Sunday, 22 January 2012

अंधश्रद्धा निर्मूलन विधेयक

   २५ जनवरी के लिए भाष्य

अंधश्रद्धा निर्मूलन विधेयक महाराष्ट्र शासन ने तैयार किया है| ‘सन २००५ के विधानसभा विधेयक क्रमांक ८९’ ऐसा इस विधेयक का नामाभिधान है| गत २०११ के दिसंबर माह में नागपुर में हुए विधिमंडल के अधिवेशन में यह विधेयक प्रस्तुत किया जाएगा, ऐसी संभावना व्यक्त की गई थी| लेकिन, ऐसा दिखता है कि यह नहीं हुआ| २००५ से विधेयक तैयार हो और उस पर विधिमंडल में चर्चा होकर उसका करीब छ: वर्षों में कानून में रूपांतर न हो, यह आश्‍चर्य की बात है| सरकार इस बारे में ज्यादा गंभीर नहीं, ऐसा तर्क किसी ने किया तो उसे दोष नहीं दे सकते|

निमित्तकारण

नागपुर में, अधिवेशन चल रहा था उस समय, दि. १९ दिसंबर को इस विधेयक पर चर्चा करने का कार्यक्रम अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति (अंनिस) ने आयोजित किया था| इस चर्चासत्र में आकर मैं अपने विचार व्यक्त करूँ, ऐसी विनति ‘अंनिस’के अग्रगण्य कार्यकर्ता श्री श्याम मानव ने मेरे घर स्वयं आकर की थी| मैं वह आमंत्रण निश्‍चित ही स्वीकारता, लेकिन ठीक उसी दिन, अमरावती में, हमारे परिवार मे  एक शादी होने के कारण और परिवार प्रमुख के नाते मुझे वहॉं जाना अनिवार्य होने के कारण मैं उस चर्चासत्र में उपस्थित नहीं रह सकूँगा, ऐसा मैंने श्री श्याम मानव को बताया| तब उन्होंने, मुझे इस पर, एक लेख लिखने की सूचना की और उस विधेयक के प्रारूप की एक प्रति भी मुझे दी| यही मेरे इस लेख का निमित्तकारण है|   

निरुपद्रवी

इस विधेयक का प्रारूप मैंने पढ़ा| मुझे उसमें कुछ अधिक आक्षेपार्ह नहीं लगा| उसके विरुद्ध जोरदार प्रचार या आंदोलन करने की आवश्यकता या औचित्य है, ऐसा मुझे नहीं लगता| इसी के साथ यह विधेयक अत्यंत आवश्यक है और उसका कानून नहीं बनाया गया, तो समाज का बहुत बड़ा नुकसान होगा, ऐसा भी मुझे नहीं लगता| विधेयक का कानून में रूपांतर हुआ, तो दारूबंदी, दहेज बंदी जैसे जो निरुपद्रवी कानून है, उनमें और एक कानून की वृद्धि होगी|

उद्दिष्ट

इसका अर्थ , इस विधेयक के उद्दिष्ट में जो निरूपित है, उसे कोई अर्थ ही नहीं, ऐसा नहीं होता| उद्दिष्ट अच्छा ही है| उसके शब्द है : ‘अंधविश्‍वास और अज्ञान पर परिपुष्ट, अनिष्ट एवं दुष्ट प्रथाओं से समाज में के सर्वसामान्य लोगों का संरक्षण करने की दृष्टि से, उसी प्रकार समाज में के सर्वसामान्य लोगों का मानसिक, शारीरिक एवं आर्थिक़ शोषण कर उनका नुकसान करने के और उसके द्वारा समाज की व्यवस्था बिगाड़ने के दुष्ट हेतु से वैदू और भोंदूबाबा की सर्वसामान्यत: जादूटोना के नाम से जानेवाली तथाकथित अतींद्रिय या अतिमानुष शक्ति या चमत्कार प्रगट कर, भूतपिशाच्च के नाम से जनमानस में पैदा किए अंधविश्‍वास के कारण होनेवाली अनिष्ट एवं दुष्ट प्रथाओं को और अघोरी रूढीयों का मुकाबला कर, उसका समूल उच्चाटन करने की दृष्टि से, इस संबंध में समाज में जागृति एवं अहसास निर्माण करने के लिए और निकोप तथा सुरक्षित वातावरण निर्माण करने के लिए’ इत्यादि| इस उद्दिष्ट पर आक्षेप हो ऐसा इसमें कुछ भी नहीं| उद्दिष्ट आगे जो कहता है कि, इन अनिष्ट प्रथाओं के कारण ‘जनता का मानसिक, शारीरिक एवं आर्थिक़ नुकसान होने की घटनाएँ सतत सामने आ रही है, उनका प्रमाण भयावह है’ यह सही नहीं है| समाज उत्सन्न हो, ऐसा कुछ भी आज नहीं हो रहा है| जिन अनिष्ट प्रथाओं का उल्लेख विधेयक में किया गया है और जिनकी सूची मैं इस लेख में दे रहा हूँ, उनका प्रमाण भयावह नहीं है| ऐसा होता तो, ऐसी अनिष्ट घटनाएँ बारबार होती; और उनके समाचारों से समाचारपत्रों के स्तंभ भरे रहे होते|

अनिष्ट प्रथा

अनिष्ट एवं अघोरी कृतिंयों की जो सूची इस विधेयक में दी है, वह इस प्रकार है :
१) भूत उतारने के बहाने किसी व्यक्ति को, रस्सी या ज़ंजीर से बांधकर रखना, पीटना, लाठी या चाबूक से मारना, पादत्राण भिगाकर उसका पानी पिलाना, मिरची की धुआं देना, छत से लटकाना, रस्सी या बालों से बांधना, उस व्यक्ति के बाल उखाडना, व्यक्ति के शरीर पर या अवयवों पर गरम की वस्तु के दाग देकर हानि पहुँचाना, सार्वजनिक स्थान पर लैंगिक कृत्य करने की जबरदस्ती करना, व्यक्ति पर अघोरी कृत्य करना, मुँह में जबरदस्ती मूत्र या विष्ठा डालना या ऐसी कोई कृति करना|
२) किसी व्यक्ति ने तथाकथित चमत्कार कर उससे आर्थिक प्राप्ति करना, इसी प्रकार ऐसे तथाकथित चमत्कारों का प्रचार और प्रसार कर लोगों को फंसाना, ठगना अथवा उन पर दहशत निर्माण करना|
३) अतिमानुष शक्ति की कृपा प्राप्त करने के लिए, जिसके कारण जान का खतरा निर्माण होता है या शरीर को प्राणघातक जख्म होते है, ऐसी अघोरी प्रथाओं का अवलंब करना; और ऐसी प्रथाओं का अवलंब करने के लिए औरों को प्रवृत्त करना, उत्तेजन देना या जबरदस्ती करना|
४) मौल्यवान वस्तु, गुप्त धन, जलस्रोत खोजने के बहाने या तत्सम कारणों से करनी, भानामति इन नामों से कोई भी अमानुष कृत्य करना या ऐसे अमानुष कृत्य करने और जारणमारण अथवा देवदेवस्की (?) के नाम पर नरबलि देना या देने का प्रयास करना, या ऐसे अमानुष कृत्य करने की सलाह देना, उसके लिए प्रवृत्त करना, अथवा प्रोत्साहन देना|
५) अपने भीतर अतींद्रिय शक्ति है ऐसा आभास निर्माण कर अथवा अतींद्रिय शक्ति संचरित होने का आभास निर्माण कर औरों के मन में भय निर्माण करना या उस व्यक्ति का कहना न मानने पर बुरे परिणाम होंगे, ऐसी औरों को धमकी देना|
६) कोई विशिष्ट व्यक्ति करनी करती है, काली विद्या करती है, भूत लगाती है, मंत्र-तंत्र से जानवरों की दूध देने की क्षमता समाप्त करती है, ऐसा बताकर उस व्यक्ति के बारे में संदेह निर्माण करना, इसी प्रकार कोई व्यक्ति अपशकुनि है, रोग फैलने के लिए कारणीभूत होनेवाली है, इत्यादि बताकर या आभास निर्माण कर संबंधित व्यक्ति का जीना मुश्किल करना, कष्टमय करना या कठिन करना, कोई व्यक्ति सैतान या सैतान का अवतार है, ऐसा घोषित करना|
७) जारणमारण, करनी या टोटका अथवा ऐसे प्रकार किए है इस बहाने से किसी व्यक्ति को मारपीट करना, उसे नग्नावस्था में घुमाना या उसके रोज के व्यवहार पर बंदी लगाना|
८) मंत्र की सहायता से भूत-पिशाच्चों का आवाहन कर या भूत-पिशाच्चों का आवाहन करूँगा ऐसी धमकी देकर लोगों के मन में घबराहट निर्माण करना, मंत्र-तंत्र अथावा तत्सम बातें बनाकर किसी व्यक्ति को विष-बाधा से मुक्त करने का आभास निर्माण करना, शारीरिक हानि (क्षति) होने के लिए भूत या अमानवी शक्ति का कोप होने का आभास करा देना, लोगों को वैद्यकीय उपचार लेने से रोककर, उसके बदले उन्हें अघोरी कृत्य या उपाय करने के लिए प्रवृत्त करना अथवा मंत्र-तंत्र (टोटका) जादूटोना अथवा अघोरी उपाय करने का आभास निर्माण कर लोगों को मृत्यु का भय दिखाना, पीडा देना या आर्थिक अथवा मानसिक हानि पहुँचाना|
९) कुत्ता, सॉंप, बिच्छु आदि के काटे व्यक्ति को वैद्यकीय उपचार लेने से रोककर या प्रतिबंध कर, उसके बदले, मंत्र-तंत्र, गंडा-धागा आदि अन्य उपचार करना|
१०) उँगली से शस्त्रक्रिया कर दिखाता हूँ ऐसा दावा करना या गर्भवती स्त्री के गर्भ का लिंग बदल कर दिखाता हूँ ऐसा दावा करना|
११) (क) स्वयं में विशेष शक्ति होने या किसी का अवतार होने या स्वयं पवित्र आत्मा होने का आभास निर्माण कर या उसके बातों में आई व्यक्ति को पूर्वजन्म में तू मेरी पत्नी, पति या प्रेयसी, प्रियकर था ऐसा बताकर, उस व्यक्ति के साथ लैंगिक संबंध रखना|
(ख) अपत्य न होनेवाली स्त्री को अतींद्रिय शक्ति द्वारा अपत्य होने का आश्‍वासन देकर उसके साथ लैंगिक संबंध रखना|
१२) मंद बुद्धि के (mentally retarded) व्यक्ति में अतींद्रिय शक्ति है ऐसा अन्य लोगों के मन में आभास निर्माण कर उस व्यक्ति का धंदा या व्यवसाय के लिए प्रयोग करना|
ऐसी यह संपूर्ण सूची है| इसमें की सभी बातें अनिष्ट है, ऐसा नहीं| पानी का स्रोत ढूंढने के लिए, मैंने स्वयं एक पानीवाले महाराज को आमंत्रित किया था| लेकिन उनके निष्कर्ष पर अवलंबित न रहकर, मैंने बाद में एक शासनमान्य भूगर्भ वैज्ञानिक को भी बुलाया| दोनों ने करीब एक ही जगह बताई; और वहॉं कूपनलिका खोदने के बाद पानी मिला| गॉंववासियों को आश्‍चर्य हुआ; कारण इस खेत में पानी मिलेगा ही नहीं, इस बारे में खेत के मालिक के साथ अन्य सब गॉंववासियों को विश्‍वास था|  
अतींद्रिय शक्ति हो सकती है, ऐसा मुझे लगता है| विवेकानंद को, रामकृष्ण परहंस के केवल हस्तस्पर्श से एक विलक्षण शक्ति का प्रत्यय मिला था| रामकृष्ण कोई भोंदू या जादूगर नहीं थे और विवेकानंद भी किसी बहकावे में आनेवाले मूर्ख नहीं थे| सत्यसाई बाबा हवा में से घडियॉं या कुछ अन्य वस्तुएँ निकालकर देते थे, ऐसा मैंने सुना है| अनेकों का इस पर विश्‍वास है| उस विश्‍वास को झूठ क्यों माने यह मुझे समझ नहीं आता| विशिष्ट प्रकार की योगसाधना से अलौकिक सिद्धि प्राप्त हो सकती है, इस पर मेरा विश्‍वास है| करीब करीब जन्मांध रहे अमरावती जिले में के माधान गॉंव के गुलाबराव महाराज को सब शास्त्रों का ज्ञान क्यों और कैसे मिला होगा? रामानुजम् को, शाला में पढ़ते समय ही, गणित के गहन तत्त्व कैसे अवगत हुए होगे? ज्ञानेश्‍वर महाराज १७ वर्ष की आयु में ज्ञानेश्‍वरी जैसा अद्भुत ग्रंथ कैसे निर्माण कर सके? यह सब अलौकिक, अतिभौतिक शक्ति है| लेकिन इन शक्तियों से प्राप्त अलौकिकत्व का इन में से किसी ने व्यापार नहीं किया| अत: पूर्व जन्म में की या इस जन्म में की कई अतर्क्य ऐसी शक्तियों से ये पुरुष युक्त थे, यह मानना ही पडता है| ‘अंनिस’वाले पूर्वजन्म मानते है या नहीं, यह मुझे पता नहीं|

आघातलक्ष्य

भोंदूगिरी और उसके द्वारा लोगों को ठगना यह ‘अंनिस’का कहे या इस विधेयक का, आघातलक्ष्य है| इसमें अनुचित कुछ भी नहीं| इस विधेयक में बताए अघोरी कृत्यों की जो सूची दी है, उनमें की कुछ बातें होते रहती है, इस बारें में संदेह नहीं| नरबलि के भी उदाहरण होते है| क्वचित होते है लेकिन होते है| उन्हें दंडित करने की व्यवस्था रहने में आक्षेपार्ह कुछ भी नहीं| तथापि, सभी बाबा और महात्मा भोंदू होते है, ऐसा नहीं| मंत्रोच्चार में भी सामर्थ्य हो सकता है| बिच्छु का विष उतारनेवाले मांत्रिक मुझे पता है| अब प्रश्‍न निर्माण हो सकता है कि, सही में मंत्र से बिच्छु का विष उतरता है या वह उतरा है ऐसा बिच्छु ने काटे व्यक्ति का ग्रह होता है? वह विष उतरता नहीं लेकिन उसका वैसा ग्रह होता है, ऐसा हम मान ले| लेकिन ऐसा ग्रह होना सही या गलत? शास्त्र बताता है कि शारीरिक रोग में मानसिकता की भी भूमिका होती है| मन और शरीर परस्पर पर परिणाम करते ही है| फिर किसी बाबा के सानिध्य के कारण, बोलने से, स्पर्श से, व्यक्ति का समाधान होता होगा तो उसमें बुरा क्या है? वे, कुछ जप-जाप्य, क्रियाविधि, अनुष्ठान इत्यादि उपासना बताते होगे और शिष्य उसे आचरित करते होगे और उनके मन को उससे शांति मिलती होगी, तो आक्षेप लेने का क्या कारण? अपने ऐसे भक्तों को वे, उपरोक्त सूची में वर्णन किए अनुसार यातना देते होगे, तो बात अलग है| वह कृति दंडनीय ही माननी चाहिए|

छूट

इस विधेयक की धारा १३ में एक व्यापक छूट दी गई है| वह प्रशंसनीय है| यह धारा बताती है, ‘संदेह दूर करने के लिए इसके द्वारा ऐसा घोषित किया जाता है कि, जिस कारण शारीरिक या आर्थिक बाधा नहीं पहुँचती, ऐसे किसी भी धार्मिक विधि या धार्मिक कृत्य अंतर्भूत रहनेवाली कृतियों को इस अधिनियम में की कोई भी बात लागू नहीं होगी|’ मेरे मतानुसार यह छूट, इस कानून के दुरुपयोग से लोगों को बचा सकेंगी|

एक प्रश्‍न

एक प्रश्‍न ऐसा पूछॉं जा सकता है कि, जो अनिष्ट प्रथा या रूढीयों का निर्देश उपरोक्त सूची में किया है, वह रूढी और प्रथाएँ क्या इस कानून से समाप्त होंगी? मेरा उत्तर ‘नहीं’ है| थोडा बहुत धाक निर्माण हो सकती है और कानून धाक निर्माण करने के लिए ही होता है| हत्या, चोरी, डकैती के विरुद्ध कानून है| फिर भी यह अनिष्ट घटनाएँ होते ही रहती है| लेकिन इस कारण वह कानून ही निरर्थक है, ऐसा नहीं कहा जा सकता| तथापि, चोरी, हत्या आदि संबंधि का कानून और अंधविश्‍वास में से उद्भवित होनेवाले अनिष्टों के विरुद्ध का कानून इनमें एक मूलभूत अंतर है| चोरी, हत्या, डकैती करनेवाले लोग दूसरों के घरों पर आक्रमण कर अपराध करते है| भोंदू बाबा लोगों के घरों पर आक्रमण नहीं करते| लोग ही उनके पास जाते है| वे बुरी सलाह दे सकते है, देते भी होंगे| लेकिन वे भक्तों को बुलाने नहीं जाते| मुर्गे, बकरे की बलि या नर-बलि भी वे स्वयं नहीं देते| वे केवल बता सकते है| और वे उन्हें ही बता सकते है, जो उनके पास जाते है| अधिकतर कोई भी बाबा स्वयं का विज्ञापन (प्रचार) नहीं करते| इस दृष्टि से विचार करे तो, इस कानून की आवश्यकता ही नहीं, इसी निष्कर्श पर आना पडेगा|

समाज प्रबोधन

मन्नत, मुर्गीयों-बकरों की बलि, यह प्रकार हमारे समाज में है ही नहीं, ऐसा दावा नहीं कर सकते| लेकिन ये रूढीयॉं कानून से दूर होगी, ऐसा मुझे नहीं लगता| इस पर मूलगामी उपाय शिक्षा या जागरण ही है| हमारे गॉंव के समीप साकोर्ली की देवी को मुर्गे की बलि देने का प्रकार मैंने बचपन में देखा था| अब उसका कुछ अता-पता भी नहीं| लेकिन मुर्गे या बकरे का मांस खाना समाप्त हुआ या कम हुआ ऐसा नहीं| उसका प्रमाण बढ़ा भी होगा| लेकिन भगवान की कृपा संपादन करने की वह मूर्खता अब समाप्त हुई है| अब रसना (जीभ) के चोचले पूरे करने के लिए वह चल रहा है| ‘अंनिस’वालों का शायद उसे विरोध नहीं होगा| इसलिए मेरे मतानुसार इन अनिष्टों पर कार्यक्षम उपाय समाज प्रबोधन ही है| यह प्रबोधन जिस प्रकार विद्यालय में की औपचारिक शिक्षा से हो सकता है, उसी प्रकार, या उससे भी अधिक प्रमाण में भाषण, कीर्तन, प्रवचन, नाटकादि मनोरंजन के साधनों से भी हो सकता है; और वह सतत होता है इस कारण ही आज यह प्रथा बंद होने के मार्ग पर है| 

हिंदू ही क्यों?

और एक प्रश्‍न पूछॉं जाता है| ‘अंनिस’वाले हिंदू समाज में की रूढीयों के बारे में ही सक्रिय क्यों होते है? क्या मुसलमानों में बुरी प्रथा या रूढीयॉं नहीं है? तीन बार उच्चार करते ही तलाक, महिलाओं के लिए बुर्खा, दर्गे, मजार इत्यादि की पूजा, मोहरम की सवारी का संचार इत्यादि अनिष्ट रूढीयॉं उनमें भी है| ‘अंनिस’वाले उस बारे में मौन क्यों रहते है? मुझे, व्यक्तिगत स्तर पर इस बारे में ‘अंनिस’को दोष देना चाहिए ऐसा नहीं लगता| वे कहते नहीं है, फिर भी उन्हें मन में यह अहसास होता है कि वे हिंदू है और उनका हिंदू समाज पर प्रेम है| इस प्रेम के कारण ही उन्हें उनकी समझ के अनुसार हिंदू समाज निर्दोष और निर्लेप हो, ऐसा लगता है| उन्हें शायद महसूस भी नहीं होता होगा कि, वे इस आंदोलन के द्वारा एक प्रकार से हमारे राष्ट्र जीवन का जो मुख्य और महत्त्व का प्रवाह मतलब हमारा हिंदू समाज है, उसे ही बलवान कर रहे है| ऐसा बलवान, कि अन्य समाजों को भी, हम वापस इस समाज के साथ समरस हो, ऐसा लगे| उनके सुप्त मन में, हमारे देश का भाग्य और भवितव्य हिंदूओं से निगडित है, यह बात हो| इसलिए ही उनका लक्ष्य हिंदू समाज ही होगा| इन कारणों का विचार करने के बाद इस विधेयक के विरुद्ध आंदोलन आदि करें, ऐसा मुझे नहीं लगता|

- मा. गो. वैद्य
babujivaidya@gmail.com
(अनुवाद : विकास कुलकर्णी)

1 comment:

  1. आंदोलन तो होगा और अवश्य होगा यदि सिर्फ हिन्दुओ के क्रियाकलापो मे व्यवधान किया गया तो

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