Thursday, 10 November 2011

टीम अण्णा, कॉंग्रेस और संघ

अण्णा हजारे के आंदोलन से सामान्य जनमानस प्रभावित हुआ है, उसी समय उनके टीम में की दुर्बलता प्रकट होने लगी है| इस दुर्बलता का, उनके आंदोलन पर बहुत विपरित परिणाम होगा, ऐसा मुझे नहीं लगता| लेकिन, इससे अण्णा के विरोधकों को, उनके उपर आघात करने के लिए एक शस्त्र मिल गया, यह मान्य करना ही पड़ेगा|

उपोषण पर्व

पहले सब ने यह बात ध्यान में लेनी चाहिए कि, टीम अण्णा अनेक वर्ष संगठित काम करने के बाद नहीं बनी है| अण्णा के विरोधक यह ध्यान में नहीं लेंगे; कारण उनका उद्दिष्ट येन केन प्रकारेण, अण्णा को बदनाम करना ही है| इन विरोधकों में कॉंग्रेस और उनके नीतिनिर्धारक अग्रणी है| बाबा रामदेव के आंदोलन के समान ही, अण्णा का आंदोलन उन्हें कुचलना था| लेकिन वह संभव नहीं हुआ| कॉंग्रेस सरकार ने, उन्हें कानून तोडने के लिए पकड़ा और जेल में भी भेजा| लेकिन सरकार की ही फजिहत हुई; अण्णा को एक दिन के भीतर ही मुक्त करना पड़ा| फिर अण्णा का अनिश्‍चितकालीन अनशन आरंभ हुआ| उसकी व्यापकता से सरकारी की आँखों चौंधियॉं गई| सरकार ने अण्णा को पकड़ा तो सही, लेकिन इसके परिणाम में सरकार ही मुश्किल में फँस गई| अंत में उसमें समझौते का रास्ता निकला और वह अनशन समाप्त हुआ|

बदले की मानसिकता

लेकिन इसका अर्थ सरकार अपनी फजिहत भूली ऐसा करना गलत होगा| सरकार भूली नहीं| अण्णा और उनकी टीम यह ध्यान में रखे कि, सरकार बदला लेने की ताक में है; तत्पर है| उनके पाले हुए हरदम भौंकनेवाले लोग तो मौका खोजते रहेंगे| मौका नहीं मिला तो कृत्रिम रीति से तैयार करेंगे| लेकिन अण्णा ने उनके टीकास्त्रों से डगमगाने का कारण नहीं|
अण्णा की टीम के बारे में विचार करते समय हमने यह ध्यान में रखना चाहिए कि, ये लोग विविन्न क्षेत्रों में कार्यरत है| वे प्रामाणिक है| लेकिन, अनेक प्रश्‍नों के बारे में उनके मत भिन्न हो सकते है| अण्णा के आंदोलन का मुख्य लक्ष्य जनलोकपाल बिल संसद से पारित करा लेना है| उनका एक निश्‍चित उद्देश्य है| वह है, सरकारी काम में का भ्रष्टाचार रोकना और भ्रष्टाचारप्रवण व्यक्तियों के मन में दंड का धाक निर्माण करना| सरकार भ्रष्टाचार में लिप्त है, इस बारे में दो मत नहीं| विधायिकाओं के सदस्य भी भ्रष्टाचारलिप्त है| जिनकी खरीद-बिक्री हो सकती है, ऐसा बिकाऊ माल उनमें भी है| इसी बिकाऊ माल के कारण २००८ को विश्‍वासमत प्रस्ताव के संकट में मनमोहन सिंह की सरकार टिक सकी| इस सरकार में शर्म की संवेदना का अंश भी बचा होता तो, उसने, सांसदों को भ्रष्ट करने के बदले पदत्याग किया होता| न्यायपालिका भी इस बिमारी से मुक्त नहीं| कर्नाटक में के दो लोकायुक्तों के मामले ताजे है| सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश भी आरोपों के किचड़ से मुक्त नहीं| इन सब पर धाक रहे, कार्यपालिका, विधिपालिका और न्यायपालिका ये जनतांत्रिक राज्यप्रणाली के जो तीन स्तंभ है, वे यथासंभव निर्दोष रहने चाहिए, इसके लिए जनलोकपाल बिल की योजना की जा रही है, संसद यह बिल मंजूर करे, यह अण्णा के आंदोलन का प्रयास है| इस कारण, इस आंदोलन को राजनीतिक आयाम है ही|

उद्देश्य राजनीतिक

गत सात वर्षों से कॉंग्रेस के नेतृत्व में संयुक्त प्रगतिशील मोर्चा की सरकार राज कर रही है| उनके कार्यकाल में ही विधिपालिका और कार्यपालिका से भ्रष्टाचार के गंभीर अपराध हुए है| स्वाभाविक ही, अण्णा का आघात लक्ष्य कॉंग्रेस पार्टी और उसकी सरकार ही होगी| भाजपा, केन्द्र की सत्ता में होती और उसके कार्यकाल में भ्रष्टाचार के ऐसे गंभीर प्रकार होते तो, अण्णा के आंदोलन के निशाने पर भाजपा होती| आज कॉंग्रेस पार्टी उनके निशाने पर होना स्वाभाविक है| कारण, कॉंग्रेस के नेतृत्व में के गटबंधन का संसद में बहुमत है|
इस कारण, राजस्थान के मरुस्थल में जलसंवर्धन का काम करनेवाले राजेन्द्रसिंह या वनवासी क्षेत्र में अच्छा काम करनेवाले राजगोपाल ने राजनीति का कारण बताकर अण्णा टीम से बाहर निकलने में कोई मतलब नहीं| वैसे देखा जाय तो ‘भ्रष्टाचार का विरोध’ यह नकारात्मक कार्य है| स्वच्छ, पारदर्शक समाजजीवन की निर्मिती यह भावात्मक लक्ष्य है| टीम अण्णा का यही अंतिम लक्ष्य है, फिर भी सरकारी यंत्रणा में का भ्रष्टाचार निमूर्लन यह उनके आंदोलन का तात्कालिक लक्ष्य है; और यह लक्ष्य प्राप्त होने के मार्ग में सबसे बड़ी रुकावट कॉंग्रेस पार्टी की ही है| राजेन्द्रसिंह और राजगोपाल जैसे जानकारों के ध्यान में यह बात नहीं आती, यह आश्‍चर्यजनक है| अपने निवेदन में राजगोपाल ने एक सत्य कथन किया है कि, ‘‘(अण्णा की) यह टीम कभी भी एकदूसरे के साथ सुसंगतता नहीं रखती थी| इस समूह को ‘टीम’ कहना भी सही नहीं था| वे विविध क्षेत्रों में काम करनेवाले लोग है|’’ राजगोपाल का यह विश्‍लेषण बिल्कुल सही है| लेकिन उन्हें यह समझना चाहिए था कि, अण्णा के आंदोलन का उद्देश्य राजनीतिक है| इस कारण टीम अण्णा ने हिस्सार के चुनाव में कॉंग्रेस को मत नहीं दे, ऐसा बताने में कुछ भी अनुचित नहीं था| टीम अण्णा ने किसी पार्टी या व्यक्ति को मत देने के लिए नहीं कहा था| कॉंग्रेस को हराओ, यही बताया और हरियाणा की जनता ने वह माना| कॉंग्रेस के उम्मीदवार की अनामत भी जप्त हुई|

प्रेरक शक्ति

टीम अण्णा के एक मुख्य सदस्य प्रशांत भूषण भी विवाद में फँसे| उन्होंने काश्मीर के बारे में मत व्यक्त किया| वह टीम अण्णा का मत कैसे हो सकता है? काश्मीर की समस्या पर हल ढूढंने के लिए अण्णा का आंदोलन नहीं था| हॉं, प्रशांत भूषण के विरुद्ध लोगों का रोष हो सकता है| लेकिन उनके समान ही मत रखनेवाले अन्य भी तथाकथित विद्वान हमारे देश में है| उनपर ऐसा जनरोष क्यों नहीं बरसा? प्रशांत भूषण पर ही क्यों? कारण, टीम अण्णा के अग्रगामी सदस्यता के कारण, प्रशांत भूषण लोगों के सम्मान और आदर के भाजन बने थे| उनकी वह नैतिक ऊँचाई कम करने के लिए, अत्यंत निषेधार्ह मार्ग का अवलंब कुछ अविचारी लोगों ने किया| कोई भी समंजस देशहितैषी व्यक्ति इस मार्ग की घोर निंदा ही करेगा| लेकिन अनजाने ही सही प्रशांत भूषण ने अण्णा के विरोधकों के हाथों में शस्त्र दे दिया है| फिर टीम अण्णा के दूसरे महत्त्वपूर्ण सदस्य अरविंद केजरीवाल पर भी चप्पल फेंकी गई| जिसने चप्पल फेंकी उसे पकड़ा गया| लेकिन वह अपने कृत्य समर्थन नहीं कर सका| ‘‘केजरीवाल, आंदोलन को गलत दिशा में ले जा रहे है, उन्होंने संसद का शीतकालीन अधिवेशन होने तक रुकना चाहिए था’’, ऐसा उसने कहा, ऐसा प्रसिद्ध हुआ है| लेकिन या सब रटीरटाई पोपटपंची लगती है| मेरा संदेह है कि, प्रशांत भूषण या केजरीवाल पर हुए हमले के पीछे प्रेरक शक्ति कोई दुसरी ही होनी चाहिए|

किरण बेदी का मामला

प्रशांत भूषण और केजरीवाल के बाद अब किरण बेदी का नंबर लगा है| उन्होंने सामान्य श्रेणी में हवाई यात्रा की| शौर्यपदक विजेता होने के कारण उन्हें हवाई जहाज के सामान्य श्रेणी के टिकट के किराए में ७५ प्रतिशत छूट मिलती है| लेकिन जिन संस्थाओं ने उन्हें कार्यक्रम-भाषण के लिए निमंत्रित किया था, उनकी ओर से उन्होंने पूरा किराया लिया, ऐसा इस शिकायत का आशय है| श्रीमती बेदी ने भी यह मान्य किया है| उनका स्पष्टीकरण है कि, उन्होंने इस बचाई हुई राशि का उपयोग स्वयं के लिए नहीं किया; उनकी जो गैरसरकारी सेवा संस्था (एनजीओ) है, उसके लिए किया| लेकिन बचाव का यह युक्तिवाद खोखला है| अपनी सेवा संस्थाओं के लिए पैसे मिलाने के अनेक रास्ते उपलब्ध होते है| इसके लिए झूठ का सहारा लेने की आवश्यकता नहीं| दूसरा ऐेसा भी कह सकता है कि, मैंने घूस ली, लेकिन अपने लिए नहीं, मेरी पार्टी के लिए ली| लेकिन उसका यह स्पष्टीकरण समर्थनीय सिद्ध नहीं होता| एक राजनीतिक पार्टी के अध्यक्ष ने, एक ‘स्टिंग ऑपरेशन’में मोटी राशि स्वीकारी थी| उनका भी स्पष्टीकरण यही था कि, मैंने वह पैसे अपने लिए नहीं लिये थे; मेरी पार्टी के लिए लिये थे| लेकिन यह स्पष्टीकरण चल नहीं पाया| उन्हें अपने पद से त्यागपत्र देना पड़ा| श्रीमती बेदी ने इस प्रकार बचाई राशि बहुत बड़ी नहीं होगी| दो-तीन लाख से कम ही होगी| वह राशि लौटाकर उन्होंने यह धब्बा मिटा देना योग्य होगा|

आरएसएस

अण्णा और उनकी टीम को बदनाम करने का अभियान बिल्कुल प्रारंभ से चल रहा है| जंतरमंतर मैदान पर हुए उनके अनशन मंडप में भारत माता का फोटो लगाया गया था| उसपर आक्षेप लिया गया कि, यह रा. स्व. संघ (आरएसएस) का प्रतीक है; इसलिए अण्णा का आंदोलन संघ प्रेरित है| इस आक्षेप के कारण अण्णा अकारण नरम पड़े| उन्होंने भारत माता का फोटो वहॉं से हटा दिया| कॉंग्रेस की ओर से भौंकनेवालों के ध्यान में आया कि, यह अण्णा की नाजुक रग है| फिर संघ को लेकर अण्णा पर हमले शुरू हुए| कॉंग्रेस पार्टी के महासचिव दिग्विजय सिंह ने अंदाधुंद तोफ डागना शुरू किया| अण्णा आरएसएस के मुखौटा है, आरएसएस के राष्ट्रपतिपद के उम्मीदवार है इत्यादि| संघ को किसी भी आंदोलन के साथ जोड़ने से अल्पसंख्यकों का एक बड़ा गुट उससे दूर हो जाता है यह सब को पता है| इसलिए संघ को घसीटने का काम चलते रहता है| ‘भारत माता की जय’ या ‘वंदे मातरम्’ यह संपूर्ण राष्ट्र का भावविश्‍व के प्रकट करनेवाले नारे है| उन्हें केवल संघ के साथ जोडना, यह संघ का गौरव ही है| लेकिन उन भारतव्यापी नारों को किसी एक संगठन के साथ जोडना या उसपर आक्षेप लेना, यह राष्ट्रद्रोह है, यह इन लोगों के ध्यान में नहीं आता, यह खेद की और चिंता की बात है| किसी इमाम ने फिर फतवा निकाला कि, ‘भारत माता की जय’ और ‘वंदे मातरम्’ के नारे लगाना इस्लामविरोधी है, इसलिए मुसलमान अण्णा के आंदोलन में शामिल ना हो| यह फतवा मुस्लिम बंधुओं ने नहीं माना, यह बात अलग है| लेकिन क्या उस पर कॉंग्रेस या बडबोले दिग्विजय सिंह की कोई प्रतिक्रिया आई?  नाम ना ले| कारण यह मुसलमानों को अण्णा के आंदोलन से दूर करने के उनके उद्दिष्ट के अनुकूल था|

संघ की रीत

आगे और एक मजेदार बात हुई| ६ अक्टूबर को विजयादशमी के उत्सव में भाषण करते समय सरसंघचालक मोहन जी भागवत ने भ्रष्टाचार का भी मुद्दा चर्चा में लिया| उन्होंने इतना ही कहा कि, संघ के स्वयंसेवक भ्रष्टाचारविरोधी आंदोलन में निरपेक्ष बुद्धि से, किसी भी श्रेय की अपेक्षा ना करते हुए, स्वभावानुकूल शामिल हुए| मोहन जी के भाषण में की तीन विशेषताएँ बारीकी से ध्यान में लेनी चाहिए| ‘निरपेक्ष बुद्धि से’ यह पहली विशेषता| संघ को इस आंदोलन से अपने लिए क्या हासिल करना था? और व्यतिरेक पद्धति से विचार करे तो ऐसा भी सोचा जा सकता है कि, संघ के स्वयंसेवक इस आंदोलन में सक्रिय भाग नहीं लेते तो संघ का का क्या बिगडता? दूसरी विशेषता यह कि, ‘श्रेय की अपेक्षा ना करते हुए|’ संघ ने कभी आभार की भी अपेक्षा नहीं रखी| वह अपने काम के ढोल भी नहीं बजाता| इसलिए संघ विरोधक, यह गुप्त संगठन है, ऐसी गलतफहमी पालकर उसे फैलाते रहते है| कितने लोगों को पता है कि, संघ में ‘प्रचार विभाग’ सन् १९९४ को आरंभ हुआ| मतलब संघ की स्थापना के करीब ६९ वर्ष बाद! संघ को प्रसिद्धि की हाव तो छोड दे, लेकिन इच्छा भी नहीं होती; और तिसरी विशेषता है ‘स्वभावानुकूल’, कुछ दिनों पूर्व सिक्कीम में भूकंप हुआ| सहायता के लिए संघ के स्वयंसेवक दौडकर गए| क्या संघ ने इसके ढोल पिटें? उनकी हाफ पँट से लोगों को पता चला कि वे संघ के स्वयंसेवक है| संकट के समय सहायता के दौडकर जाना, यह स्वयंसेवकों की स्वाभाविक कार्यरीति है; और वहीं मोहन जी ने विजयादशमी के भाषण में अधोरेखित की|

अण्णा की प्रतिक्रिया

बस, फिर क्या था; दिग्विजय सिंह जैसे वाचाल अण्णा विरोधकों को लगा कि, अण्णा पर वार करने के लिए एक धारदार शस्त्र उनके हाथ लगा है| उन्होंने किए आघातों का मुझे आश्‍चर्य नहीं हुआ| लेकिन अण्णा की प्रतिक्रिया का अप्रत्याक्षित थी| उन्हें इसमें साजिश की बू आई| संघ यह साजिश क्यों करेगा? अण्णा या बाबा रामदेव का अनशन पर्व शुरू होने के कम से कम एक माह पूर्व हुई संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा ने एक प्रस्ताव पारित कर भ्रष्टाचारविरोधी आंदोलन में शामिल होने के लिए स्वयंसेवकों से आवाहन किया था| उन्हें हाथ में फलक लेकर या गणवेश पहनकर जाने के लिए नहीं कहा था| दिल्ली के दो-तीन कार्यकर्ताओं ने मुझे बताया कि, रामलीला मैदान पर रोज पच्चीस-तीस हजार लोगों की जो भीड होती थी, उसे सम्हालने और अन्य गैरप्रकार रोकने में, संघ के स्वयंसेवकों ने सहायता की|
लेकिन अण्णा विरोधकों के ध्यान में आया कि, संघ यह अण्णा की नाजुक रग है; उसे दबाते ही अण्णा चिडते है| इसी घुस्से में उन्होंने, दिग्विजय सिंह को पागलखाने में भरती करो, ऐसा कहा होगा| संघ का यथार्थ आकलन ना होना यह भी एक कारण हो सकता है| इसलिए ‘साजिश’ जैसा हास्यास्पद आरोप वे कर सके| अण्णा सहज ही ऐसा भी कह सकते थे कि, १२० करोड भारतीयों के लिए मेरा आंदोलन है; इन १२० करोड में संघ के स्वयंसेवक भी शामिल है; वे आंदोलन में शामिल हो सकते है; ऐसा वक्तव्य उनकी व्यापक प्रगल्भता को शोभा देता| लेकिन ऐसा नहीं होना था| अंत में एक बताऊँ - जंतरमंतर पर के उपोषण के संदर्भ में नागपुर में जो आमसभा हुई थी, उसमें मेरा भाषण हुआ; और उस समय मेरे सिर पर संघ की काली टोपी थी| कारण मैं यह काली टोपी पहनकर ही घूमता हूँ और रामलीला मैदान पर हुए आंदोलन के समय, नागपुर में जिन्होंने सब कार्यक्रमों का आयोजन किया, उनमें के प्रमुख कार्यकर्ता संघ के स्वयंसेवक ही है| अण्णा हजारे यह समझ लेंगे तो दिग्विजय सिंह जैसों के बेताल वक्तव्यों की उपेक्षा कर उसे कचरे की टोकरी दिखाएँगे| अण्णा, आप विश्‍वास रखें| सारा भारत आपके समर्थन में खड़ा है और भारत में हमारे जैसे संघ के स्वयंसेवकों का अंतर्भाव भी है ही!

- मा. गो. वैद्य, नागपुर
e-mail: babujivaidya@gmail.com
(अनुवाद : विकास कुलकर्णी)

इतस्तत:

कराची की दुर्दशा

कारची पाकिस्तान में का सबसे बड़ा शहर है| जनसंख्या है करीब दो करोड| बहुत थोडे लोग जानते होगे कि, १९३५ तक सिंध प्रांत, उस समय के मुंबई क्षेत्र का हिस्सा था| फिर वह अलग प्रांत बना और १५ अगस्त १९४७ से पाकिस्तान में समाविष्ट हुआ| कराची, सिंध प्रांत में है; उसकी राजधानी है|
विभाजन के उस कालखंड में, लाखों हिंदुओं को निर्वासित होकर भारत में आसरा लेना पड़ा| इसी प्रकार, पंजाब में के कुछ मुसलमान भी पाकिस्तान में गए| उनमें से अधिकांश सिंध और मुख्यत: कराची में बसे| उन्हें ‘मुहाजिर’ कहते है| ‘मुहाजिर’ का अर्थ विस्थापित ही है| वहॉं उनकी संख्या बहुत अधिक है| उनकी एक राजनीतिक पार्टी भी है| उसका नाम है ‘कौमी मुहाजिर मुव्हमेंट’| ये पंजाबी मुहाजिर वहॉं पहुँचने के बाद, मूल के सिंधी और इन मुहाजिरो के बीच संघर्ष हुए| अर्थात्, मुसलमानों में संघर्ष! मतलब रक्तरंजित संघर्ष, यह अलग से कहने की आवश्यकता नहीं| विभाजन की घटना को आज ६४ वर्ष बीत चुके है, लेकिन इन मुहाजिरों की मुहाजिरत खत्म नहीं हुई| भारत में आए सिंधी और पंजाबी निर्वासित यहॉं समग्र समाजजीवन में पूरी तरह से घुल-मिल गए, लेकिन इन मुहाजिरों का वैसा नहीं हुआ| इस्लामी मनोवृत्ति और हिंदू मनोवृत्ति में का यह अंतर है|
अब, अफगानिस्तान में के पठान भी निर्वासित बनकर कराची पहुँचे है| इस कारण सिंधी वीरुद्ध मुहाजिर के समान, सिंधी विरुद्ध पठान और मुहाजिर विरुद्ध पठान ऐसे संघर्ष शुरू हुए है| कारची में प्राय: रोज ही दंगा होता है| २० जुलाई २०११ के ‘नवा ए वक्त’ दैनिक में एक रिपोर्ट प्रकाशित हुआ है| उस लेख के शीर्षक का अर्थ है ‘कराची दुनिया का सबसे बड़ा अनाथालय’| उसी दिन के ‘डॉन’ इस अंग्रेजी समाचारपत्र के समाचार का शीर्षक था ‘कारची भड़का है| २४ घंटे में ३४ मरे|’  ‘डॉन’ के समाचार के अनुसार ‘जनवरी से ३१ जुलाई इन सात माह की कालावधि में कराची में ८०० लोगों को मौत के घाट उतारा गया है|’ १५ जुलाई के ‘नवा ए वक्त’ दैनिक के संपादकीय पृष्ठ पर मोहम्मद अहमद तराजी का लेख प्रकाशित हुआ है| लेख का शीर्षक है ‘कफन की दुकान पर भीड|’
कराची में रास्ते पर चलते समय, कौन, कहॉं से आनेवाली गोली की बलि चढ़ेगा, कहा नहीं जा सकता| यह रोज की ही बात हो गई है| पुलीस के मन में रहा तो वह आती है, अन्यथा स्वस्थ बैठे रहती है| कोई मजदूर घर से निकलर काम पर जाएगा तो वह सकुशल घर लौटेगा इसकी गारंटी नहीं| ५ से ८ जुलाई इन चार दिनों में, कराची में भाषिक दंगे हुए| इसमें ८५ लोगों ने प्राण गवाएँ| किसने मारा, क्यों मारा, इसके बारे में अब लोग पूछँते भी नहीं है| कराची में मृत्यु यह अब समाचार का विषय ही नहीं रहा| बाजार खुले रहते है लेकिन, ग्राहकों का स्वागत बंदूक की गोली से नहीं होगा, इसकी गारंटी नहीं| गोली कहॉं से आई, किसने चलाई, सब अज्ञात रहता है| ‘जसारत’ यह ‘जमाते इस्लामी’ इस कट्टरवादी संगठन का मुखपत्र है| उसके संपादकीय का शीर्षक है ‘कराची : बारूद के ढेर पर|’ २३ जुलाई के अंक में यह समाचारपत्र लिखता है, ‘‘राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था का इंजन माना जानेवाला यह शहर दहशत के पिंजरे में फंस गया है| अभी जुलाई महिना समाप्त नहीं हुआ है, फिर भी ३४० लोग मारे जा चुके है|’’ ४ अगस्त के अंक में यही समाचारपत्र लिखता है, ‘‘अभी अगस्त का पहला सप्ताह भी समाप्त नहीं हुआ, और ३८ लाशें उठाई जा चुकी है| सरकार हताश है| फौज दूसरी ही तरफ लगी है और कराची में लगातार आग धधक रही है|’’

(२१ अगस्त २०११ के ‘पाञ्चजन्य’ में प्रकाशित श्री मुजफ्फर हुसैन के लेख पर आधारित)


डोंबिवली, महाराष्ट्र में कल्याण के समीप का शहर| शायद कल्याण-डोंबिवली मिलकर एक महानगर बनता होगा| और नागालँड? भारत के पूर्व छोर पर| लेकिन डोंबिवली ने नागालँड के साथ संबंध जोड़े है| वहॉं नागालँड में के विद्यार्थींयों के लिए एक छात्रावास है| गत १० वर्षों से वह चल रहा है| कौन चलाता होगा यह छात्रावास? और किनपर विश्‍वास कर नागालँड में के पालक अपने बच्चों को इतने दूर भेजते होंगे? इन प्रश्‍नों का एक ही उत्तर मिलेगा, वे संघ के स्वयंसेवक होंगे और वह सही है|
इस वर्ष की शालांत परीक्षा में इस छात्रावास के १७ विद्यार्थी उत्तीर्ण हुए| उन सब का अगस्त माह में सत्कार किया गया| लोकप्रिय संगीतकार सलिल कुलकर्णी के हाथों यह सत्कार संपन्न हुआ| सर्वाधिक गुण इनातो इस विद्यार्थी ने प्राप्त किए| उसे ८५ प्रतिशत गुण मिले| विद्यार्थींयों की ओर से आभार व्यक्त करते हुए उसने कहा, ‘‘छात्रावास समिति के सदस्य और अन्य नागरिकों ने हम पर बहुत प्रेम किया| हमसे पढ़ाई करा ली| इसलिए हम दसवी तक पहुँच सके| मैं यहॉं नहीं आता, तो मेरा क्या होता यह कह नहीं सकता| यहॉं आया इसलिए मेरी प्रगति हो सकी| हमसे निश्‍चित ही कुछ गलतियॉं हुई होगी, उसके लिए मैं क्षमा मॉंगता हूँ|’’
यह छात्रावास ‘अभ्युदय प्रतिष्ठान’ संस्था चलाती है| प्रतिष्ठान के कार्यवाह उदय कुलकर्णी ने कहा, ‘‘इन बच्चों को उनकी भावनाएँ व्यक्त करने के लिए शब्द नहीं सूझ रहे थे| लेकिन उनके चेहरे ही उनकी भावनाएँ व्यक्त कर रहे थे| इन बच्चों से परिचय होने के बाद उनमें के सुप्त गुण हमारे ध्यान में आते है| ये बच्चें शिक्षा पूरी करने के बाद नागालँड वापस जाएगे| नागालँड में, हमारे जो कार्यकर्ता है, उन्हें मिलने के लिए, यहॉं से गये हुए बच्चें एक-दो दिन पैदल चलकर आते है| इससे यह भावनिक रिश्ता कितना गहरा है, इसका पता चलता है|’’

  (ईशान्य वार्ता, अगस्त २०११ के अंक में प्रकाशित जानकारी के आधार पर)
 

डॉ. मोहम्मद हनीफ शास्त्री

हॉं! डॉ. हनीफ मोहम्मद ‘शास्त्री’ है| संस्कृत के विद्वान है| संस्कृत के विख्यात अध्यापक है| हमारे उपराष्ट्रपति श्री हमीद अन्सारी के हस्ते ‘राष्ट्रीय सद्भावना’ पुरस्कार प्रदान कर, इस वर्ष जिन लोगों का सत्कार किया गया, उनमें डॉ. मोहम्मद हनीफ शास्त्री का भी समावेश था| डॉ. शास्त्री ने भागवद्गीता और कुरान का तुलनात्मक अभ्यास किया है| हिंदू-मुसलमानों में की समानता दिर्शानेवाले उनके लेखों के कारण ही उन्हें यह सद्भावना पुरस्कार मिला है| उनका मत है कि, दुनिया में के सारे मुसलमान नमाज पढ़ते हैं| लेकिन नमाज कैसे ‘कबूल’ होगी, इसका उत्तर गीता में है| ‘रोजे’ क्यों रखना, इसका भी उत्तर गीता में है और आश्‍चर्य यह कि श्री इंद्रेशकुमार मेरे प्रेरणास्रोत है, ऐसा उन्होंने बताया| इंद्रेशकुमार मतलब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक और कार्यकारी मंडल के एक सदस्य|
डॉ. शास्त्री के साथ मेरी भेट, शायद २००३ में, दिल्ली के तिहार जेल में के एक कार्यक्रम के दौरान हुई थी| दिल्ली में रामकृष्ण गोस्वामी नाम के एक समाजसेवी व्यक्ति है| उन्होंने ‘अपराध निवारण-चरित्र निर्माण’ इस नाम से एक संस्था बनाई है| यह संस्था मतलब अकेले गोस्वामी जेल में के कैदियों को श्रीमद्भगवद्गीता पढ़ाते है| उनकी इस शिक्षा के अच्छे परिणाम देखकर, अनेक सरकारी जेल में उन्हें निमंत्रित किया जाता है| उनके साथ मैं तिहार जेल में दो बार, अहमदाबाद के साबरमती जेल में एक बार, और हाल ही में कुछ माह पूर्व नागपुर के मध्यवर्ती जेल में गया था|
- मैं बता रहा था, तिहार जेल के एक कार्यक्रम में डॉ. शास्त्री से मेरी भेट हुई| दो-ढाई हजार कैदियों के सामने गीता की शिक्षा पर हमारे भाषण हुए| जेल के अधिकारी भी उपस्थित थे| डॉ. शास्त्री ने बहुत अच्छी तरह गीता का महत्त्व विशद किया| गत सितंबर माह के ‘हिमालय परिवार’ इस नियकालिक के अंक में ‘सच्ची सांप्रदायिक भावना’ इस शीर्षक से इमरान चौधरी का एक छोटा लेख प्रकाशित हुआ है| निम्न जानकारी उस लेख के आधार पर है|
ऐसा लगता है कि, इमरान चौधरी ने डॉ. मोहम्मद हनीफ शास्त्री की मुलाकात ली है| उसमे चौधरी ने डॉ. शास्त्री को सीधे संघ के बारे में प्रश्‍न पूँछे| उन्हें उत्तर देते हुए डॉ. शास्त्री ने कहा, ‘‘संघ और मुसलमानों के बीच गलतफहमियॉं है| उन्हे दूर किया जा सकता है| लेकिन इन मुद्दों को राजनीति से ना जोड़े| संघ एक राष्ट्रवादी संगठन है| मैं एक मुसलमान हूँ और मेरा अनुभव मुझे बताता है कि, संघ के लोग बुरे नहीं है| व्यक्तियों से दूर रहकर हम कुछ भी बोलते हैं और गलफमियॉं बना लेते है| लेकिन किसी व्यक्ति के पास जाने पर ही समझ पाते है कि वह व्यक्ति कैसी है| कुछ जाने बिना किसी के बारे में कुछ बोलना अल्लाह और उसके रसूल को नाराज करने के समान है|


रेंगेपार (कोहळी) की मातोश्री गौशाला

रेंगेपार एक छोटा देहात है| जनसंख्या दो हजार भी नहीं| वहॉं एक अच्छी गौशाला है| मतलब बाहर से देखने में नहीं| उसका अंतरंग अतिसुंदर है| प्रशंसनीय है|
रेंगेपार, भंडारा जिले के लाखनी तहसील में है| लाखनी से करीब ८ किलोमीटर दूर| इस तहसील में ‘रेंगेपार’ नाम के कुछ और भी गॉंव होने के कारण इसका नाम रेंगेपार (कोहळी) है| कारण यहॉं कोहळी समाज बहुसंख्य है|
‘मातोश्री गौशाला’ यह गौशाला का नाम है| कसाईयों से बचाई गई गायें ही यहॉं है| उनकी संख्या करीब ४०० है| अधिकांश गाय और बैल अत्यंत कृश, जख्मी और रोगी है| उन सब की देखभाल यह गौशाला करती है| यहॉं अब एक बड़ा हॉंल भी बनाया गया है|
यह गौशाला, यादवराव कापगते के परिश्रम से बनी है| यादवराव कँसर के रुग्ण थे| डॉक्टरों ने उनके जीवन की आशा छोड़ दी थी| अधिक से अधिक एक-देढ माह जिवीत रहोगे, ऐसा उन्हे बताया गया था| २००१ की यह घटना है| उसी समय देवलापार के गौ-विज्ञान केन्द्र के लोग उन्हें मिले| उन्होंने, गौमूत्र चिकित्सा बताई| रोज-सुबह सायंकाल, यादवराव ताजा गौमूत्र पीने लगे| दस माह तक की गई एक प्रकार की इस तपस्या के बाद, वे रोगमुक्त हुए| ६२ वर्ष के यादवराव अब अच्छे धट्टे-कट्टे है|
१२ अक्टूबर को, हमने वह गौशाला देखी| वहॉं, और एक व्यक्ति ने हमें चकित किया| हम सुबह १०.३० के करीब वहॉं पहुँचे| एक गाय को जमीन पर गिरा कर दो लोगों ने उसे जकड रखा था और तिसरा एक व्यक्ति, उस गाय का घाव धोकर उसे दवा लगा रहा था| हमें लगा वे पशु-वैद्य होगे| लेकिन वे पशु-वैद्य नहीं है| वे नागपुर के व्यापारी है| लकड़गंज में रहते है| उन्होंने पशु-रोग चिकित्सा का प्राथमिक ज्ञान लिया है, इसी ज्ञान के आधार पर वे बीमार गायों की सेवा करते है| यह विशेष आश्‍चर्य की बात नहीं| आश्‍चर्य की बात यह है कि, वे रोज सुबह नागपुर से रेंगेपार आते है| नागपुर-रेंगेपार अंतर करीब ९० किलोमीटर है| वे रोज यह ९० किलोमीटर आना-जाना करते है| और धनप्राप्ती शून्य! केवल गौ-सेवा के लिए इतनी भाग-दौड़| सही में यह एक तपस्या ही है| इस व्यक्ति का नाम है शंभुभाई पटेल| वे इस संस्था के सहसचिव है| सहसचिव इतने कष्ट ले? रोज १८० किलोमीटर यात्रा, अपने वाहन से करें? गौ-भक्ति का यह असाधारण दर्शन यहॉं हुआ| यहॉं के बछड़ों को भी शंभुभाई के प्रति अनोखा लगाव है| शंभुभाई ने आवाज लगाते ही पॉंच-छ: बछड़े उनके ईद-गिर्द जमा हो गए| शंभुभाई ने नागपुर से लाए ब्रेड का एक-एक टुकड़ा उन्हें खिलाया| शायद यह उनका रोज का ही क्रम होगा और बछड़े यह जानते है|
सेवानिवृत्त कृषि उपसंचालक श्री दादासाहब राजहंस के मार्गदर्शन में यहॉं आम का एक बड़ा बगीचा भी विकसित हुआ है| वहॉं आम के ४०० सुंदर पेड़ है| साथ ही बास के कुंज भी है, सागवान भी है| वह आम का बगीचा देखकर हम बहुत खूश हुए|
लेकिन रेंगेपार का चमत्कार यहीं समाप्त नहीं होता| यहॉं हर घर में शौचालय है और आश्‍चर्य तो यह है कि हर घर में गोबर गॅस भी है| गौशाला और आम के बगीचे के साथ फुलों का भी बगीचा है, रोपवाटिका है, जैविक खाद का उपयोग किया जाता है| एक सुंदर तालाब है और सैर (ट्रीप) के लिए सबको आमंत्रण भी है| एक व्यक्ति चाहे तो क्या परिवर्तन कर सकता है इसका प्रमाण हमने रेंगेपार में देखा| यादवराव कहते है, वैसे तो मैं दस वर्ष पूर्व ही मर गया होता| गौमाता ने मुझे जीवनदान दिया| यह मेरा बोनस जीवन गायों की सेवा को समर्पित है|

बाल मुख्याध्यापक      

पश्‍चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले में भापता उत्तरपारा यह एक गॉंव है| उस गॉंव में गत पॉंच वर्षों से एक शाला चल रही है| इस शाला का, संचालक या मुख्याध्यापक कहे, एक १७ वर्ष का युवक है| यह उसकी आज की आयु है| शाला आरंभ की, उस समय वह केवल १२ वर्ष का था| उसका नाम है बाबर अली|
उसकी शाला में ९७७ विद्यार्थी है| वर्ष २००५ में, उसके पिता मोहम्मद नसीरुद्दीन ने उसे ६०० रुपये पूंजी दी| मोहम्मद नसीरुद्दीन अनाज और खाद का छोटा व्यापार करते है| उन्होने दी पूंजी से बाबर अली ने शाला शुरू की| ‘आनंद शिक्षा निकेतन’ यह उस शाला का नाम है| शाला को ग्राम पंचायत, स्थानिक शासकीय अधिकारी, रामकृष्ण मिशन के प्रमुख, जिलाधिकारी और कोलकाता विकास प्राधिकरण से सहायता मिलती है|
२०१० में बाबर अली ने १२ वी की परीक्षा उत्तीर्ण की और अब पदवी परीक्षा के लिए महाविद्यालय में प्रवेश लिया है| स्वयंसेवा की वृत्ती से काम करनेवाले और भी दस शिक्षक उसकी सहायता करते है| उसकी शाला में मुमताज बेगम नाम की विवाहित महिला, रोज पॉंच किलोमीटर दूर से आकर पढ़ाती है| वह ८ वी में है, और उसकी लड़की पहली कक्षा में है| यह महिला रोज पैदल शाला में आती है|
बाबर अली के इस काम की दखल बीबीसी ने भी ली है| अक्टूबर २००९ को इस बारे में प्रसारित समाचार में बीबीसी ने बताया कि, यह दुनिया में का सबसे युवा मुख्याध्यापक है| खाकी की आधी चड्डी और टी शर्ट यह उस अध्यापक का पोशाक है| 

 (‘विकल्प वेध’के १ से १५ सितंबर के अंक से)

       
हमारी रेल

हमारी रेल को कौन नहीं जानता? उसके बारे मे कुछ मनोरंजक जानकारी -
१) हमारे देश में के रेल मार्गो की लंबाई ६३९४० किलोमीटर है|
२) रोज १४२४४ गाड़ियॉं दौड़ती हैं|
३) ७०९२ स्टेशन है|
४) ‘गिनिज बुक ऑफ रेकॉर्ड’ में, रेल स्टेशन द्वारा दी जाने वाली विविध सेवाओं के लिए, पुरानी दिल्ली स्टेशन का नाम है|
५) अंग्रेज गव्हर्नर जनरल लॉर्ड डलहौसी के कार्यकाल १६ अप्रेल १८५३ में मुंबई (बोरीबंदर) से ठाणे, यह पहली रेल चली थी|
६) जम्मू से कन्याकुमारी सीधे जानेवाली गाड़ी का नाम ‘हिमसागर एक्सप्रेस’ है| वह ३७५१ किलोमीटर दूरी ६६ घंटे मेें पूरी करती है| वह १२ राज्यों में से जाती है और हमारे देश में सर्वाधिक अंतर पार करनेवाली गाड़ी है|
७) कंम्प्युटर से रेल आरक्षण करने की सुविधा १९६६ में सर्वप्रथम दिल्ली से आरंभ हुई|
८) खडकपुर का प्लॅटफॉर्म सबसे लंबा - २७३३ फुट है|
९) शोण नदि पर बना पुल सबसे लंबा - १० हजार ४४ फुट है|
१०) कोकण रेल्वे के अंतर्गत बने पुल के एक खंबे की ऊँचाई, कुतुबमिनार से भी अधिक है|   
११) ट्राम सेवा सर्वप्रथम मुंबई और चेन्नई में शुरू हुई| वर्ष था १८७४| 

- मा. गो. वैद्य, नागपुर
E-mail : babujaivaiday@gmail.com
(अनुवाद : विकास कुलकर्णी)   


डोंबिवली में नागालँड

पाकिस्तान की दुर्दशा पर एकमात्र उपाय

प्रथम यह मान्य होना चाहिए कि, पाकिस्तान की दुर्दशा हुई है| यह तुम्हें या - हमें मान्य होने से नहीं चलेगा| यह पाकिस्तान को मान्य होना चाहिए;
अमेरिका का सहारा
यह सर्वमान्य है कि, पाकिस्तान अपने बुते पर टिक नहीं सकता| वह कब का ही समाप्त हुआ होता; लेकिन अमेरिका की फौजी और आर्थिक सहायता ने उसे बचा लिया, उस समय अमेरिका को पाकिस्तान की आवश्यकता थी| अफगानिस्थान पर रूस ने आक्रमण किया था| अपनी एक कठपुतली उसने राज्य पर बिठाई थी| आफगानिस्थान में से रूस की सत्ता समाप्त करने के लिए अमेरिका ने पाकिस्तान को बड़ी मात्रा में फौजी और आर्थिक सहायता दी| रूस का वर्चस्व समाप्त होने के बाद, कुछ वर्ष अफगानिस्थान में गृहयुद्ध चला| उसमें तालिबान सफल हुआ और १९९४ में वहॉं तालिबान की सत्ता स्थापन हुई| इस तालिबान को पाकिस्तान की संपूर्ण सहायता प्राप्त थी| २००१ को न्यूयार्क शहर पर अल-कायदा ने आतंकी हमला कर तीन हजार से अधिक नागरिकों की हत्या करने के बाद, अमेरिका अफगानिस्थान में उतरी और उसने तालिबान को परास्त कर हमीद करजाई की सरकार स्थापन की| तथापि, पाकिस्तान के तालिबान के साथ तार जुड़े ही थे|
अमेरिका का भ्रमनिरास
अमेरिका की दृष्टि से तालिबान यह आतंकवादी संगठन है| अफगानिस्थान में अभी भी नाटो की फौज है| जब तक वह फौज वहॉं है, तब तक तालिबान की दाल नहीं गलनेवाली| ११ सितंबर २००१ के आतंकी हमले के बाद, आतंकवाद के उग्र संकट का अमेरिका को अहसास हुआ; और उसकी नीति सर्वत्र का आतंकवाद मिटाने की दिशा में मुड़ी| अमेरिका की कल्पना थी कि, इस आतंकवाद विरोधी संघर्ष में पाकिस्तान सच्चे मन से उसकी सहायता करेगा| लेकिन वह कल्पना झूठ साबित हुई| पाकिस्तान की खुफिया एजंसी -आयएसआय - के अफगानिस्तान में आतंकवाद फैलानेवाले तालिबान के ही, सिराज हक्कानी गुट के साथ अंदरूनी संबंध है, अमेरिका को अब इसका पता लग चुका है| अमेरिका के मुख्य सेनापति मुलेन ने ऐसा स्पष्ट आरोप ही किया है| अमेरिका की विदेश मंत्री हिलेरी क्लिटंन ने भी यही कहा है और अब तो अमेरिका के राष्ट्रपति ओबामा ने भी इसकी पुष्टी की है| अमेरिका की संसद में भाषण करते समय ओबामा ने कहा है कि, ‘‘आतंकवाद के विरुद्ध पाकिस्तान के योजित उपाय परिणाम देने में असफल रहे है| विद्रोही, और अधिक शक्तिशाली बने है, नाटो की फौज के लिए खतरा और भी अधिक बढ़ गया है|’’
अफगानिस्थान का नया मोड
अमेरिका के राजनीतिज्ञ और फौज के अधिकारियों के वक्तव्यों के कारण पाकिस्तान की मुश्किल हुई है| अमेरिका पाकिस्तान की उपेक्षा करेगा तो अपना एक मित्र खो बैठेगा, ऐसी सीधी धमकी ही पाकिस्तान के विदेश मंत्री ने दी है| लेकिन, इस धमकी का अमेरिका पर कोई परिणाम नहीं होगा| परंतु, इसके साथ ही पाकिस्थान के तालिबान के साथ के संबंध भी समाप्त नहीं होगे| पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने हाल ही में कहा है कि, उनकी सरकार तालिबान के साथ वार्ता करने के लिए तैयार है| तालिबान के किस गुट के साथ गिलानी साहब वार्ता करनेवाले है, यह उन्होंने स्पष्ट नहीं किया| संभवत: वे सिराज हक्कानी के ही गुट के साथ चर्चा करेंगे| इसी हक्कानी गुट ने अफगानिस्थान के भूतपूर्व राष्ट्रपति बुराहनुद्दीन रब्बानी की हाल ही में हत्या की है| इस हत्या के कारण, अफगानिस्थान की राजनीति ने नया मोड लिया है| पाकिस्तान के बारे में अफगाणिस्तान का सरकार का भ्रमनिरास हुआ है| उसने तालिबान के साथ समझौते की वार्ता रोक दी है| पाकिस्तान का दबाव उन्होंने नहीं माना|       

भारत-अफगान मैत्री
अमेरिका के हवाई हमलों से उद्ध्वस्त हुए अफगानिस्थान के पुनर्निर्माण में भारत उसकी सहायता कर ही रहा था| सड़क निर्माण और आरोग्य इन दो क्षेत्रों में भारत अफगानिस्थान को बड़ी मात्रा में सहायता कर ही रहा था| नए अनुबंध के कारण, भारत अफगानिस्तान की फौज और सुरक्षा दलों को भी प्रशिक्षण देगा| अफगानिस्तान के अध्यक्ष ने पाकिस्तान हमारा जुड़वा भाई और भारत सच्चा मित्र है, ऐसा कहा है लेकिन, अफगानिस्तान के इस जुड़वे भाई को भारत-अफगान मित्रता हजम नहीं होगी| हमारे पुराण में सुंद और उपसुंद इन राक्षसों की कथा है| दोनों सग्गे भाई थे| लेकिन तिलोत्तमा नाम की अप्सरा सामने आते ही, उसको प्राप्त करने के लिए ये दोनों भाई एकदूसरे पर टूट पड़ें और परस्परों को मार डाला| पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बंधुत्व कीपरिणति इससे अलग नहीं होगी| पाकिस्तान को अफगानिस्तान उसका मांडलिक (अधीन राष्ट्र) बने और सदैव वैसा ही रहे, ऐसा ही लगेगा किंतु अफगानिस्तान के आज के सत्ताधारी यह मान्य नहीं करेंगे| अफगानिस्तान का हित स्वयं को भारत के साथ जोड़ लेने में ही है| आर्य चाणक्य के भू-राजनैतिक सिद्धांत के अनुसार भारत और अफगानिस्तान सहजमित्र है| अमेरिका को भी यह मित्रता मान्य होगी| अमेरिका और नाटो राष्ट्रों ने २०१४ मेंे अपनी फौज वापस ले जाना तय किया है| तब तक, अफगानिस्तान में पाकिस्तान उधम नहीं मचा सकता| उसे चीन ने उसकाया तो भी वह ऐसा नहीं कर सकता| दूसरी बात यह भी है कि, चीन का इस भाग में वर्चस्व स्थापन होने देना अमेरिका को पुराएगा नहीं| नाटो फौज हटने के बाद, अफगानिस्थान की मदद भारत ही कर सकता है| भारत, इस दौरान के तीन वर्षों में अफगान की फौज को और सक्षम बनाएगा, इसके अलावा पाकिस्तान ने दु:साहस किया तो भारत ही पाकिस्तान को रोक सकेगा| इस प्रदेश की भावी राजनीति की दृष्टि से भारत-अफगान मित्रता ऐसी महत्त्वपूर्ण है| इस कारण हाल ही में अफगानिस्तान के राष्ट्रपति हमीद करजाई ने भारत की जो दो दिनों की यात्रा की और भारत सरकार के साथ मित्रता का नया अनुबंध किया वह बहुत महत्त्वपूर्ण है|

इस्लाम और सर्व समावेशकता
आज पाकिस्तान घोर राजनीतिक संकट में फंसा है| उसने अमेरिका का विश्‍वास खो दिया है| चीन, पाकिस्तान को हडपने का मौका ही ताक रहा है| ऍग्लो अमेरिकनों को यह पसंद होगा, इसकी संभावना नहीं| लेकिन, अन्य राष्ट्र कुछ भी सोचे, पाकिस्तान ने मतलब पाकिस्तान की जनता ने ही इस बारे में गंभीरता से विचार करना चाहिए; और उसके लिए मूलगामी चिंतन भी करना चाहिए|
एक मूलभूत बात यह है कि, पाकिस्तान की निर्मिती इस्लाम खतरे मेंइस घोषणा से हुई| यह खतराकिससे, अर्थात् भारत से; और स्पष्ट ही कहे तो हिंदुस्थान से! आधारभूत तत्त्व था हिंदूद्वेष का और दिखावटी तत्त्व था इस्लामी बंधुभाव का| इसी दिखावटी तत्त्व के कारण, देड-दो हजार किलोमीटर की दूरी होते हुए भी, पश्‍चिम पाकिस्तान और पूर्व पाकिस्तान मिलकर एक पाकिस्तान बना| लेकिन, इस्लाम की शिक्षा में गुण है पर, सर्वसमावेशकता (inclusiveness) और (comradeship) सौहार्द नहीं है| वह होता तो, पूर्व पाकिस्तान (विद्यमान बांगला देश) पश्‍चिम पाकिस्तान से केवल पचीस वर्ष के भीतर अलग नहीं होता| इस विभाजन ने यह सिद्ध किया कि, भाषा का अभिमान इस्लामता पर मात कर सकता है| सर्वसमावेशकता नहीं होने के कारण ही, पाकिस्तान में, गत करीब ४५ वर्षों से अहमदिया मुसलमानों को मुस्लिमेत्तर ठहराया गया है| यहॉं यह ध्यान में ले कि, पाकिस्तान की निर्मिति होने के बाद उसके पहले विदेश मंत्री झाफरउल्ला खान अहमदिया थे| आज शिया विरुद्ध सुन्नी, पंजाबी विरुद्ध सिंधी, पंजाबी विरुद्ध बलुची ऐसे संघर्ष पाकिस्तान में हरदम चलते रहते है|

अभी की घटना
यह ताजी घटना ४ अक्टूबर की है| बलुचीस्थान की राजधानी क्वेटा शहर की| वहॉं एक बस रोककर, १३ शिया यात्रियों को बस में से उतारा और फिर उन्हें एक कतार में खड़ा कर गोलियों से भून डाला| इन शियापंथी मुसलमानों का अपराध क्या था? यही कि, वे बहुसंख्य सुन्नी पंथ के नहीं थे| क्वेटा में की यह क्रूर घटना अपवादात्मक नहीं| कराची में यह नित्य ही चलता है| शिया भी मुसलमान ही है| लेकिन वे अल्पसंख्यक है| वे सम्मान से जी सकें, ऐसा वातावरण पाकिस्तान में नहीं है| क्या ऐसा पाकिस्तान एक रहेगा? चीन का आजकल पाकिस्तान के लिए बहुत प्रेम उमड़ रहा है| क्या चीन मुसलमानों में सामंजस्य निर्माण करेगा? पाकिस्तान की जनता ने, मैं आग्रह से कहता हूँ जनता - सरकार नहीं - चीन के सिकियांग प्रांत में के मुसलमानों की स्थिति जान ले| उसी प्रकार, तिब्बत में गत साठ वर्षों में चीन ने क्या किया है, और क्या कर रहा है, यह भी समझ ले और बाद में ही चीन की ओर मुड़े|
फौज का प्राबल्य
पाकिस्तान का टुटना अटल है| वह कभी भी एक राष्ट्र नहीं था| एक राज्य’ - एक सभ्य राज्य के रूप में - वह टिक नहीं सकता| हॉं, फौज फिर अपनी सत्ता स्थापित करेगी| जरदारी-गिलानी के स्थान पर कयानी आएगे| पाकिस्तान का गत साठ वर्षों का इतिहास यही बताता है| इस्कंदर मिर्झा, अयूबखान, झिया-उल-हक, याह्याखान, मुशर्रफ ही जनता को फौज की धाक में रख सके| लियाकत अली खान का पाकिस्तान की निर्मिति में बहुत बड़ा योगदान था| लेकिन वे प्रधानमंत्री के रूप में टिक नहीं सके| लोगों ने उनके विरुद्ध अविश्‍वास व्यक्त कर, चुनाव में पराभूत कर, उन्हें पदच्युत नहीं किया| उनकी हत्या की गई| झुल्फिकार अली भुत्तो कट्टर मुसलमान थे| वे कट्टर भारतद्वेष्टा भी थे| लेकिन सेनाधिकारी नहीं थे| सेनाधिकारी झिया-उल-हक  ने उन्हें फॉंसी पर लटका दिया| नवाज शरीफ, पाकिस्तान के इस भूतपूर्व प्रधानमंत्री नसीब बलवान है, वे अभी तक जीवित है| अन्यथा उनका भी लियाकत अली खान या भुत्तों हुआ होता| बेनझीर भुत्तो भी प्रधानमंत्री थी| लेकिन फौज के प्रशासन को मान्य नहीं थी| उनकी भी हत्या हुई| क्या यह पाकिस्तान की जनता को मान्य है?

वैमनस्य छोड़ो
अमेरिका और नाटो के अफगानिस्थान से हटते ही पाकिस्तान में तालिबान की सत्ता स्थापन होना तय है| क्या बहुसंख्य पाकिस्तानी जनता तालिबान की मतांध सत्ता चाहती है? ऐसा हो तो फिर वे हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे और जो उनके नसीब आए वह भोगे| लेकिन तालिबान की सत्ता नहीं चाहती हो, सभ्य, सुसंस्कृत समाजस्थिति चाहती हो तो करजाई की राह अपनाए| भारत के प्रति मतलब हिंदुस्थान के प्रति मतलब हिंदूओं के प्रति पाला वैमनस्य समाप्त करे| १४ अगस्ट १९४७ के पूर्व की स्थिति पाकिस्तान की जनता याद करे| बलुचिस्थान, वायव्य प्रांत, पंजाब, सिंध में के मुसलमानों को - फिर वे शिया या सुन्नी, सुफी हो या अहमदिया - उन्हें हिंदूओं की ओर से क्या कष्ट हुआ? हिंदूओं ने मुसलमानों की लड़कियों का अपहरण किया? या, मसजिदे गिराई थी? हिंदुस्थान में के मुसलमानों की ओर भी वे कुछ खुले दिल से और निर्विकार दृष्टि से देखें| जो अधिकार बहुसंख्य हिंदूओं को प्राप्त है, वह मुसलमानों को भी प्राप्त है| मुसलमान राष्ट्रपति भी हुए है| एक नहीं तो तीन : जाकीर हुसैन, फक्रुद्दीन अली अहमद, अब्दुल कलाम|बहुसंख्य हिंदूओं ने क्या कभी इसपर आक्षेप लिया? सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश का पद भी मुसलमानों ने विभूषित किया है| उच्च न्यायालय में वे चुने गए है| राज्यों के राज्यपाल और राजदूत भी बने हैं| केवल प्रधानमंत्री और मुख्य सेनापति इस पद पर वे अभी तक आरूढ नहीं हुए है| पाकिस्तान में के प्रांत भारत में शामिल हुए तो यह भी संभव होगा|
जनता का दायित्व
यह सच है कि, पाकिस्तान की फौज यह नहीं होने देगी और चीन को भी यह पसंद नहीं होगा| लेकिन इसकाभी रास्ता है| वह ट्युनिशिया, मिस्र और लिबिया इन देशों में की जनता ने दिखाया है और येमेन की जनता भी उसका अनुसरण कर रही है| क्या होस्नी मुबारक के पास सेना नहीं थी? प्रारंभ में वह जनता के साथ नहीं थी| लेकिन जनता की ताकद देखकर बाद में वह तटस्थ बन गई| गद्दाफी को तो फौज के ताकद की ही घमंड थी| लेकिन वह चली नहीं| यह सच है कि, लिबिया की जनता को अमेरिकादि नाटो देशों ने भी मदद की इसलिए ही वे विजयी हुए| पाकिस्तान की जनता को भी आवश्यकता पड़ने पर ऐसी अंतर्राष्ट्रीय सहायता मिल सकती है| लेकिन उसकी आवश्यकता नहीं पड़ेगी| कयानी मतलब गद्दाफी नहीं| १४ अगस्ट १९४७ के समान भारत का एक घटक राष्ट्र बना, तो जो प्रांत मिलकर पाकिस्तान बना है, वहॉं मुसलमान ही मुख्यमंत्री रहेगा| क्योंकि, वह खुले और पारदर्शी चुनाव से चुना जाएगा| कुछ माह पूर्व कराची के एक मतदार संघ में हुए चुनाव में, हिंसाचार में ६५ लोगों की जान गई, भारत के साथ संलग्नता मिलने के बाद ऐसा नहीं होगा|

व्यावहारिक स्वायत्तता
इस प्रत्येक प्रांत का स्वतंत्र और स्वायत्त अस्तित्व भी रहेगा| उन्हें सब प्रकार की व्यावहारिक स्वायत्तता (functional autonomy) होगी| अंग्रेजों की सत्ता के समय भारत में अनेक रियासतें थी| हैद्राबाद, म्हैसूर, काश्मीर, ग्वालियर तो आज के प्रांतों से भी विस्तार और / या जनसंख्या से भी बडी थी और उनके राजाओं को सब प्रकार की अंतर्गत स्वतंत्रता थी| भारत के साथ संलग्न होने के बाद पाकिस्तान में के प्रांतों को भी ऐसी स्वतंत्रता मिल सकती है| उसी प्रकार काश्मीर के लिए जैसी धारा ३७० है, उस प्रकार का प्रावधान भी किया जा सकता है| इस प्रकार अंतर्गत कारोबार के लिए उन्हें पूर्ण स्वयत्तता मिल सकती है| लेकिन, तीन बातों पर भारत का नियंत्रण रहेगा : (१) विदेश संबंध| इसमें आर्थिक अनुबंधों का भी समावेश है|  (२) सुरक्षा और (३) जनतांत्रिक व्यवस्था| पाकिस्तान में जनतांत्रिक राज्यप्रणाली ही रहनी चाहिए| संसदीय या अध्यक्षीय यह तपसील का मुद्दा है| किसी फौजी अधिकारी की, जनतंत्र उखाडकर अपना एकछत्र राज्य निर्माण करने की हिंमत नहीं होनी चाहिए| इस दृष्टि से संवैधानिक व्यवस्था की जा सकती है| ब्रिटीश राज में, इस प्रकार की स्वायत्तता भोगनेवाली रियासतों में एक ब्रिटीश रेसिडेंट रहता था| उसी प्रकार भारत का कोई अधिकारी रहेगा| उसे राज्यपाल भी कह सकेगे| वह केवल संवैधानिक प्रमुख रहेगा| वह अंतर्गत कारोबार में हस्तक्षेप नहीं करेगा| लेकिन विदेश संबंध, सुरक्षा व्यवस्था और जनतंत्र की प्रतिष्ठापना देखने की जिम्मेदारी उसकी होगी| आज अस्तित्व का संकट निर्माण होने की परिस्थिति में, जनता ने ही विचार करना है कि, चीन के पीछे जाना है या भारत के साथ सौहार्द बनाना है? जनतांत्रिक व्यवस्था और मूल्य मानना है या, फौज की सत्ता अथवा तालिबानी पद्धति स्वीकारनी है? प्रश्‍न स्वार्थी राजकर्ताओं का नहीं| प्रश्‍न पाकिस्तान के आम आदमी का है| अंतिम स्वरूप का सौहार्द प्रस्थापित हो इसलिए मैं यह लिख रहा हूँ| लेकिन वह एक क्षण में होना चाहिए, ऐसा नहीं| वह क्रमश: हो| लेकिन कदम उस दिशा में बढ़ने चाहिए| इस बारे में अंतिम निर्णय पाकिस्तान की जनता को करना है| उसे कोई भी शक्ति बाहर से नहीं थोपेगी|   
                     

- मा. गो. वैद्य, नागपुर
E-mail : babujaivaiday@gmail.com
(अनुवाद : विकास कुलकर्णी)

स्पर्धा : प्रधानमंत्रीपद के लिए

भारत का अगला प्रधानमंत्री कौन? इस बारे में समाचरपत्र और अन्य प्रसार माध्यमों में जोरदार चर्चा चल रही है| लोकसभा का चुनाव सामान्य परिस्थिति में २०१४ के अप्रेल-मई माह में होगा| मतलब अभी ढाई वर्ष बाकी है| लेकिन अभी ही, उस चुनाव के बाद प्रधानमंत्री कौन बनेगा इसके बारे मेंअंदाज लगाना शुरू हो गया है| मानों चुनाव तीन माह के बाद ही हो रहे है! लेकिन सब, अर्थात्, प्रसार माध्यम छोड़कर, इस बात को समझ ले कि, ५-६ माह बाद होनेवाले उत्तर प्रदेश के चुनाव के परिणाम घोषित होने और उसके राजनीतिक परिणाम ध्यान में लिए बिना, २०१४ के लोकसभा के चुनाव के बाद प्रधानमंत्री कौन बनेगा, यह चर्चा केवल पंतगबाजी है| वह मनोरंजक तो है, लेकिन उसे कोई अर्थ नहीं|

कॉंग्रेस की स्थिति

एक बात सब के ध्यान में आई है कि, कॉंग्रेस की स्थिति डामाडौल है| कॉंग्रेस की स्पष्ट सत्ता केवल हरियाना, राज्यस्थान, असम और आंध्र इन चार बड़े राज्यों में ही है| महाराष्ट्र में कॉंग्रेस सत्ता में है, मुख्यमंत्री कॉंग्रेस का ही है| लेकिन उनकी सत्ता राष्ट्रवादी कॉंग्रेस की बैसाखीयों पर टिकी है| इन दो पार्टिंयों में हरदम तक्रार चलते रहती है| एक-दूसरे को मात देने का एक भी अवसर कोई गवाता नहीं| शिवसेना-भाजपा गटबंधन का भय, यह नकारात्मक कारण ही दानों कॉंग्रेस को एकत्र रहने के लिए बाध्य कर रहा है| लोकसभा में, केवल कॉंग्रेस के २०८ सदस्य है| बहुमत के लिए २७२ की आवश्यकता है| तृणमूल कॉंग्रेस, द्रमुक, राष्ट्रवादी कॉंग्रेस, और नॅशनल कॉन्फरन्स इन पार्टिंयों के समर्थन से कॉंग्रेस की सरकार चल रही है| 

सद्य: परिस्थिति

आज राज्यों में कॉंग्रेस की स्थिति क्या है? २००९ के चुनाव में कॉंग्रेस के सर्वाधिक सदस्य आंध्र प्रदेश से थे| राजशेखर रेड्डी की लोकप्रियता के कारण, वहॉं कॉंग्रेस को अभूतपूर्व सफलता मिली थी| वे राजशेखर रेड्डी आज हमारे बीच नहीं है और उनके पुत्र जगनमोहन रेड्डी ने कॉंग्रेस के विरुद्ध बगावत की है| इस बगावत के कारण कॉंग्रेस घबरा गई है| जगनमोहन रेड्डी को फंसाने के लिए, उनके प्रतिष्ठानों पर छापें डालने का, हरदम का दॉंव कॉंग्रेस के नेता खेल रहे हैं| जगनमोहन रेड्डी को जेल जाना पड़ा तो भी, वहॉं कॉंग्रेस २००९ का आँकड़ा नहीं छू पाएगी| बिहार में तो कॉंग्रेस स्थिति और भी बुरी है| हरियाणा में कॉंग्रेस की स्थिति अच्छी है| लेकिन उस राज्य में लोकसभा की केवल १० सिटें हैं| उत्तर प्रदेश से कॉंग्रेस को बहुत आशा है| कारण २००७ के चुनाव में चपत खाई कॉंग्रेस को २००९ के लोकसभा के चुनाव में कुछ सफलता मिली थी| कुल सिटों की २५ प्रतिशत सिटें उसे मिली थी| ये सिटें कॉंग्रेस को कैसी मिली इसकी चर्चा आगे है| कॉंग्रेस की सहयोगी, करुणानिधि के द्रमुक काकुछ माह पूर्व ही हुए विधानसभा के चुनाव में कैसे सफाया हुआ, यह सब को पता ही है| आज लोकसभा में द्रमुक के १८ सदस्य है| आगामी चुनाव में द्रमुक इसकी आधी संख्या कायम रख पाई तो, उसने अच्छी सफलता पाई, ऐसा कहा जा सकता है| लेकिन ऐसी कोई संभावना नहीं है| इस कारण तामिलनाडु से भी कॉंग्रेस को बहुत आशा नहीं है| लोकसभा में कॉंग्रेस के २०८ सदस्य है, इनमें से कम से कम ५० तो घटाने पड़ेगे| कॉंग्रेस की ताकद १६० से आगे जाने की नहीं| सारांश यह कि, २०१४ में कॉंग्रेस सत्ता में नहीं आ सकती|

भाजपा को आशा

अर्थात् प्रमुख विरोधी पार्टी भाजपा को आशा है| हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश, छत्तसीसगढ़, गुजरात, कर्नाटक इन राज्यों में उसकी अपने बुत्ते पर सरकारे है, तो पंजाब और बिहार, इन दो राज्यों में वह क्रमश: अकाली दल और जद (यु) की सहयोगी है| आज लोकसभा में उनके केवल ११६ सदस्य है| लेकिन २००३ तक यह संख्या १८२ थी| राजनीतिक निरीक्षकों का अंदाज है कि, २०१४ में भाजपा लोकसभा में २०० की संख्या पार कर जाएगी| आज मित्र पक्षों के साथ भाजपा के नेतृत्व में के राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के केवल १५६ सदस्य है| नये सिरे से फिर अद्रमुक उनके साथ आएगी| १९९८ तक वह भाजपा के नेतृत्व में के गठबंधन का मुख्य घटक थी ही| तृणमूल कॉंग्रेस या नॅशनल कॉन्फरन्स, केन्द्र में सत्ता में कौन है, यह देखकर अपनी भूमिका निश्‍चित करते है| भाजपा को उनकी मदद अपेक्षित है| विद्यमान राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के जद (यु) के २० सदस्य है| इस संख्या में अच्छी वृद्धि होने की संभावना है|

नेतृत्व दारिद्र्य

इसी कारण, भाजपा में से कौन प्रधानमंत्री बनेगा, इसकी जोरदार चर्चा प्रसार माध्यमों में चल रही है| इसका एक और कारण यह भी है कि, प्रधानमंत्रीपद सम्हालने की क्षमता रखनेवाले अनेक नेता भाजपा में है| कॉंग्रेस में केवल एक ही नाम सबसे आगे है; और वह है राहुल गांधी| कॉंग्रेस पार्टी में नेतृत्व दारिद्र्य इतना है कि, अन्य किसी का नाम भी नहीं लिया जाता| मनमोहन सिंह इसके बाद प्रधानमंत्री नहीं बनेगे, यह पत्थर पर की लकीर है| दिग्विजय सिंह, कपिल सिब्बल के नाम तो विचार करने के योग्य भी नहीं| चिदंबरम् में योग्यता है, लेकिन तामिलनाडू में की आज की स्थिति में उनका चुनाव जितना ही कठिन है| २००९ के चुनाव में वे चालाकी कर जीते थे, ऐसा खुल्लमखुल्ला आरोप है| अब शेष रहे केवल प्रणव मुकर्जी| उनमें योग्यता है| लेकिन वे गांधी परिवार के विश्‍वासपात्र नहीं है| फिर बचते है दो नाम १) श्रीमती सोनिया गांधी और २) राहुल गांधी| मतलब माता और पुत्र; और माता ने पुत्र को सामने किया है| वे ‘युवराज’ के रूप में ही जाने जाते है| और सब स्तर के कॉंग्रेस के नेता भी उनकी ओर भावी प्रधानमंत्री के रूप में ही देखते है| श्रीमती सोनिया गांधी ने भी वैसे संकेत दिये है| शस्त्रक्रिया के लिए वे विदेश गई तब, पार्टी का काम देखने के लिए जो नेतृचतुष्टय उन्होंने बनाया, उसमें राहुल गांधी प्रमुख थे| बाकी अँटनी, द्विवेदी, प्रभृति तीन सदस्य एक उपचार मात्र था| व्यक्ति केन्द्रित या वंश केन्द्रित व्यवस्था में, ऐसी स्थिति निर्माण होना अटल होता है| 
भाजपा में ऐसा नेतृत्व-दारिद्र्य नहीं| प्रधानमंत्रीपद की योग्यता और क्षमता रखनेवाले अनेक नाम है| लालकृष्ण अडवाणी, सुषमा स्वराज, अरुण जेटली, नरेंद्र मोदी, राजनाथ सिंह और नीतीन गडकरी यह नाम सहज ही सामने आते है| लेकिन आज अडवाणी, मोदी और गडकरी यह तीन नाम विशेष चर्चा में है| श्रीमती सुषमा स्वराज का नाम क्यों नहीं आगे आता, यह आश्‍चर्य है| यह नाम प्रमुखता से सामने आना आवश्यक है| इसके लाभ भी है|

नीतीन गडकरी

इस सूची में नीतीन गडकरी का नाम शामिल करने पर अनेकों को आश्‍चर्य होगा| लेकिन आश्‍चर्य करने का कारण नहीं| १५ दिसंबर २०१० के ‘टाईम्स ऑफ इंडिया’में, ‘रेस फॉर क्राऊन’ (मुकुट के लिए स्पर्धा - अर्थात् प्रधानमंत्री के मुकुट के लिए) इस शीर्षक से एक समाचार स्वरूप लेख प्रकाशित हुआ है| मतलब ९ माह पूर्व वह लेख प्रकाशित हुआ है| उसके बाद के नौ माह में गडकरी का आलेख काफी उपर गया होगा| इस लेख के लेखक तुहिन सिन्हा कहते है कि, ‘‘पहले की संशयात्म परिस्थिति (सिनिसिझम्) में से, गडकरी अपनी पार्टी को विश्‍वसनीय आशावाद (प्लॉजिबल् ऑप्टिमिझम्) की ओर ले गए है| जिन राज्यों में भाजपा की सरकारें हैं, उन्हें हिंदुत्ववादी होने के कारण नहीं, उनके उत्तम प्रशासन (गुड गव्हर्नन्स) के कारण सराहा जा रहा है| और गडकरी का जोर तो हरदम उत्तम प्रशासन पर रहा है|’’

लालकृष्ण अडवाणी

भावी प्रधानमंत्री के लिए अडवाणी का नाम भी लिया जाता था| उनकी संकल्पित रथ यात्रा, उनकी प्रधानमंत्रीपद की इच्छा और तैयारी का प्रतीक है, ऐसा समाचरपत्रों ने ठोक दिया है| अडवाणी ने स्वयं ही उनके मुँह बंद किए, यह अच्छा हुआ| २१ सितंबर को अडवाणी जब नागपुर में आए थे, तब उन्होंने ही बताया कि, ‘‘मुझे आज तक पार्टी और राष्ट्र की ओर से प्रधानमंत्रीपद से भी बहुत अधिक मिला है|’’ इसका अर्थ वे प्रधानमंत्री की स्पर्धा में नहीं, ऐसा निकालना ही योग्य होगा| इसके आलवा वे आज ही ८४ वर्ष के है| ८७ वर्ष की आयु में वे प्रधानमंत्री बनने के उत्सुक होगे, ऐसा समझना उनके लिए अन्यायकारक होगा| कुछ समाचारपत्रों ने ठोका है कि, संघ ने उन्हें परावृत्त किया| हमारे जैसे संघ के पुराने कार्यकर्ता, जो संघ की रीत जानते है, उन्हें निश्‍चित पता है कि, संघ व्यक्ति के बारे में निर्णय नहीं करता| वह काम संबंधित संगठन का होता है| २०१४ में अपना संसदीय नेता कौन होगा, यह भाजपा ही निश्‍चित करेगी|

नरेंद्र मोदी

नरेंद्र मोदी का नाम जोर-शोर से सामने आ रहा है या उद्देश कोई भी हो, सामने लाया जा रहा है, ऐसा भी कहा जा सकता है| उन्होंने ढाई या तीन दिन का अनशन क्या कर लिया, उन्हें एकदम भाजपा के २०१४ में के प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बना दिया गया! मोदी ने ही इसके लिए प्रयास किए, ऐसा बतानेवाले भी मुझे मिले| ये लोग दिल्ली स्थित ही है| अकाली दल के प्रमुख प्रकाशसिंग बादल और जयललिता के दो प्रतिनिधि उस अनशन के समर्थन में उपस्थित थे और उन्हें मोदी ने ही निमंत्रित किया था, ऐसा इन लोगों का कहना है| सही में मोदी ने ही उन्हें बुलाया होगा, तो केवल अकाली दल या अद्रमुक को ही बुलाया होगा ऐसा नहीं| भाजपा के सब विद्यमान और संभाव्य मित्रपार्टिंयों को भी वह निमंत्रण गया ही होगा| लेकिन, मेरे मतानुसार यह शंकालुओं की शंकाएँ हो सकती है| इसका अर्थ मोदी को प्रधानमंत्री बनने में रस नहीं, ऐसा करने का कारण नहीं| वे निश्‍चित ही महत्त्वाकांक्षी है और प्रधानमंत्री बनना उन्हें पसंद भी होगा, उसके लिए वे प्रयास भी करेगे| लेकिन उनके जैसा चाणाक्ष राजनीतिज्ञ इतने जल्दी अपना मनोरथ ऐसा दिखावा कर प्रकट करेगा, ऐसा नहीं लगता|
‘भावी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी’ इस चर्चा की शुरूवात की अमेरिका ने, मतलब अमेरिका की सरकार ने; और उसी जानकारी का आधार लेकर विकीलीक्स ने| अमेरिका के प्रशासन में ‘कॉंग्रेसनल रीसर्च सर्व्हिस’ नाम की एक संस्था है| ‘कॉंग्रेसनल’ मतलब अमेरिका के संसद की समझे| अमेरिका में के सर्वोच्च विधी मंडल का नाम ‘कॉंग्रेस’ है| उससे यह संस्था संलग्न है| अर्थात् यह संस्था केवल जानकारी देती है; निर्णय सरकार करती है| इस संस्था की जानकारी में कहा गया है कि, ‘‘प्रधानमंत्रीपद के भाजपा के संभाव्य उम्मीदवारों में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम है| उन्होंने अपने राज्य का लक्षणीय विकास किया है|’’ अपने इस रिपोर्ट का आधार वृत्तपत्रीय समाचार है, ऐसा यह रिपोर्ट मान्य करता है और इसके लिए ‘आऊट लुक’ इस भारत में भरपूर प्रसार के साप्ताहिक के ५ अप्रेल के अंक मेंे के संपादकीय और ‘वॉल स्ट्रीट जर्नल’ इस अमेरिका में के विख्यात समाचरपत्र के २३ फरवरी के अंक में के संपादकीय का संदर्भ देता है| 

मोदी प्रशंसा

मोदी की प्रशंसा में यह रिपोर्ट कहता है कि, ‘‘मोदी के गुजरात ने परिणामकारक प्रशासन और मनोवेधक विकास का उदाहरण प्रस्तुत किया है| उन्होंने लालफीत की रूकावट दूर कर और भ्रष्टाचार को नियंत्रण में रख कर आर्थिक प्रक्रिया को निर्बाध गति दी| उन्होंने सड़क और बिजली निर्माण के क्षेत्र में भरपूर निवेश कर राज्य का विकास दर ११ प्रतिशत से उपर पहुँचा दिया|’’ इस जानकारी के लिए इस रिपोर्ट ने ‘वॉल स्ट्रीट जर्नल’ का आधार लिया है| 
विकीलीक्स के केबल में बहुत ही मनोरंजक या हास्यास्पद कहने जैसी जानकारी है| उसके अनुसार, सरसंघचालक श्री मोहन जी भागवत ने अडवाणी या मोदी को प्रधानमंत्री बनने के लिए समर्थन दिया है| २००९ के जनवरी माह की केबल बताती है कि, भारत के उद्योगपति - जिनमें अनिल अंबानी और सुनील मित्तल का समावेश है - को मोदी प्रधानमंत्री बने, ऐसा लगता है| विकीलीक्स, अपने २००९ के केबल में, अनेक राजनीतिज्ञ, पत्रकार और वृत्तविश्‍लेषकों के मुलाक़ात के आधार पर मोदी बहुत ही लोकप्रिय और ध्रविकरण कर सकने में सक्षम नेता है, ऐसा कहती है| लेकिन आखिर में यह भी बताती है कि, भारतीय चुनाव में के जातीय, प्रादेशिक और व्यक्तिगत कारण ध्यान में लेते हुए मोदी प्रधानमंत्री बनना बहुत ही कठिन है| 
इस रिपोर्ट में राहुल गांधी का भी उल्लेख है| गांधी परिवार के इस युवक को कॉंग्रेस अपने प्रधानमंत्रीपद के उम्मीदवार के रूप में आगे करेगी| लेकिन चुनाव में की उसकी सफलता पर, प्रमाद करने के बारे में की उसकी प्रसिद्धि ने प्रश्‍नचिन्ह निर्माण किया है|

महत्त्व का मुद्दा

मेरे मन में प्रश्‍न निर्माण होता है कि, अमेरिका को मोदी के प्रति इतना प्रेम क्यों उमड़ा? क्या सही में उस देश को, मोदी या भाजपा का अन्य नेता प्रधानमंत्री बने, ऐसा लगता होगा? भारतीय राजनीति का बारीकी से अभ्यास करनेवाले एक जानकार राजनीतिज्ञ - जो भाजपा से संलग्न है - ने मेरा आश्‍चर्य दूर किया| उन्होंने बताया कि, अमेरिका को, नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने, ऐसा नहीं लगता| मोदी या भाजपा का कोई भी नेता प्रधानमंत्री बने, ऐसा अमेरिका को लगना संभव ही नहीं| उन्हें ऐसा ही लगता है कि, प्रधानमंत्री कॉंग्रेस पार्टी का ही बने| राहुल गांधी जैसी अपरिपक्व व्यक्ति उन्हें अधिक पसंद होगी| लेकिन इसके लिए उन्हें भाजपा की ओर से नरेंद्र मोदी ही उम्मीदवार चाहिए| वे भाजपा के उम्मीदवार होगे तब ही, संपूर्ण मुस्लिम और ईसाई व्होट बँक कॉंग्रेस के पीछे खडी रह सकती है| इस बात का अनुभव उन्होंने उत्तर प्रदेश में लोकसभा के चुनाव के समय लिया है| २००७ के चुनाव में, विधानसभा में ४०५ में केवल २०-२२ सदस्य होनेवाली कॉंग्रेस २००९ में लोकसभा की ८१ में से २० सिटें जीत पाई, इसका रहस्य, संगठित मुस्लिम व्होट बँक ने कॉंग्रेस को दिये एकजूट समर्थन में है| विधानसभा के चुनाव के समय, मुस्लिम व्होट, मायावती की बसपा, मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी को मिले थे| इन दो दलों में वह विभाजित हुए थे| लेकिन २००९ के लोकसभा के चुनाव में, ये व्होट भाजपा के उम्मीदवार के विरुद्ध एकजूट हुए; और भाजपा को ८१ में से केवल १० सिटें मिली| केवल १० वर्ष पूर्व १९९९ के लोकसभा के चुनाव में भाजपा को ५२ सिटें मिली थी| भाजपा को पराभूत करने में, देश में के बहुसंख्य मुसलमान, पड़ोसी मुस्लिम राष्ट्र और अमेरिका को भी रस है| यह पराभव मुस्लिम मतों के भाजपा के विरुद्ध की एकजुटता में निहित है, ऐसा उनका आकलन है| आझमगढ़ इस मुस्लिमों के कट्टरवादियों के अड्डे को दिग्विजय सिंह ने बारबार भेट देना और कट्टरवादियों का समर्थन करना यह इस व्यूहनीति का ही भाग है, ऐसा मानना चाहिए| कॉंग्रेस का पहला लक्ष्य २०१२ में के उत्तर प्रदेश के विधानसभा के चुनाव है| उसे अब पॉंच-छ: माह ही शेष होने के कारण, मोदी ही भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार हो सकते है, ऐसा ढ़िंढोरा पिटकर, मुस्लिम मत, विधानसभा के चुनाव में भी कॉंग्रेस की ओर पलटाने की विचारपूर्वक बनाई गई योजना है| 
सब को पता है कि, बसपा या सपा राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के विकल्प नहीं हो सकते| विकल्प केवल कॉंग्रेस ही है| और आज वह पस्त हो चुकी है| उसे इस स्थिति से उबारने के लिए उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव में के कॉंग्रेस परिणाम जनता को आशावादी लगने चाहिए; इसके लिए मुस्लिम व्होट बँक, अपने आपसी मतभेद भुलाकर, कॉंग्रेस के समर्थन में खड़ी रहनी चाहिए| उन मतों का विभाजन होकर भाजपा को उसका लाभ नहीं मिलना चाहिए, इसलिए मोदी के स्तोत्र गाए जा रहे है| मोदी जिस पार्टी की ओर से प्रधानमंत्री बन सकते है, उसे विरोध करने के लिए मुस्लिमों के मत कॉंग्रेस को मिलेगे, ऐसा यह आशावाद है| इसके साथ ही जदयु जैसी पार्टिंयॉं भी भाजपा से दूर होगी, ऐसी आशा भी उनके मन में है| 
इस विश्‍लेषण पर कितना विश्‍वास रखें, यह हर किसी का अपना विषय है| तथापि, मोदी के प्रधानमंत्री बनने में अमेरिका को रस होगा या राहुल गांधी के उस उच्च पद पर आसीन होने में रस होगा, इसके उत्तर में दो मत होने का कारण नहीं, ऐसा लगता है| आखिर अपनी रणनीति भाजपा ने ही तय करनी है और आज भाजपा में उस उच्च अधिकार के पद के लिए अनेक लायक उम्मीदवार है, ऐसी उनकी भूमिका दिखाई देती है| वह योग्य ही है, ऐसा कहना चाहिए|

- मा. गो. वैद्य, नागपुर

(अनुवाद : विकास कुलकर्णी)