Monday, 7 January 2013

कठोर कानून तो चाहिए ही, लेकिन संस्कार व्यवस्था भी हो


१६ दिसंबर को, राजधानी दिल्ली में चलती बस में एक २३ वर्षीय युवती पर पशु को भी शर्मिंदा करने वाला राक्षसी लैंगिक अत्याचार मानव देहधारी बदमाशों ने किया, उसने देश के समाजजीवन को झकझोंर दिया. सामान्यत: अपने विश्‍व में खोया रहने वाला मध्यम वर्ग बड़ी संख्या में रास्ते पर उतरा; और उसने उन गुंडों को फॉंसी पर लटकाने की मॉंग की. ऐसी कठारे सजा देना संभव हो, इसलिए विद्यमान कानून में बदल करे, ऐसी भी मॉंग की गई. हमारे सौभाग्य से सरकार ने यह बात गंभीरता से ली और निवृत्त न्यायमूर्ति जे. एस. वर्मा की अध्यक्षता में एक आयोग भी नियुक्त किया. लोग उसे अपनी सूचनाएँ भेजे, ऐसी अधिकृत सूचना भी की.

अनेक सूचनाएँ
बलात्कारी के लिए फॉंसी का प्रावधान यह एक मॉंग है; एकमात्र नहीं. महिला पर बलात्कार करने वाले के लिए फॉंसी की सजा का प्रावधान होने से ही काम नहीं चलेगा, इससे बलात्कार की शिकार महिला की हत्या की जाने की संभावना भी रहेगी, ऐसा मत कुछ लोगों ने व्यक्त किया. किसी ने अपराधी को नपुंसक बनाने की सूचना दी, तो अन्य कुछ ने, उस अपराधी को केवल नपुंसक बनाकर न छोड़े; जैसे सांड का बैल बनाकर उसे बोझ ढोने में लगाते है, वैसे उस नरपशु को नपुंसक बनाने के बाद सजा में उससे कठोर काम भी करा लेने चाहिए, ऐसी सूचना की. ये और अन्य कुछ सूचनाएँ भी वर्मा आयोग दर्ज करा लेगा ही. उस आयोग की ओर से क्या सिफारसें आती है, यह शीघ्र ही पता चलेगा. यहॉं ध्यान में लेने लायक बात यह है कि, मुंबई उच्च न्यायालय ने महिलाओं की सुरक्षा के संदर्भ में राज्य सरकार भी कानून बनाए, ऐसा सूचित किया है. संसद के कानून बनाने तक राज्यों ने रूके रहने की आवश्यकता नहीं. केवल महाराष्ट्र ही नहीं, अन्य राज्य भी मुंबई उच्च न्यायालय के इस निर्देश का गंभीरता से विचार करे.

जलदगति न्याय
बलात्कार के मुकद्दमें नियमित न्यायप्रक्रिया के अनुसार मतलब जिसमें विलंब गृहित माना ही जाता है, न चले, उसका फैसला त्वरित हो और पीडित व्यक्ति को न्याय मिले, ऐसी भी सूचना है, उसके अनुसार सरकार ने काम भी शुरु किया है. २ जनवरी को ही दिल्ली में ऐसे एक जलदगति न्यायालय का उद्घाटन सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति अल्तमस कबीर के हस्ते हुआ है. लैंगिक बलात्कार के अत्यंत संवेदनशील मामले के बारे में सरकार पर्याप्त गंभीरता से विचार कर रही है, यही इससे स्पष्ट होता है.

कानून आवश्यक
लेकिन, हम यह भी समझ ले कि, कानून की शक्ति की भी कुछ मर्यादाएँ होती है. कठोर कानून होना ही चाहिए और उसका कठोरता से उपयोग भी होना चाहिए, इस बारे में संदेह नहीं. यह भी सच है कि, चोरी, हत्या, बलात्कार के संदर्भ में कानून है ही. फिर भी चोरियॉं होती ही है. हत्याए भी होती है और बलात्कार भी होते है. इसलिए कानून नहीं चाहिए, ऐसा कोई नहीं कहता. इसका यहॉं उल्लेख करने का कारण यह कि, जब भ्रष्टाचार के घटनाओं की तुरंत और गंभीरता से दखल लेकर भ्रष्टाचारियों को तुरंत एवं कठोर सजा हो इसलिए सक्षम लोकपाल की नियुक्ति के लिए अण्णा हजारे का आंदोलन पूरे जोर पर था तब ऐसा प्रश्‍न उपस्थित किया गया था कि, क्या कानून से भ्रष्टाचार समाप्त होगा? उस विषय पर इसी स्तंभ में मैंने लिखा था कि, ऐसे प्रभावी लोकपाल की नियुक्ति करने का कानून आवश्यक है. तब भी मैंने कहा था कि, चोरी, हत्या, बलात्कार के अपराध के विरुद्ध कानून होते हुए भी वह अपराध होते ही रहते है, इसलिए वह कानून व्यर्थ है, ऐसा हम कहते है? इसलिए बलात्कार के अपराध में अपराधियों को भय लगे, ऐसे कानून की नितांत आवश्यकता है; और आज की सरकार की और विरोधी पार्टिंयों की मानसिकता ध्यान में ले, तो ऐसा कानून संसद में पारित होने में कोई दिक्कत नहीं.

संस्कार-व्यवस्था का विचार
यह हुआ भय निर्माण करने का प्रश्‍न. ऐसे अपराधही न हो, क्या ऐसा वातावरण निर्माण किया जा सकेगा, इस बारे में मुझे यहॉं विचार करना है; और मुझे लगता है कि इस दृष्टि से समाज और उसका प्रतिनिधित्व करने वाली सरकार भी विचार करें. वह है संस्कार-व्यवस्था का विचार.
मेरे मतानुसार संस्कार आवश्यक है. संस्कार ही मनुष्य को पशु से अलग करते है. पशु और मानव की प्रकृति कुछ बातों में समान है. आहारनिद्राभयमैथुनं च समानमेतत् पशुभिर्नराणाम् यह उक्ति प्रसिद्ध है. लेकिन पशु की एक बात अच्छी होती है. वे प्रकृतिनुसार ही बर्ताव करते है. उनमें जैसी संस्कृति नहीं आती, वैसे विकृति भी नहीं आती. मैं कई बार एक उदाहरण देता हूँ. सामने पड़े हरे चारे के ढ़ेर पर का चारा खाने के लिए दो बैल एक ही समय पर पहुँचे. उनमें एक हट्टा-कट्टा और दूसरा दुर्बल हो तो हट्टा-कट्टा बैल दुर्बल बैल से यह नहीं कहेगा कि, पहले तू चारा खा. भूखा है, समाने चारा पड़ा है, तो वह उस चारे पर टूट पड़ेगा और दूसरे बैल को सिंगों से दूर हाटने की कोशिश करेगा. यह पशु की प्रकृति है. दुबले को पहले खाने दे, और बाद में हम खाए, या दोनों मिलकर खाए, ऐसा कहना संस्कृति है. वह बैलों में नहीं आएगी. लेकिन पशु में कोई विकृति भी नहीं आती. पेट भरने के बाद चारा शेष बचा, तो बैल उसे बांधकर ले नहीं जाता! लेकिन आदमी का भरोसा नहीं! इसलिए, मनुष्य विकृति की ओर न जाय, विपरीत प्रकृति से ऊपर उठकर, संस्कृतिसंपन्न बनें, दुर्बलों की, भूखों की आवश्यकता पहले पूरी करे, सब मिलकर खाए, इसके लिए शिक्षा की और उसके द्वारा उचित संस्कारों की आवश्यकता होती है.

संस्कार क्या है?
ऐसे संस्कार घर से मतलब परिवार से, शिक्षा व्यवस्था से और सामाजिक व्यवहार से, जैसे जाने-अंजाने होते रहते है, वैसे प्रयत्नपूर्वक किए जा सकते है. प्रश्‍न निर्माण होगा कि संस्कार मतलब क्या? उसकी परिभाषा आसान है. वह है - दोषापनयेन गुणाधानं संस्कार: - मतलब दोष हटाकर गुणों को ऊपर उठाना मतलब संस्कार. मनुष्य त्रिगुणों का बना है. सत्त्व, रजस् और तमस. यह तीन गुण सब प्राणिमात्र में है. किसी व्यक्ति को हम सत्त्वगुणी कहते है, इसका अर्थ ऐसा नहीं कि उसमें रजोगुण और तमोगुण नहीं होते. वे गुण होते ही है. लेकिन सत्त्वगुणों का प्रमाण बहुत अधिक होता है. रजोगुण और तमोगुण कम होते है. संस्कार, सत्त्वगुण को प्राधान्य अर्पण करते है इसलिए उनकी आवश्यकता है. संस्कारशब्द ही अच्छा करनाइस अर्थ का है. संस्कृत व्याकरणशास्त्र ही यह बताता है. अच्छा करना भाव नहीं होगा, तो उसी शब्द सम्+कृधातू से संकरबनेगा. भूषणभूत होनाअर्थ अभिप्रेत होगा, तो ही संस्कारशब्द सिद्ध होगा. मनुष्य ने अच्छा बनना मतलब क्या, व्यापक बनना, स्वयं को व्यापकता से जोड़ लेना. स्वार्थ से ऊपर उठना. जापान की तरह  'Me Last, Others First' मानना और उसके अनुसार व्यवहार करना. यह संस्कारका अर्थ है.

संस्कार की शिक्षा
हमारे बच्चें के लिए हम बाजार से चॉकलेट लाते है, तब पूरा पाकिट उसके हाथ में नहीं देते. एक चॉकलेट देते है और कहते है कि, एक भैय्या को दे, दूसरा दीदी को दे, और कोई होगा तो उसे दे; और फिर हम उसे खाने के लिए देते है. पहले औरो को दे और फिर हम खाए, यह संस्कार इस कृति और इस अभ्यास से हम देते है और अकेले न खाए, यह तत्त्व उसके मन पर अंकित करते है. श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान् श्रीकृष्ण ने अकेले खाने वालों की अत्यंत कठोर शब्दों में निंदा की है. वह वचन है भुञ्जते ते त्वघं पापा, ये पचन्त्यात्मकारणात् (अध्याय ३, श्‍लोक १३) जो केवल अपने लिए भोजन पकाते है, वे अन्न भक्षण नहीं करते पाप भक्षण करते है, ऐसा इस श्‍लोक का अर्थ है. परोपकाराय पुण्याय पापाय परपीडनम् ऐसा भी एक सुभाषित है. उसका अर्थ भी परोपकार पुण्यकारक होता है तो परपीडन पाप को कारणीभूत होता हैऐसा है. मातृवत् परदारेषु परद्रव्येषु लोष्ठवत्उक्ति तो हमारी संस्कृति का सार ही व्यक्त करती है. वह कहती है, परस्त्री को ओर माता समान देखें और परद्रव्य मिट्टी का ढेला माने. ऐसी शिक्षा घरों से पूरी परह मिटी तो नहीं, लेकिन बहुत ही क्षीण हुई है. पैसों की व्याप्ति बढ़ी है, लेकिन संस्कारों से आने वाली संस्कृति नहीं बढ़ी. इस कारण ऐशो-आराम, व्यसन की ओर प्रवृत्ति झुकने लगी है. विदर्भ में एक तहसील स्तर के महाविद्यालय के ५० प्रतिशत प्राध्यापक शराब के भक्त बने है ऐसा मुझे बताया गया. कारण ढूंढने पर ध्यान में आया कि, उन सब का वेतन मासिक ७० हजार रुपयों से अधिक है. पैसों का सदुपयोग कैसे करें, यह उनके मन पर किसी ने उचित संस्कारों से अंकित ही नहीं किया.

शिक्षा का परिणाम
मैं हिस्लॉप कॉलेज में प्राध्यापक था, उस समय, समयसारिणी (टाईम-टेबल) में सबके लिए बायबल का (स्क्रिप्चर) वर्ग आवश्यक होता था. आगे चलकर उसे नैतिक शिक्षाका विकल्प दिया गया. यह नैतिक शिक्षा का वर्ग लेने का काम मुझको सौपा गया था. इस कारण, कुछ अच्छी बातें निश्‍चित ही विद्यार्थींयों को सुनने मिलती थी. मैं एक शिक्षा संस्था का अध्यक्ष था उस समय, संस्था द्वारा चलाई जाने वाली माध्यमिक शाला में, सप्ताह में दो दिन, एक सेवानिवृत्त वयोवृद्ध प्राचार्य भगवद्गीता पर प्रवचन करेगे ऐसी हमने योजना की. उपस्थिति ऐच्छिक रखी और यह प्रवचन वर्ग शाला समाप्त होने के बाद रखा. कक्षा ८ और १० के विद्यार्थींयों को सूचना दी गई. सौ से अधिक विद्यार्थी उसमे उपस्थित रहते थे. अर्थात् यह ऑकड़ा कुल संख्या के २० प्रतिशत ही था. जिसका परीक्षा में मिलने वाले गुणों से कोई संबंध नहीं, जहॉं उपस्थिति अनिवार्य नहीं, ऐसी व्यवस्था का वे २० प्रतिशत विद्यार्थी लाभ ले रहे थे, इसका अर्थ यह कि उन पर कुछ संस्कार निश्‍चित ही हो रहे थे. जिसका आर्थिक अथवा व्यावहारिक कोई लाभ नहीं, ऐसे कार्य के लिए पौन घंटा देने की आदत उन्हें लगी. मेरे मतानुसार यह संस्कार है.
दिल्ली के रामकृष्ण गेास्वामी नाम के एक व्यक्ति अपराधनिवारण-चरित्रनिर्माणनाम से एक कार्य करते है. जेल में कैदियों को गीता सिखाते है. मैं उनके साथ दो बार तिहाड जेल, एक बार साबरमती जेल और एक बार नागपुर की जेल में गया हूँ. अब तिहाड में कैदी ही गीता सिखाते है. जेल के अधिकारियों का अनुभव बताता है कि, इस गीता वर्ग का कैदियों के आचरण पर अच्छा परिणाम हुआ है.

संपत्ति और संस्कृति
हमारे देश में सेक्युलॅरिझम् का विकृत अर्थ लगाया जाता है, इस कारण शालाओं में के ऐसे संस्कार-वर्ग सदा के लिए बंद हो चुके है. सरकार ने सेक्युलरका अर्थ धर्मनिरपेक्षऐसा न कर सेक्युलरमतलब सर्वपंथ समादरकिया, तो अनेक शिक्षा संस्थाएँ धर्म-शिक्षा कहे, या नीति-शिक्षा का संस्कारपद कार्य करने के लिए आगे आएगी. मैं तो इससे आगे बढ़कर कहूँगा कि, जो शिक्षा संस्थाएँ ऐसे वर्ग चलाएगी, उन्हें सरकार विशेष रूप से पुरस्कृत करे. शाला के बच्चें संस्कारक्षम आयु समूह के होते है. उनका जीवन उदात्त, उन्नत, व्यापक करने में, सक्षम विचार उनके सामने आए, तो मुझे लगता है कि, निश्‍चित ही उनके मन पर उसका अच्छा ही परिणाम होगा. कई दुष्ट सामाजिक रुढियॉं समाप्त होगी. असहिष्णुता और लोकोपयोगी कानून का अनादर करने की प्रवृत्ति क्षीण होगी. रास्ते पर का यातायात मैं नित्य देखता हूँ. लाल बत्ति लगने के बाद ७५ से ८० प्रतिशत तक वाहन-चालक अपने वाहन रोकते है. २०-२५ प्रतिशत उसकी परवाह किए बिना वाहन आगे ले जाते है. कानून तोडने वाले अशिक्षित नहीं होते. गरीब तो होते ही नहीं. लेकिन संपत्ति के साथ संस्कृति नहीं आती; उसके आने के लिए आवश्यक वातावरण, न घर में होता है, न शिक्षा संस्था में मिलता है. घर में बचपन से ही करीअरके पाठ पढ़ाए जाते है. उसका ही आग्रह होता है. लेकिन करीअरका सामाजिक प्रयोजन, कोई बताता ही नहीं. कम से कम, शिक्षा संस्थाएँ वह बताए. वाचन, श्रवण और दर्शन इन तीनों विधाओं के मन पर परिणाम होते ही है. इसलिए हम पढ़ने के लिए जो पुस्तकें लाते है. क्या वे केवल मनोरंजन के लिए होती है? टीव्ही पर के दृष्यों का भी हम जो साधक-बाधक विचार करते है, वह क्यों? हमारा जीवन संस्कृति-संपन्न हो इसलिए ही. संस्कृति-संपन्नता की ओर कदम बढ़ने लगे तो फिर विकृति का मार्ग अपने आप छूट जाएगा. व्यक्ति प्रकृति से भी ऊपर उठेगा और पशु एवं मानव के बीच का अंतर उसके नित्य के आचरण से प्रदर्शित होगा. कानून तो चाहिए ही, लेकिन वह पर्याप्त नहीं होता. उसे संस्कारों का साथ मिला तो कानून का भी आदर होगा. मैं तो यह कहने का भी धाडस करता हूँ कि, ऐसे संस्कृति-संपन्न व्यक्तियों के लिए कानून के धाक की भी आवश्यकता ही नहीं रहेगी. समाजमन पर परिणाम करने वाले जो-जो उपक्रम, आज चल रहे है, उन सबका इस दृष्टि से विचार करे और उस दृष्टि से उनका मूल्यांकन करें, ऐसा मुझे लगता है.

- मा. गो. वैद्य
(अनुवाद : विकास कुलकर्णी)
babujivaidya@gmail.com


Tuesday, 1 January 2013

अरब वसंतागम के विकट सूर



इस्लामी सियासी जगत् में जनतंत्र के लिए कोई स्थान नहीं. कुछ अपवाद हो सकते है; लेकिन नियम इस्लामी सत्ता और जनतांत्रिक व्यवस्था की दुश्मनी का है. अनेक राज्यों के नाम में जम्हुरियाशब्द का अंतर्भाव है. उसका अर्थ गणराज्य होता है. मतलब वहॉं राजशाही नहीं. गणों का मतलब लोगों का राज्य है. लेकिन प्रत्यक्ष में वह लोगों का नहीं होता. किसी न किसी तानाशाह का होता है. अरब राष्ट्रों में मिस्त्र सबसे प्राचीन और संख्या की दृष्टि से सबसे बड़ा है. (८ करोड़ से अधिक जनसंख्या) वहॉं होस्नी मुबारक इस तानाशाह ने तीस वर्ष से अधिक समय सत्ता भोगी. इसी प्रकार लिबिया में गडाफी का शासन भी अनेक दशक चला. इराक, सौदी अरेबिया, ट्युनेशिया, सीरिया आदि सब देशों में राजशाही चली; या तानाशाही.

क्रान्ति की लहरें
इस अरब जगत् में गत दो वर्षों से जनतंत्र की प्रस्थापना के लिए क्रांति हुई. वह शांति के मार्ग से होनी संभव ही नहीं थी. इस्लामका अर्थशांति है, लेकिन इस्लाम माननेवालों का वर्तन सामान्यत: इस अर्थ के विरुद्ध ही रहा है. हमारे देश में के इस्लामी राज का इतिहास यहीं बताता है. गझनी के महमद ने अपने भाई का खून कर राज हथियाया. अपने चाचा का खून कर अल्लाउद्दीन बादशाह बना. औरंगजेब ने तो पिता को ही कैद में डालकर और अपने तीन सगे भाईयों की हत्या कर सत्ता हथियायी. ऐसी ही हिंसात्मक और घमंडी तानाशाही के विरोध में अरब देशों में क्रांति की लहरें चाल रही है. पहले ट्युनेशिया, फिर मिस्त्र, और बाद में येमेन और अब सीरिया में परिवर्तन के लिए रक्तरंजित क्रांति चल रही है. क्रांति कहने के बाद, रक्तपात आता ही है. ट्युनेशिया इसे अपवाद सिद्ध हुआ होगा. मिस्त्र की राजधानी मतलब काहिरा के तहरिर चौक में हो रहे निदर्शन शांतिपूर्वक थे. लेकिन मुबारक के सरकार ने हिंसा का उपयोग किया; और आंदोलकों ने उसे प्रखर उत्तर देकर होस्नी मुबारक को सत्ता से उखाड फेका. येमेन का तानाशाह कर्नल अली अब्दुला सालेह, जान बचाने के लिए भाग गया, इसलिए वहॉं रक्तपात नहीं हुआ. सीरिया में अध्यक्ष बशर-अल आसद के विरुद्ध अत्यंत उग्र संघर्ष चल रहा है. राष्ट्र संघ के बिनति की ऐसी तैसी कर अभी भी हवाई जहाज से बम गिराए जा रहे है. समाचारपत्रों के अंदाज से, सीरिया के गृह यद्ध में अब तक चालीस हजार लोग मारे जा चुके है. लेकिन संघर्ष थमा नहीं.

यूरोपीय राष्ट्रों का हेतु
ऐसा दिखाई देता है कि, अमेरिका और यूरोप के अन्य देश - मुख्यत: इंग्लैंड और फ्रान्स ने तानाशाही सत्ता हटाने के लिए आंदोलकों को सक्रिय मदद दी. अपनी सेना तो वहॉं नहीं उतारी लेकिन मिस्त्र में आंदोलकों को हवाई सुरक्षा दी. सीरिया में भी विद्रोहियों को शस्त्रास्त्रों के साथ सब मदद दी जा रही है. सीरिया के संघर्ष में अध्यक्ष आसद को रूस की मदद थी. अब उसमें कटौती हुई है, ऐसा दिखता है. रूस सरकार के एक अधिकारी ने तो बशर-अल-आसाद के दिन जल्द ही समाप्त होगे और विद्रोही विजयी होगे, ऐसा कहा है.

विकट सूरों की आहट
किसी भी जनतंत्रवादी व्यक्ति और राष्ट्र को भी लगेगा कि, एक देश की तानाशाही खत्म हुई है और लोगों ने चुने, उनके प्रतिनिधि ही अब राजकर्ता बने है. अमेरिका जनतंत्रवादी है, इस बारे में कोई मतभेद नहीं. इस कारण, उसने अपनी शक्ति का उपयोग जनतंत्र की स्थापना और रक्षा के लिए करना स्वाभाविक माना जाएगा. लेकिन अब ऐसा ध्यान में आ रहा है कि, अमेरिका की आस्था जनतंत्र की प्रस्थापना में उतनी नहीं, जितनी अरब देशों की खनिज संपत्ति मतलब तेल में है. ऐसा तर्क भी किया जा सकता है कि, पुराने तानाशाहों के राज में, अमेरिका और अन्य यूरोपीय देशों को खनिज तेल के निरंतर और सुरक्षित पूर्ति के बारे में विश्‍वास नहीं होगा इसलिए उन्होंने तथाकथित जनतंत्र समर्थकों का पक्ष लिया.
अरब जगत् में यह जो परिवर्तन का युग शुरु हुआ था, उसे वसंतागम’ (अरब स्प्रिंग) यह मधुर नाम दिया गया था. लेकिन दुर्भाग्य से इस वसंतागम के बाद मधुर गुंजन के स्वर सुनाई नहीं दे रहे. फिर वहीं, जनतांत्रिक व्यवस्था का तिरस्कार करने वाले विकट, कर्कश स्वर निकल रहे हैं. जनतंत्रवादियों की अपेक्षा हिंसक अतिरेकी ही अमेरिका को करीब तो नहीं लगने लगे, ऐसा संदेह निर्माण हो सकता है. मैं यहॉं केवल मिस्त्र और सीरिया इन दो देशों में की घटनाओं की ही चर्चा करूंगा.

कट्टरवादियों का वर्चस्व
मिस्त्र अरब जगत् में सबसे बड़ा देश है. वहॉं जनतांत्रिक पद्धति से ही सरकार सत्ता में आई. लेकिन वह मुस्लिम ब्रदरहूड इस कट्टर इस्लामवादी संगठन पुरस्कृत सियासी पार्टी की है. वहॉं अध्यक्षीय पद्धति स्वीकारी गई, इस बारे में आक्षेप का कारण नहीं. चुनाव पद्धति से ही मोहमद मोर्सी राष्ट्राध्यक्ष बने. बीच के संक्रमण काल में, सत्ता के सूत्र फौज के हाथों में थे. वह अब धीरे-धीरे लोक-निर्वाचित अध्यक्ष मतलब मोर्सी के हाथों में आए. वैसे तो यह परिवर्तन प्रशंसनीय ही लगेगा. लेकिन लगता है कि, मोर्सी को जनतांत्रिक व्यवस्था के प्राथमिक तत्त्वों का भी भान नहीं होगा. उन्होंने फतवा निकाला कि, उनके किसी निर्णय या कृति पर न्यायपालिका विश्लेषण नहीं कर सकेगी. इस फतवे के विरोध में न्यायपालिका ने हड़ताल की. इतना ही नहीं, न्यायपालिका के अधिकारियों के समर्थन में, मिस्त्र का मुस्लिम ब्रदरहूड यह एकमात्र संगठन छोड़कर, संपूर्ण जनता उतर पड़ी. इस आंदोलन के दबाव में मोर्सी ने फतवा तो पीछे लिया लेकिन ऐसी जनतंत्र विरोधी कृति को ताकत देने के लिए, जल्दबाजी में २२ नवंबर २०१२ को एक संविधान घोषित किया. उसमें अध्यक्ष की कृति न्यायालय के विचाराधीन नहीं होगी, ऐसी धारा है. इस संविधान को जनता की मान्यता है, यह दर्शाने के लिए जल्दबाजी में ही जनमत-संग्रह (रेफरेण्डम) कराने की भी घोषणा की. मोर्सी की यह चालाकी जनता के ध्यान में आई और उसने पुन: तहरिर चौक में निदर्शन किए. उनकी भूमिका है कि, २०११ में जनता ने आंदोलन कर, मुबारक की जो तानाशाही दूर की, उसकी जगह नई रचना में एक पार्टी का मतलब कट्टरतावादी मुस्लिम ब्रदरहूड का अनियंत्रित राज लाया जा रहा है.

नए भोग
पहले तो मिस्त्र की जनता ने इस जनमत-संग्रह का बहिष्कार करने का निर्णय लिया था. लेकिन बाद में उसने अपना यह विचार बदला; और मतदान में भाग लिया. लेकिन जनता को सरकार पुरस्कृत संविधान के भयावह परिणामों के बारे में उद्बोधन करने के लिए पर्याप्त समय ही नहीं मिला. वह समय मिलना ही नहीं चाहिए इसलिए ही यह जल्दबाजी की गई थी. अब जनमत-संग्रह के परिणाम घोषित हुए है. इस संविधान के पक्ष में ६२ प्रतिशत और विरोध में केवल ३७ प्रतिशत मत पड़े. यहॉं यह ध्यान में रखे कि, होस्नी मुबारक को हटाने के आंदोलन में, मुस्लिम ब्रदरहूड आंदोलन के पक्ष में था. लेकिन इस आंदोलन में वे आगे नहीं थे. जो लोग आगे थे, उन्हें यह पार्टी की तानाशाही मान्य नहीं. प्रश्‍न यह है कि, मुबारक को हटाकर मिस्त्र की जनता ने क्या हासिल किया? व्यक्ति की तानाशाही गई लेकिन एक संगठन की तानाशाही उनके नसीब आई. पार्टी की तानाशाही कैसी अत्याचारी, जनतंत्र-विरोधी, मानवी मूल्यों को पैरों तले रौंधने वाली होती है, यह हम रूस के ७० वर्षों के शासन से जान सकते है. क्या मिस्त्र में फिर क्रांति होगी? पता नहीं! क्या इस नए आंदोलन को अमेरिका आदि जनतंत्रवादी पश्‍चिम के देशों की सहानुभूति और मदद मिलेगी? इस प्रश्‍न का उत्तर वहॉं की नई सत्ता अमेरिका को खनिज तेल के संदर्भ में क्या देती है इस पर निर्भर होगा. आज तो मिस्त्र की जनता को उनके नसीब आई तानाशाही प्रवृत्ति, कट्टरता, धर्मांधता के बाधित भोग भोगने है.

हिंसाचारी उग्रवादियों की पहल
सीरिया में का पेच अधिक गंभीर है. बशर-अल-आसद तानाशाह है, इसमें विवाद नहीं. लेकिन उन्हें हटाने के लिए आंदोलन करने वाले, जिन्हें अमेरिका आदि राष्ट्रों की भरपूर मदद है, वे कौन है? आपको यह जानकर आश्‍चर्य होगा कि वे अल-कायदा इस हिंसाचारी उग्रवादी संगठन से प्रेरित है. नूसरा फ्रंटयह इस उग्रवादी अल-कायदा का ही एक धडा है. इस नूसरा फ्रंट को इराक के अल-कायदा से धन और हथियार मिलते है. आसद के अधिकार में के सुरक्षा की दृष्टि से महत्त्व के स्थान काबीज करने में यह फ्रंट सक्रिय है. सुरक्षा की दृष्टि से महत्त्व के, बागियों के अधिकार में के ऐसे सब स्थानों पर इस फ्रंट का कब्जा है. इराक के अल-कायदा के प्रतिनिधि कहते है कि, ‘‘ हमारे मित्रों को मदद करने का यह हमारा सामान्य मार्ग है.’’ रूस के समान ही अमेरिका भी समझ चुकी है कि, आसद के दिन अब लद गए है. उन्हें चिंता है कि, आसद जाने के बाद नूसरा फ्रंट वाले सत्ताधारी बने, तो हमारा क्या होगा? मिस्त्र के आंदोलकों को अमेरिका आदि राष्ट्रों ने जो मदद की, उसकी तुलना में बहुत ज्यादा मदद सीरिया में के बागियों को अमेरिका ने दी है.    

अमेरिका सर्तक
ऐसा लगता है कि, अमेरिका इस बारे में सतर्क हुई होगी. ७ दिसंबर को, बागी सेनाधिकारियों की तुर्कस्थान में एक बैठक हुई. उसका उद्देश्य सेनाधिकारियों की एक संयुक्त रचना करना था. यह बैठक अमेरिका की पहल पर ही आयोजित की गई थी. इस बैठक के लिए नूसरा फ्रंटया अन्य किसी उग्रवादी समूहों को निमंत्रण नहीं था. नूसरा फ्रंट के संदर्भ में अमेरिका की भूमिका समझी जा सकती है. इराक में अमेरिका ने फौज का उपयोग कर सद्दाम हुसेन को मिटा दिया. उन्हें अनुकूल ताकतों की सरकार स्थापन की. लेकिन इराक के अल-कायदा को यह पसंद नहीं. अल-कायदा कट्टर सुन्नी पंथीय है. उन्होंने इराक में अनेक अमेरिकी सैनिकों और अधिकारियों की हत्या की है. इस अल-कायदा ने ही नूसरा फ्रंट तैयार किया है, और उसे पैसा, हथियार और लड़ने के लिए सैनिक भी मुहया कराता है. अमेरिका एक विचित्र संकट में फंसा है. नूसरा फ्रंट पर बहिष्कार डालता है, तो वह आसद के विरोध में जो कड़ा संघर्ष कर रहे है, उन पर ही बहिष्कार डालने के समान है. आसद के विरुद्ध की लड़ाई में शामिल लोग कहते है कि, हमें अमेरिका हथियार नहीं देता और जो हथियारों की मदद देते है, उन्हें दहशतवादी कहकर अमेरिका बहिष्कृत करती है!

यहॉं भी उग्रवादी
नूसरा फ्रंट अमेरिका की दोहरी नीति समझ चुका है. उसने स्पष्ट भूमिका ली है कि, हमें अमेरिका की मदद नहीं चाहिए. नूसरा फ्रंट केवल अमेरिका विरोधी ही नहीं, उसे तो इस्लामी पद्धति की सत्ता अभिप्रेत है. आसद विरोधी संघर्ष में सक्रिय अनेकों ने इस्लामी पोशाख और व्यवहार अपनाया है. इस कारण इराक, इरान आदि देशों के कट्टरवादियों से उन्हें सब मदद मिल रही है. अमेरिका भी यह समझ चुकी है. उसने आसद विरोधी बागियों को मान्यता दी, यह सच है लेकिन उसी समय नूसरा फ्रंट को ब्लॅक लिस्ट में डाला है. अमेरिका के राष्ट्राध्यक्ष बराक ओबामा ने एक साक्षात्कार में कहा कि, आसद विरोधी संघर्ष में उतरे सब लोग हमें अनुकूल नहीं है. उनमें से कुछ ने अमेरिका के विरोध की भूमिका और कार्यक्रम शुरु किया है. आसद विरोधी संघर्ष का नेतृत्व करने वाले संगठन का नाम नॅशनल कोऍलिशन ऑफ सीरियन रिव्होल्युशनरी फोर्सेसहै. म उसका अनुवाद क्रांतिकारी सेना का राष्ट्रीय मोर्चा ऐसा कर सकते है. उसे मतलब उनकी ही सरकार को हम मान्यता देंगे, ऐसा भी ओबामा ने सूचित किया है. लेकिन इतने से ही अमेरिका का संपूर्ण हेतु साध्य होगा, इसकी कोई गारंटी नहीं. सीरिया के अध्यक्ष बहुसंख्यक सुन्नीय पंथ के नहीं है. सीरिया में सुन्नी ७४ प्रतिशत है. आसद शिया संप्रदाय के एक उपपंथ से आते है. यह संघर्ष अंत तक लड़ने का उनका निर्धार है. उन्होंने हवाई सेना का उपयोग करने का भी निर्णय लिया है. फिर भी, उनका अस्त समीप है. लेकिन प्रश्‍न यह है कि, इसमें अमेरिका ने क्या साध्य किया? मिस्त्र के वसंतागम में मुस्लिम ब्रदरहूड के विकट स्वर उमड़े. सीरिया में के वसंतागम में नूसरा फ्रंट या अल-कायदा कहे, के उससे भी कर्कश स्वर उमड़ने की संभावना है. क्या इसे वसंतागम कहे? क्या एक प्रकार की तानाशाही सत्ता हटाकर उसके स्थान पर धर्मांध प्रतिगामी अनियंत्रित कारोबार (ऑटोक्रॅसी) की स्थापना के लिए अमेरिका ने यह उठापटक की?

- मा. गो. वैद्य
 (अनुवाद : विकास कुलकर्णी ) 
 babujivaidya@gmail.com