम शांति का धर्म है और इस्लाम में आतंकवाद को कोई स्थान नहीं, यह उन्होंने जोर देकर बताया. दारूल-उलूम-देवबंद ने आतंकवाद के विरुद्ध जो फतवा निकाला है, उसके पीछे ‘मुरामं’ की भूमिका का प्रभाव है, ऐसा उन्होंने कहा.
उन्होंने आगे कहा, ‘‘सब प्रकार के खतरे उठाकर ‘रामुमं’ने श्रीनगर में तिरंगा फहराया था और वहॉं ‘वंदे मातरम्’ गाया था. अमरनाथ की यात्रा में भी हमने भाग लिया और १० लाख मुस्लिमों के स्वाक्षरीयों के साथ गोहत्या बंदी की मॉंग का निवेदन राष्ट्रपति को प्रस्तुत किया.’’
सरसंघचालक श्री मोहन जी भागवत के एक विधान का उल्लेख कर उन्होंने कहा, ‘‘भारत का भावी प्रधानमंत्री रा. स्व. संघ का स्वयंसेवक होना चाहिए.’’ इसका उपस्थितों ने तालियों से स्वागत किया.
शिबिर में मंच के एक मार्गदर्शक श्री इंद्रेश कुमार जी का भी भाषण हुआ. उन्होंने जानकारी दी कि ‘रामुमं’ एक रक्तपेढी (ब्लड बँक) स्थापन करने जा रहा है. राजस्थान के संयोजक डॉ. मुन्नावर चौधरी ने प्रास्ताविक और राष्ट्रीय सहसंयोजक अबु बकर नकवी ने संचालन किया. तीन दिनों के इस शिबिर में २५ राज्यों में से २०० प्रतिनिधि आये थे.    
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जिब्रान का ‘वो देश’
खलिल जिब्रान लेबॅनॉन देश का लेखक. इ. स. १८८३ में उसका जन्म हुआ; और १९३१ में उसकी मृत्यु हुई. ४८ वर्ष की अल्पायु में उसने अनेक पुस्तकें लिखी. उनमें से अधिकांश का विश्‍व की प्रमुख भाषाओं में अनुवाद हुआ है. उसकी मर्मज्ञता, प्रतिभा और संक्षिप्त में सखोल आशय व्यक्त करने की शैली असामान्य है.
जिब्रान की कहानियों में एक पात्र- अल मुस्तफा ‘वो देश’ कैसा है इसका वर्णन कर रहा है. वह वर्णन हमारे देश को भी या ये कहें सब देशों को कैसे लागू होता है, यह देखने लायक है. जिब्रान लिखता है -

‘‘वो देश दयनीय है, जो निर्दयी मनुष्य को शूरवीर समझता है और घमण्ड़ दिखानेवाले को उदार समझता है.’’
‘‘वो देश दयनीय है, जो स्वयं बनाए कपड़े परिधान नहीं करता और अपने देश में बनी मदिरा नहीं पीता.’’
‘‘वो देश दयनीय है, जो स्वप्न में विशिष्ट इच्छा का तिरस्कार करता है और जागृति में उसी इच्छा के स्वाधीन रहता है.’’
‘‘वो देश दयनीय है, जो शवयात्रा के अलावा अन्य समय अपनी आवाज नहीं उठाता, अपने इतिहास के प्राचीन अवशेषों के अलावा अभिमान करने जैसी कोई भी वस्तु जिसके पास नहीं, जो गर्दन पर तलवार का आघात होने की नौबत आए बिना कभी विद्रोह नहीं करता.’’
‘‘वो देश दयनीय है, जिसकी राजनीतिज्ञ एक लोमड़ी है, जिसका तत्त्वज्ञ एक जादुगर है और जिसकी कला बहुरूपिये के स्वांग से आगे नहीं गई है.’’
‘‘वो देश दयनीय है, जो अपने नए राजा का धूमधाम से स्वागत करता है और तुरंत ही उसकी अवहेलना कर उसको बिदा करता है- इसलिए कि नए राजा का धूमधाम से स्वागत करने की व्यवस्था हो.’’
‘‘वो देश दयनीय है, जिसके महान् पुरुष अनेक वर्षों से गूंगे हैं और जिनके शूरवीर अभी पालने में सोए हैं.’’
‘‘वो देश दयनीय है, जो अनेक टुकड़ों में बँटा है और हर टुकड़ा स्वयं को संपूर्ण देश समझता है’’
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                             राम का डाक टिकट
इंडोनेशिया में १९६२ में रामायण पर आधारित ६ डाक टिकटों की एक मालिका निकाली गई. १० रुपयों के टिकट पर राम, तो ३० रुपये के टिकट पर राम, सीता और सुवर्णमृग के चित्र थे. इंडोनेशिया मुस्लिमबहुल देश है. वहॉं मुसलमानों की संख्या ८६ प्रतिशत से अधिक है; और हिंदू है करीब २ प्रतिशत. राम और रामायण के बारे में उस देश को आत्यंतिक प्रेम और आदर है.
इंडोनेशिया के समान ही दक्षिण-पूर्व एशिया में म्यांमार और व्हिएतनाम के बीच लाओस नाम का देश है. यह कम्युनिस्ट देश है. लेकिन उस देश ने भी अनेक बार राम और उससे संबंधित व्यक्तियों पर डाक टिकट निकाले हैं. यह बौद्धों का देश है. ९४ प्रतिशत जनसंख्या बौद्ध है. उसने १९७३ में रामायणाधारित ८ डाक टिकट प्रकाशित किए और १९९६ में और ४.

हमारे भारत के बारे में न पूछें. इस दुर्भाग्यशाली देश की सरकार ने राम का ऐतिहासिक अस्तित्व ही नकारा है.
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                        सेंट मेरी चर्च में ‘हिंदू दिवस’
इंग्लैंड के नैर्ऋत्य में सेंट मेरी चर्च है. इस चर्च द्वारा, ब्रिडपोर्ट गॉंव में एक प्राथमिक शाला चलाई जाती है. उस शाला ने २०१२ के मई माह में, एक दिन ‘हिंदू दिवस’ मनाया. सब बच्चें हिंदू वेषभूषा में आये थे. उन बच्चों ने हिंदू पद्धति से संपन्न हुआ विवाह समारोह देखा; और हिंदू पद्धति के नृत्य का प्रदर्शन भी किया.
शाला की वेबसाईट पर कहा है कि, बच्चों में हिंदू धर्म के बारे में अधिक जानने की इच्छा निर्माण हुई है. बच्चों की आध्यात्मिक उन्नति हो, ऐसी शाला के संचालकों की इच्छा है. उस दृष्टि से हिंदू धर्म के बारे में विद्यार्थीयों को जानकारी दी जाती है.   
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                        अंतरिक्ष में उपनिषद
सुनीता विल्यम्स यह भारतीय मूल की धाडसी महिला दुनिया में सुपरिचित है. गत १४ जुलाई को वह अंतरिक्ष में गई है. उसकी यह अंतरिक्ष यात्रा ६ माह चलेगी. इस दीर्घ यात्रा में पढ़ने के लिए वह कौनसी पुस्तके ले गई है? सब पुस्तकों की सूची तो उपलब्ध नहीं. लेकिन उन पुस्तकों में उपनिषद है. उसके पिता दीपक पंड्या ने ही उसके साथ उपनिषदों का अंग्रेजी अनुवाद दिया है. श्री पंड्या कहते है, ‘‘इस पृथ्वी से वह जितनी अधिक ऊँचाई पर जाएगी, उतना ही उसे अपने भारतीय मूल का ज्ञान होगा.’’ वे आगे बताते है, ‘‘पिछली बार की उसकी अंतरिक्ष यात्रा में मैंने उसके साथ भगवद्गीता दी थी. उसने वह पढ़ी. वापस आने के बाद भगवद्गीता के बारे में उसने मुझे अनेक प्रश्‍न पूछें. उसे उन सब प्रश्‍नों के उत्तर निश्‍चित ही उपनिषद में मिलेंगे.’’ 
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                        दिव्यराज की मानवसेवा
उसे सब कुमार नाम से जानते है. वह कोई काम नहीं करता. भटकता रहता है. रेल के प्लॅटफार्म पर सोता है. कोई जो कुछ देता है, उसी से गुजारा करता है. वह तिरुपुर गॉंव का निवासी है. यह गॉंव तमिलनाडु में है.
एक दिन अनोखी घटना हुई. वह रास्ते के किनारे लेटा था. उसी समय, एक कार आकर उसके पास रुकी. उसमें से कुछ लोग उतरे. उनके हाथों में कैची और कंघी थी. उन्होंने कुमार को अच्छी तरह से बिठाकर, तरीके से उसके बाल काटे. दाढी भी बनाई. उसे एक नया कुर्ता और खाने के लिए कुछ अन्न दिया, फिर चले गए.     
किसका था यह अनोखा उपक्रम. उस व्यक्ति का नाम है एन. दिव्यराज. वह ‘हेअर स्टायलिस्ट’ है. वह ‘न्यू दिव्या हेअर आर्टस ट्रस्ट’ नाम की संस्था चलाता है. इस संस्था में उसके कुछ मित्र और उसके घर के लोग भी उसे मदद करते हैं. जो मानसिक या शारीरिक दृष्टी से अपंग है, दरिद्र भिकारी है, उनके चेहरों को दिव्यराज का यह ट्रस्ट नया, सुंदर रूप देता है. गत चार वर्षों से यह उपक्रम चल रहा है.
दिव्यराज के साथ १२ लोग काम करते हैं. वे ऐसे लोगों की खोज करते रहते है. उनके एक दिन के भोजन की व्यवस्था भी करते है. तीन माह में एक बार वे तिरुपुर के बाहर जाकर सेवा देते है. इस उपक्रम में उन्होंने दिंडीगल, त्रिचनापल्ली, इरोड, नामकल्ल और करूर इन गॉंवों को भेट दी है. ९४४२३७२६११ इस मोबाईल क्रमांक पर कोई भी उनसे संपर्क कर सकता है.
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                              ‘मोरगॉंव’
मध्य प्रदेश में नीमच नाम का एक जिला है. उस जिले में बासनियां नाम का एक छोटा गॉंव है. गॉंव की जनसंख्या है केवल ४००. लेकिन गॉंव में मोरों की संख्या इससे दुगुनी मतलब ८०० है. यह बासनियां सही अर्थ में ‘मोरगॉंव’ बन गया है.
अरवली पर्वत की तलहटी में बसे इस गॉंव के लोगों का पशु-पक्षियों के साथ बहुत ही प्रेम का रिश्ता कायम हुआ है. गॉंव में सर्वत्र मोर दिखाई देंगे. खेतों में, रास्ते पर और घरों के छत पर भी!
मोर और मनुष्यों के बीच ऐसे प्रेमसंबंध निर्माण हुए है कि, मनुष्यों को देखकर मोर भागते नहीं. दौड़कर उनके पास आते हैं. उन्हें विश्‍वास है कि, मनुष्यों से उन्हें खतरा नहीं है.
                  (‘संस्कारवान’ मासिक, जुलाई २०१२ से)
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                              वेद सब के हैं
वेद सब के हैं और संन्यास कोई भी ले सकता है, यह आद्य शंकराचार्य ने स्थापन किए चार मठों में से एक - शृंगेरी - मठ ने दिखा दिया है. दलित के घर में पैदा हुए, शिवानंद नाम के व्यक्ति को वहॉं संन्यास की दीक्षा दी गई है, वह वहॉं आजन्म ब्रह्मचारी रहने वाला है. अर्थात् उसका उपनयन संस्कार हुआ है, उसने वेदोपनिषदों का भी अध्ययन किया है.

- मा. गो. वैद्य
babujivaidya@gmail.com

Saturday, 25 August 2012

भारतीय मुसलमान ही इस्लाम को बचा सकेंगे

गत ११ अगस्त को मुंबई के आज़ाद मैदान में ‘रजा ऍकॅदमी’ नाम की मुस्लिम संस्था ने एक निषेध सभा का आयोजन किया था. असम और म्यांमार में मुसलमानों पर जो कथित अत्याचार किए गए, उनका निषेध करने के लिए यह सभा, या धरना आंदोलन था. इसके लिए संस्था ने सरकार से अनुमति ली थी; और करीब हजार-डेढ हजार कार्यकर्ता उपस्थित रहेंगे, ऐसा निवेदन दिया था. लेकिन, वास्तव में वहॉं पंधरा हजार से अधिक मुसलमानों की भीड इकट्ठा हुई और उन्होंने जमकर हिंसाचार किया. उनका मुख्य आघात-लक्ष्य पुलीस और प्रसार माध्यम थे, ऐसा दिखता है. सरकारी आँकड़ों के अनुसार, इस हिंसाचार में २ की मौत हुई, और ५४ लोग घायल हुए. उन ५४ में ४५ पुलीस कर्मचारी थे. उन्होंने दूरदर्शन के दो चॅनेल के वाहन भी जला डाले, और अनेक छायाचित्रकारों के साथ मार-पीट कर उनके कॅमेरे भी तोड़े. पुलीस की गाडियों को भी उन्होंने आग लगाई. बसेस की भी उन्होंने तोड-फोड की. नीजि वाहन भी उनके हिंसाचार से बच नहीं पाए.

हिंसाचार का कारण
मुसलमानों के ऐसे और इतना भडकने का कारण क्या? जिस हिंसाचार में मुसलमानों की अधिक हानि हुई, वह म्यांमार और सुदूर असम में हुआ था. म्यांमार में बौद्ध बहुसंख्य है. ८९ प्रतिशत. मुसलमान केवल ४ या ५ प्रतिशत. एक मुसलमान ने बौद्ध लड़की पर बलात्कार किया, इस कारण वहॉं के बौद्धों ने मुसलमानों को पीटा. म्यांमार में की घटना का अधिक ब्यौरा भारतीय समाचारपत्रों में प्रकाशित या प्रसार माध्यमों में प्रसारित नहीं किया गया. इसका अर्थ, वह बहुत गंभीर होने की संभावना नहीं दिखती. असम के कोक्राझार और चिरांग इन दो जिलों में बोडो जनजाति के लोग और बांगला देश में से आये मुस्लिम घुसपैंठियों के बीच संघर्ष हुआ. अब, ऐसा प्रकाशित हुआ है कि, इस संघर्ष में स्थानिक मुसलमानों का भी काफी नुकसान हुआ है.

शुरुवात मुसलमानों ने ही की
इन दोनों स्थानों पर के संघर्ष में मुसलमानों को अधिक मार पड़ा, ऐसा दिखता है. अन्यथा, हमारे ‘सेक्युलर’ देश के प्रधानमंत्री और गृहमंत्री दौडकर असम नहीं जाते. उनका म्यांमार में जाना संभव ही नहीं था. कारण वह हमारे भारत का हिस्सा नहीं और शायद वहॉं, हमारे यहॉं जैसे विकृत सेक्युलॅरिझम का हो-हल्ला चलता है, वह भी नहीं. यह बात भी ध्यान में रखनी चाहिए कि, उकसाने का काम पहले मुसलमानों की ओर से हुआ. म्यांमार में और कोक्राझार में भी. असम के कोक्राझार जिले में प्रथम स्थानिक बोडो जनजाति के चार युवकों की मुसलमानों ने हत्या की. लेकिन, केवल इतने से ही उनका समाधान नहीं हुआ. उन्होंने पड़ोस मे शांति से रहने वाले बोडो के भी घर जलाना शुरू किया. फिर इस पर बोडो की ओर से बहुत ही उग्र प्रतिक्रिया हुई. उन्होंने जैसे को तैसा प्रखर जबाब दिया. लाखों मुसलमान बेघर हुए. बोडो की भी हानि हुई. निर्वासित शिबिरों में उनकी संख्या भी लाखों में है. इस बारे में अधिक ब्यौरा ८ अगस्त के अंक में प्रकाशित इसी स्तंभ में आ चुका है. इस कारण, यहॉं उसकी पुनरावृत्ति नहीं करता हूँ.

नकारात्मक परिणाम
सामान्यत:, मुसलमानों की ओर से प्रारंभ होने वाले हिंसाचार में उनके विरोधियों की हानि अधिक होती है. कारण, मुसलमान योजनापूर्वक आक्रमण करते हैं इसलिए वे आघात-लक्ष्य पहले ही निश्‍चित कर सकते हैं. जब विरोधीयो का प्रतिकार शुरू होता है, तब तक बहुत हानि हो चुकी होती है और फिर पुलीस और अन्य सुरक्षा-दल वहॉं उपस्थित होने के कारण हिंसाचार पर काबू किया जाता है. कोक्राझार और पडोस के चिरांग जिले में ऐसा नहीं हुआ. अब वहॉं पुलीस और अतिरिक्त सुरक्षा दल उपस्थित होते हुए भी हिंसाचार पूर्णत: थमा नहीं है. लोग अभी भी निर्वासित छावनियों में हैं. पडोस में रहने वाले मुसलमानों की कृतघ्नता भोगने के कारण, बोडो अब उन्हें अपने पडोस में नहीं रहने देना चाहते.

परिवर्तन का अवसर
लेकिन प्रश्‍न यह है कि, असम या म्यांमार की घटनाओं की हिंसक प्रतिक्रिया मुंबई के मुसलमानों में क्यों प्रकट हो? मुसलमानों पर कहीं भी ‘अत्याचार’ या ‘अन्याय’ हो, दुनिया के मुसलमानों को क्रोध आता है, ऐसी एक धारणा है. फिर गुवाहाटी, कोलकाता, पटना, लखनौ, दिल्ली में उस पर प्रतिक्रिया क्यों नहीं प्रकट हुई? (अब एक सप्ताह बाद लखनऊ और इलाहाबाद में भी मुसलमानों के हिंसक आंदोलन के समाचार है). यह सब बड़े शहर, मुंबई की अपेक्षा कोक्राझार या असम के समीप है. इन शहरों में कुछ घटित न हो और सुदूर मुंबई में हो, इसका क्या कारण है? ‘रजा ऍकॅदमी’ जैसी मुसलमानों की संस्थाएँ तो उन शहरों में भी होगी ही. मुझे विश्‍वास है कि जिस म्यांमार देश की घटनाओं के निषेध में मुंबई में हिंसाचार हुआ, वह देश कहॉं है, यह भी, मुंबई में, पुलीस की गाडियॉं जलाने वाले, महिला पुलीस के साथ दुर्व्यवहार करने वाले और जनता के वाहन जलाने वाले नराधमों को पता नहीं होगा. म्यांमार की बात ही छोड़ दे. कोक्राझार कहॉं है, यह भी वे हिंसाचारी बता नहीं सकेंगे. इससे एक ही निष्कर्ष निकलता है कि, मुंबई में का हिंसाचार पूर्वनियोजित था. यदि हम मान भी ले कि, ‘रजा ऍकॅदमी’ने उसकी योजना नहीं बनाई थी. लेकिन, उस संस्था को इन कुछ प्रश्‍नों के उत्तर देने ही होगे कि, उनके मंच से भड़काऊ भाषण क्यों दिए गए? ऍकॅदमी के नेताओं ने उन्हें क्यों नहीं रोका? कोक्राझार और म्यांमार में मुसलमानों पर अत्याचार हुए, उसके चित्र मुंबई कैसे पहुँचे? अब स्पष्ट हुआ है कि, जो चित्र दिखाकर मुसलमानों की भीड को भडकाया गया, वे न कोक्राझार के थे, न म्यांमार के. ऐसा कहा जाता है कि, वह थे २००२ के गुजरात दंगों के. यह सच है कि, गुजरात में मुसलमानों को जो भोगना पड़ा वह अभूतपूर्व था. गुजरात में २००२ के पूर्व अनेक दंगे हुए हैं. हर बार शुरुवात मुसलमानों की ओर से ही हुई थी. २००२ में भी, मुसलमानों ने ही ५७ गुजराती कारसेवकों को, वे यात्रा कर रहे गाडी के डिब्बे को आग लगाकर, जिंदा जला दिया था. शांत स्वभाव के लिए विख्यात, गुजराती हिंदुओं में इस कांड की ऐसी अकल्पित कठोर प्रतिक्रिया हुई कि, जिसके तीव्रता की किसी ने कल्पना भी नहीं की थी.

मुसलमानों का कर्तव्य
इसलिए, मुसलमान ध्यान रखे कि, गोध्रा हो या कोक्राझार या म्यांमार, अब भविष्य में जनता उनकी गुंडागर्दी नहीं सहेगी. मुसलमानों ने स्वयं को संभालना चाहिए. समझदार मुसलमानों की संख्या निश्‍चित ही गुंड प्रवृत्ति के उनके धर्म-बंधुओं से अधिक है. उन्होंने अपराधी प्रवृत्ति के लोगों को नियंत्रित करना चाहिए. इसी में संपूर्ण समाज का हित है. कल्पना करे कि, मुंबई के मुसलमान गुंडों का अकारण हिंसाचार देखकर हिंदू भड़के और उस हिंसाचार को वैसा ही प्रत्युत्तर देने लगे, तो कैसा अनर्थ होगा? मुझे नहीं लगता कि, मुंबई के मुसलमान ऐसा कुछ चाहते होगे. इसलिए, मुंबई के हिंसाचार की सही में उन्हें शर्म आती होगी, तो हर गॉंव के मुसलमानों ने शांति मोर्चे निकालकर या मूक प्रदर्शन कर अपने समाज के गुंडाईयों का निषेध करना चाहिए. उसी प्रकार, ईशान्य भारत के जो लोग नौकरी या पढ़ाई के लिए मुंबई, पुणे, बंगलोर, चेन्नई आदि शहरों में रहते हैं, उनकी सहायता कर उन्हें दिलासा देना चाहिए. उन्हें विश्‍वास दिलाना चाहिए कि डरो मत. जो कोई उन्हें एसएमएस भेजकर या अन्य तरीके से धमका रहे हैं, उन्हें मुसलमानों ने उत्तर देना चाहिए और ईशान्य भारत के लोगों की सुरक्षा के लिए हम दक्ष है, ऐसा दिखाना चाहिए. अन्यथा, इस धमकाने को उनकी भी सम्मति है, ऐसा ही निष्कर्ष निकाला जाएगा.

पश्‍चिम एशिया का चित्र
म्यांमार या कोक्राझार में हुई जानो-माल की हानि से प्रक्षुब्ध होने के बदले भारतीय मुसलमानों ने पश्‍चिम एशिया में आज जो हो रहा है उसकी अधिक चिंता करनी चाहिए. क्या हो रहा है पाकिस्तान या अफगाणिस्तान में? अथवा इराक में? या येमेन और सिरिया में? वहॉं कौन किसे मार रहा है? मुसलमान ही मुसलमानों को मार रहे हैं! अभी का समाचार है. गुरुवार १६ अगस्त का. दूर म्यांमार में का नहीं. पड़ोस के पाकिस्तान में का. तीन बसेस से यात्री जा रहें थे. उन्हें रोका गया. उनमें से २२ को नीचे उतारा गया. उनकी पूछताछ की गई. उनमें १२ शिया पंथी निकले. उनकी गोलियॉं मारकर हत्या की गई! क्या अपराध था उनका? यहीं कि वे शिया थे! पर थे तो मुसलमान ही! यह कैसा तुम्हारा इस्लामी मजहब, जो अपनो में के ही एक विशिष्ट पंथ के लोगों को जीने का अधिकार भी नहीं देता? उसी दिन इराक में भी वही हुआ. वहॉं २२ लोगों की हत्या की गई. वे ‘काफीर’ नहीं थे. मुसलमान ही थे. आज इराक में बहुसंख्यीय शिया लोगों की सत्ता है. इसके पहले सद्दाम हुसेन इस सुन्नी पंथीय तानाशाह की सत्ता थी. इराक में शिया पंथियों की संख्या ६१ प्रतिशत है और सुन्नी ३१ प्रतिशत है. लेकिन, सुन्नी सद्दाम, फौज के दम पर, बहुसंख्य शिया पर अन्याय और अत्याचार करता था. अब अमेरिका के हस्तक्षेप के कारण बहुसंख्य शिया की सत्ता स्थापन हुई है. यह सुन्नियों को पसंद नहीं. इसलिए वहॉं खूनी संघर्ष चलता रहता है. सीरिया में तो गृहयुद्ध ही चल रहा है. कौन किसकी हत्या कर रहा है? मुसलमान ही मुसलमानों की! जो सिरिया में, वही येमेन में, वही अफगाणिस्थान में. वहॉं सत्ता से बेदखल हुए तालिबान सत्तारूढ मुसलमानों की जान ले रहे हैं. यह सब रक्तलांछित, लांछनास्पद हिंसाचार, थोडा गंभीरता से सोचे, तो इस्लाम को ही लांछित कर रहा है. इसके विरुद्ध क्यों नहीं हुए निषेध प्रदर्शन?

हिंदू धर्म का उदाहरण
यह आपसी संघर्ष इस्लाम को केवल लांछित ही नहीं कर रहा, तो वह इस्लाम का भविष्य भी खतरे में डाल रहा है. इस इस्लाम को कौन बचा सकेगा? मेरी अल्पमति के अनुसार भारतीय मुसलमान ही, ठान ले, तो यह मुष्किल काम कर सकेगे. भारतीय ही क्यों? क्योंकि उनके सामने हिंदू धर्म का उदाहरण है. हजारों वर्षों की यात्रा में यहॉं कई पंथों का उदय हुआ और वे सब अभी भी जीवित है और सम्मान से जी रहे हैं. वेदप्रामाण्य न मानने वाले बौद्ध और जैन हैं. वैदिक हिंदू और बौद्ध या जैनों के बीच कभी हिंसक दंगे हुए? हॉं, ‘शास्त्रार्थ’ हुए? लेकिन ‘शस्त्रार्थ’ नहीं हुआ. ‘गीतगोविंद’ का रचियता कवि जयदेव लिखता है,
‘‘निन्दसि यज्ञविधेरहहू श्रुतिजातम् |
सदयहृदय दर्शितपशुघातम् |’’
 मतलब, हे दयाशील बुद्ध, यज्ञ में की हिंसा देखकर तुमने सब श्रुती की निंदा की.  लेकिन उस बुद्ध को भी हिंदुओं ने अपना ९ वा अवतार माना. जयदेव कहता है, तू बुद्ध शरीर धारण किया केशव मतलब कृष्ण ही है. हिंदूओं में बहुसंख्य लोग मूर्तिपूजक हैं. लेकिन आर्य समाजी और सिक्ख मूर्तिपूजा नहीं मानते. पहले अग्निपूजा मानते है, तो दूसरे ग्रंथसाहब. चल रहा है न उनका अस्तित्व! फिर मुसलमानों में वहाबी, सुन्नी, शिया, खोजा, बोहरा, कादियानी यह सब क्यों नहीं चलता? पाकिस्तान ने तो कादियानियों को गैरमुस्लिम घोषित किया है. ऐसा असहिष्णु, हिंसा को प्रोत्साहन देने वाला इस्लाम नए जमाने में टिक सकेगा?
  
आशा
इसलिए इस्लाम ने हिंदूओं से सीख लेनी चाहिए. इसके लिए उपयुक्त वचन पवित्र कुरान में हैं. महंमद साहब बताते है, ‘‘आप जिसकी उपासना करते है, उसकी उपासना मैं नहीं करता; और मैं जिसकी उपासना करता हूँ, उसकी उपासना आप नहीं करते. आपका मजहब आपके लिए. मेरा मेरे लिए है.’’ एक अन्य स्थान पर वे कहते है, ‘‘हे अल्लाह, दुनिया में ऐसे लोग है जो तेरे अस्तित्व पर विश्‍वास नहीं करते. लेकिन उन्हें सहन कर. उन्हें शांति प्रदान कर. उन्हें उनकी भूल समझ आएगी.’’ पवित्र कुरान में की निश्‍चित सुरा और आयत तो मैं नहीं बता सकता. कारण, इस समय मेरे पास पवित्र कुरान नहीं है. लेकिन ऊपर उद्धृत वचन पवित्र कुरान में के ही हैं. ऐसा व्यापक दृष्टिकोण स्वीकार किया, तो शिया-सुन्नी या सुन्नी-वहाबी, या कादियानी अथवा अन्य हिंसक विवाद ही इस्लाम में शेष नहीं रहेगे. चर्चा अवश्य होनी चाहिए लेकिन हिंसा नहीं. एक बार यह प्रक्रिया शुरु हुई तो फिर इस्लाम और अन्य मतों के बीच भी संवाद शुरु होगा. गन्तव्य स्थान एक होते हुए भी, वहॉं तक जाने के मार्ग अनेक हो सकते हैं, यह भी वे मान्य करेगे. जब कोई भी धर्म चलते रहता है, तब समयानुकूल उसमें परिवर्तन की आवश्यकता होती है, यह भी वे जान जाएगे और शाश्‍वत क्या, युगधर्म क्या, और आपद्धर्म या अपवादभूत आचरण क्या इसका विवेक वे कर सकेगे. कोई भी विचार, या भावना, विशिष्ट काल-बिंदु के पास यथास्थिति रुकी नहीं रहती. उसमें परिवर्तन करना ही पड़ता है. जो एक काल-बिंदु के पास थम जाते हैं, वे समाप्त हो जाते हैं, यह सनातन नियम है. इस दृष्टि से इस्लाम की कालानुरूप व्याख्या करते आनी चाहिए. हिंदूओं ने ऐसा ही किया इसलिए अनेक जानलेवा आपत्तियॉं सहने के बाद भी उनका धर्म जीवित बचा रहा. इस संदर्भ में मूल शब्द बदलने की आवश्यकता नहीं होती. उन शब्दों का आशय अधिक सखोल और व्यापक करने की आवश्यकता होती है. हिंदू धर्म के विकास का इस प्रकार अध्ययन करना, भारतीय मुसलमानों के लिए सहज संभव है. उन्होंने वह किया, तो ही वे इस्लाम को जीवित रख सकेगे. इतना ही नहीं कालोचित भी सिद्ध कर सकेगे. आज पश्‍चिम एशिया के मुस्लिम राष्ट्र मार-काट में ऐसे उलझे है कि वे अपने साथ इस्लाम को भी समाप्त करेगे. क्या भारतीय मुसलमान यह आव्हान स्वीकार करेगे? वे स्वयं को सही तरीके से संभालेगे और अपने में के अपराधी प्रवृत्ति के लोगों को दूर रखेगे तथा आवश्यकतानुसार कठोरता स्वीकार कर उन्हें नियंत्रण में रखने की हिंमत करेगे?

- मा. गो. वैद्य         
(अनुवाद : विकास कुलकर्णी)
babujivaidya@gmail.com